हिंदू धर्मग्रंथों में ऐसी कईं रहस्यमयी पर्वतों के बारे में बताया गया है।उन्ही रहस्य्मयी पर्वतों में एक ऋष्यमूक पर्वत भी है। ऋष्यमूक पर्वत का उल्लेख रामायण में मिलता है। आज के इस पोस्ट में हम आपको बताएँगे की इस पर्वत का नाम ऋष्यमूक क्यों पड़ा और यह चट्टानों की बजाय हड्डियों से क्यों बना हुआ है।

ऋष्यमूक पर्वत की कथा

पुराणों  में वर्णित कथा के मुताबिक जब रावण का अत्याचार बहुत बढ़ गया था। तब बहुत से  ऋषि उससे डरकर एक साथ एक पर्वत पर जाकर रहने लगे थे।  कहते हैं ये सभी ऋषि पर्वत पर  मौन रहकर रावण का विरोध कर रहे थे। रावण विश्व जितने के लिए इस पर्वत के ऊपर से गुज़रा तो उसने बहुत से ऋषियों को एक साथ देखा। यह देख रावण उस पर्वत पर उत्तर गया और ऋषियों से इक्टठे होने का कारण पूछा। चुकी सारे ऋषि मौन थे इसलिए राक्षसों ने रावण को बताया की महाराज आपके द्वारा सताए हुए ऋषि मूक यानि मौन होकर यहां आपका विरोध कर रहे हैं।

ये सुनकर रावण को क्रोध आ गया और उसने एक-एक करके सारे ऋषियों को मार डाला। कहा जाता है कि उन्हीं के अस्थि अवशेषों से यहां एक पहाड़ बन गया। और तब से इस पर्वत को ऋष्यमूक पर्वत के नाम से जाना जाने लगा।

रामायण में वर्णित ऋष्यमूक की कथा 

रामायण के अनुसार ऋष्यमूक पर्वत में ऋषि मतंग का आश्रम था। बालि ने दुंदुभि असुर का वध कर दिया। फिर  दोनों हाथों से उनका मृत शरीर एक ही झटके में एक योजन दूर फेंक दिया था। हवा में उड़ते हुए मृत दुंदुभि के मुंह से खून बह रहा था। जिसकी कुछ बूंदें मतंग ऋषि के आश्रम पर भी पड़ गई थी।

मतंग ऋषि जानने के लिए कि यह किस ने किया है वह अपने आश्रम से बाहर निकले। उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से सबकुछ जान लिया। जब उन्हें पता चला कि ये बालि ने किया है तो उन्होंने उसे शाप दे डाला। शाप यह था की उस दिन के बाद अगर बाली कभी भी ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन की दूरी के पास भी आएगा तो अपने प्राण खो बैठेगा। कहते हैं इस बात के बारे में बालि के छोटे भाई सुग्रीव को पता था। इसी कारण से जब बालि ने सुग्रीव को देश-निकाला दिया तो उसने बालि से बचने के लिए अपने अनुयायियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत में जाकर शरण ली।

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