महाभारत में अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहा गया है। ऐसा भी माना जाता है की अर्जुन अपने जीवन काल में कोई भी युद्ध नहीं हारे। अधिकतर लोग यही जानते हैं की उनकी मृत्यु पांडवों के सशरीर स्वर्ग यात्रा के दौरान हुई थी। लेकिन श्रोताओं महाभारत में एक ऐसे भी कथा पढ़ने को मिलता है। जिसमे में बताया गया है की अर्जुन अपने पुत्र के हाथों मारे गए थे,पर वो पुनर्जीवित हो गए थे।

अर्जुन और अश्वमेघ यज्ञ का घोडा 

कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर का हस्तिनापुर नरेश के रूप में राजयभिषेक हुआ। राजयभिषेक के कुछ दिन बाद महर्षि वेद व्यास और श्री कृष्ण ने पांडवों को अश्वमेघ यज्ञ करने को कहा। ऋषि और श्री कृष्ण के आदेशानुसार पांडवों ने शुभ मुहूर्त देखकर अश्वमेघ यज्ञ शुरू कर दिया। यज्ञ शुरू होने के बाद नियमानुसार अर्जुन की देखरेख में एक घोडा छोड़ दिया गया। अश्वमेघ यज्ञ का घोडा जिस राज्य में भी जाता अर्जुन भी उसके पीछे पीछे जाते। इस दौरान कई राजाओ ने युद्ध किये बिना ही पांडवों की अधीनता स्वीकार कर ली। और  जिसने घोड़े को रोका उसे अर्जुन ने युद्ध में हरा कर अपने अधीन कर लिया।

अर्जुन और बभ्रुवाहन युद्ध

इस तरह अश्वमेघ यज्ञ का घोडा एक दिन मणिपुर जा पहुंचा। उस समय मणिपुर का नरेश अर्जुन और चित्रांगदा का पुत्र बभ्रुवाहन था। बभ्रुवाहन अपने पिता के स्वागत के लिए राज्य की सिमा पर जा पहुंचा। और अपने पिता को देखते ही वह उनके स्वागत के लिए आगे बढ़ा। लेकिन अर्जुन ने उसे रोक दिया। अर्जुन बभ्रुवाहन से कहा की मैं इस समय तुम्हारा पिता नहीं हूँ। बल्कि हस्तिनापुर नरेश का प्रतिनिधि हूँ।  इसलिए क्षत्रिय नियमानुसार तुम्हे इस समय मुझसे से युद्ध करना चाहिए। उसी समय अर्जुन की दूसरी पत्नी उलूपी वहां आ गई। और बभ्रुवाहन से बोली -हे पुत्र तुम्हे अपने पिता के साथ युद्ध करना चाहिए अगर तुम युद्ध नहीं करोगे तो ये तुम्हारे पिता का अपमान होगा। माता की आज्ञा पाते ही बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया।

अर्जुन की मृत्यु

इसके बाद अर्जुन और बभ्रुवाहन के बिच घोर युद्ध हुआ। जिसमे अर्जुन मारे गए साथ ही बभ्रुवाहन भी मूर्क्षित हो गया। उधर अर्जुन के मारे जाने की खबर जब उसकी पत्नी चित्रांगदा के पास  पहुंची तो वह दौड़ी दौड़ी युद्ध भूमि पहुँच गई। और अपने पति के शव के सामने बैठकर विलाप करने लगी। साथ उलूपी से बोली की हे बहन तुम्हारी ही आज्ञा से मेरे पुत्र ने अपने पिता के साथ युद्ध किया। जिसमे मेरे पति की मृत्यु हो गई। उसी समय बभ्रुवाहन को होश आ गया। होश आने पर जब बभ्रुवाहन ने देखा की उसने अपने ही पिता की हत्या कर दी है तो वह भी शोक करने लगा। इसके बाद दुखी होकर चित्रांगदा और बभ्रुवाहन दोनों ही युद्ध भूमि में आमरण उपवास पर बैठ गए।

अर्जुन हुए पुनर्जीवित

पुत्र और मां के विलाप को करता देख उलूपी को दया आ गई। उसने संजीवन मणि का स्मरण किया। उलूपी के स्मरण करते ही नागों के जीवन की आधारभूत मणि वहां आ गई। तब उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा कि बेटा उठो, शोक मत करो। अर्जुन तुम्हारे द्वारा परास्त नहीं हुए हैं। लो इस दिव्य मणि को अपने पिता की छाती पर रख दो। मणि के स्पर्श होते ही तुम्हारे पिता जीवित हो जायेंगे। बभ्रुवाहन ने ऐसा ही किया और मणि के स्पर्श होते ही अर्जुन जीवित हो उठे। अपने जीवित देखकर बभ्रुवाहन खुश हुआ और जाकर गले लग गया। साथ ही अपने पिता से माफ़ी मांगने लगा। लेकिन अर्जुन से उससे कहा की हे पुत्र तुम्हे मुझसे माफ़ी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बाद बभ्रुवाहन ने अश्वमेध का घोड़ा को लौटा दिया। और अपनी माताओं चित्रांगदा और उलूपी के साथ युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ में शामिल हुए।   

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