KARN KI JIWANI

कर्ण की वीरता, साहस और दयाभाव से तो हम सभी परिचित हैं। वो महाभारत के समय के सबसे महान धनुर्धरों में से एक था। कर्ण के पास जन्म से ही कवच और कुण्डल थे । जो उसे उसके पिता सूर्य से प्राप्त हुए थे।  कवच और कुण्डल होने के कारण कोई भी कर्ण का वध नहीं कर सकता था। तब भी उसे युद्ध में पराजित होना पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्यूंकि कर्ण पर कई श्रापों को बोझ था।आज की पोस्ट में हम कर्ण को मिले इन श्रापों के विषय में ही बात करेंगे। हम जानेंगे की आखिर कर्ण को क्यों मिले इतने श्राप ?

कर्ण का जन्म

मित्रों यह तो हम सब जानते हैं कि विवाह से पूर्व सूर्य का आवाहन करके कुंती ने कर्ण को प्राप्त किया था। लोक लज्जा के कारण उसे नदी में प्रवाहित कर दिया था।  तब उस बालक का पालन पोषण एक सूत दंपत्ति ने किया था।  बड़े होकर कर्ण महादानी कहलाया।  इसका एक बेहतर उदाहरण इस प्रकार है। अर्जुन के पिता इंद्र को भय था कि यदि कर्ण के पास उसके कुण्डल-कवच रहे तो वो युद्ध में विजयी होगा। इसलिए इंद्र ने ब्राह्मण का भेष धारण कर कर्ण की सबसे शक्तिशाली संपत्ति उससे दान में मांग ली। महादानी कर्ण ने बिना कुछ सोचे अपने कुण्डल कवच दान कर दिए। 

कर्ण और परशुराम

धनुर्विद्या में निपुण होने के लिए कर्ण गुरु द्रोणाचार्य के पास ब्रह्मास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने गया। परन्तु द्रोणाचार्य ने कहा कि यह ज्ञान केवल एक ब्राह्मण या एक तपस्वी क्षत्रिय को ही दिया जा सकता है। तुम इनमे से किसी भी वर्ग के नहीं हो । इसलिए मैं तुम्हे यह विद्या नहीं सिखा सकता। कर्ण को बहुत क्रोध आया। वो भगवान परशुराम से मिलने के उद्देश्य से महेंद्र पर्वत की ओर प्रस्थान कर गया।  वहां उसकी भेंट परशुराम से हुई । उसने परशुराम से स्वयं को ब्राह्मण बताकर ब्रह्मास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।  उसने बहुत समय तक परशुराम के आश्रम में रहकर अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान प्राप्त किया।

पहला श्राप

एक बार शिकार के समय उसने गलती से एक ब्राह्मण की गाय की हत्या कर दी।  कर्ण को अपनी इस गलती पर बहुत पछतावा हुआ । उसने ब्राह्मण को पूरी बात बताकर क्षमा मांगी।  परन्तु अपनी सबसे प्यारी गाय की हत्या की बात सुनकर ब्राह्मण का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। और उन्होंने उससे कहा तुम्हारे इस अपराध का दंड मृत्यु होना चाहिए। मैं तुम्हे श्राप देता हूँ की युद्धभूमि में जब तुम शत्रु का सामना करोगे । तब तुम्हारा रथ धरती में चला जायेगा। और जिस प्रकार तुमने मेरी गाय की हत्या की है । उसी प्रकार तुम्हारा शत्रु तुम्हारा मस्तिष्क धड़ से अलग करके तुम्हारी हत्या करेगा। और दोस्तों इसी कारण महाभारत युद्ध में कर्ण के रथ का पहिया धरती में फंस गया था और अर्जुन ने अवसर देख उसका वध कर दिया।

दूसरा श्राप

एक बार भगवान परशुराम वन में विश्राम के लिए रुके।  तब कर्ण ने उन्हें अपना सिर उसकी गोदी में रखने के लिए कहा। जब परशुराम निद्रा में थे तब एक कीड़ा कर्ण के पैर पर काटने लगा।  उसने इतना गहरा घाव कर दिया कि उसके पैर से रक्त निकलने लगा। परन्तु गुरु की नींद में विघ्न न पड़े इसलिए वो पीड़ा सहन करता रहा। जब रक्त की धारा परशुराम के चेहरे तक पहुंची तब वो नींद से जाग गए। जब उन्होंने उस कीड़े को कर्ण के पाँव पर देखा तो परशुराम समझ गए थे कि इतनी पीड़ा कोई ब्राह्मण नहीं सहन कर सकता, कर्ण अवश्य ही क्षत्रिय है। कर्ण के सत्य बताने पर, परशुराम ने क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि तुमने छल से मुझसे विद्या प्राप्त की है इसलिए जब तुम भयानक स्थिति में होंगे और जब तुम्हे शस्त्रविद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी तब तुम उन शस्त्रों को प्रयोग करने वाले सभी मन्त्र भूल जाओगे ।

कर्ण लज्जित होकर दुखी मन से वहां से चला गया और दुर्योधन के साथ सम्मिलित हुआ । बाद में उसने महाभारत युद्ध कौरवों की ओर से लड़ा । युद्धभूमि में परशुराम के श्राप के कारण वो आवश्यक्ता पड़ने पर सभी विद्याएँ भूल गया और ब्राह्मण के श्राप के कारण युद्ध में मारा गया ।.