ऋष्यमूक पर्वत : रामायण में भगवान् राम के वनवास के समय में सुग्रीव, बानरराज बाली और ऋष्यमूक पर्वत का नाम कई बार आता है | सुग्रीव जो की वानरराज बाली के भाई थे उन्होंने भगवान् राम के वनवास के समय में रावण का वध करने में मदद की थी | तो आइये जानते है की ऋष्यमूक पर्वत के साथ बाली और सुग्रीव का कौन सा रहस्य जुड़ा है |

ऋष्यमूक पर्वत का नाम कैसे पड़ा

ऋष्यमूक पर्वत की श्रंखला में कई सारी पहाड़ियां आती है इनमें से ही एक पहाड़ पर एक विशाल वानर रहा करता था जिसका नाम ऋक्षराज था | एक बार उस वानर ने एक दुसरे वानर ने पूछा की इस पर्वत पर तुम रहते हो इसका नाम ऋष्यमूक पर्वत कैसे और क्यों पड़ा था | तब उस वानर ने दुसरे वानर को पुरे विस्तार से बताया की लंकाधिपति महाराज दशानन द्वारा सताए और प्रताड़ित हुए साधु संत एक जगह इसी पर्वत पर एकत्रित होकर मौन रहकर रावण का विरोध कर रहे थे | रावण जब विश्व विजय के लिए इन पर्वतों के ऊपर से निकला तो लाखों की संख्या में एकत्रित हुए साधू संतो को देखकर चौंक गया |

रावण ने अपने साथ के राक्षसों से पूछा की ये लाखों की संख्या में एकत्रित साधु संत यंहा क्या कर रहे है तब रावण के साथ में रहने बाले राक्षसों ने जबाब दिया की महाराज ये सब संत आपके द्वारा सताए हुए है जिसकी वजह से ये सब एकत्रित होकर यहाँ मौन व्रत रखकर आपका विरोध कर रहे है | इतना सुनते ही रावण को गुस्सा आ गया और उसने अपने राक्षसों को आदेश दिया की इनका इतना साहस की ये मेरा विरोध करें इन सभी को तुरंत मौत के घाट उतार दिया जाए | रावण की आज्ञा पाकर राक्षसों ने उन सभी साधू संतो को मार डाला और उन सभी साधू संतो के मरने के बाद उनकी अस्थियों के अवशेषों से यह पहाड़ निर्मित हो गया जिसके कारण इस पहाड़ का नाम ऋष्यमूक पर्वत पड़ गया |

ऋक्षराज कैसे बना स्त्री ?

आपको हमने अपनी ऊपर की कथा में जिस ऋक्षराज नाम के बड़े वानर के बारे में बताया है वो बहुत ही शक्तिशाली और भयंकर रूप का वानर था | ऋक्षराज को अपने बलशाली होने पर बहुत ही ज्यादा घमंड था जिससे बो बिना किसी से भी भयभीत हुए पुरे पहाड़ पर व जंगल में आराम से इधर उधर सबको परेशान करते हुए विचरण करता रहता था | ऋष्यमूक पर्वत के पास में ही एक चमत्कारी बहुत ही सुन्दर तालाब था | इस तालाब की विशेषता थी की जब भी कोई भी इस तालाब में प्रवेश करेगा तो बाहर निकलने पर वह एक सुन्दर स्त्री के रूप में बदल जाएगा | तालाब की इस विशेषता के बारे में ऋक्षराज को जानकारी नहीं थी | जिसकी वजह से एक दिन अपनी मस्ती में नहाने के लिए ऋक्षराज इस तालाब में कूद गया और जैसे ही वो वानर इस तालाब से नहा कर बाहर निकला तो उसने देखा की उसका पूरा शरीर बदल गया है | उसका शरीर एक कामुक सौन्दर्य से परिपूर्ण सोलह साल की स्त्री के रूप में बदल चूका था |

कैसे हुआ बाली और सुग्रीव का जन्म ?

ऋक्षराज ने जब अपने आप को स्त्री के रूप में देखा तो उसे बहुत शर्म महसूस हुई मगर अब उसके हाथ में कुछ नहीं था वो कुछ नहीं कर सकता था इसी वजह से वो वंही बैठ गया | कुछ समय पश्चात जब इंद्र देव उस स्थान से गुजरे तो ऋक्षराज के बदले हुए स्त्री रूप को देखकर उस पर मोहित हो गए | स्त्री रुपी ऋक्षराज को देखकर इंद्र देव के मोहित होने से उनका तेज स्खलित हो गया और ऋक्षराज के बालो के ऊपर जा गिरा जिससे वो गर्भवती हो गयी और एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम बाली पड़ा जो आगे चलकर वानरराज बना | चुकीं इंद्र देव का तेज स्त्री के बालो पर गिरा था जिसकी वजह से इस बालक का नाम बाली रखा गया था | बाली के जन्म के कुछ देर बाद जब सूर्य देव प्रकट हुए तो सूर्य देव की द्रष्टि जब उस स्त्री रुपी ऋक्षराज को देखकर उस पर मोहित हो गए और उनका तेज स्खलित होकर उस स्त्री की ग्रीवा पर पड़ा जिससे एक सुन्दर बालक का जन्म हुआ जिसका नाम सुग्रीव रखा गया | चूँकि सूर्य देव का तेज स्त्री की ग्रीवा पर गिरा था इसकी वजह से इस बालक का नाम सुग्रीव रखा गया | इस तरह बाली इंद्र देव का पुत्र बड़ा भाई और सुग्रीव सूर्य देव का पुत्र छोटा भाई दोनों सगे भाई थे | इनका भरन पोषण उसी स्त्री ने किया जो ऋक्षराज का बदला हुआ रूप थी और फिर दोनों पुत्रो के साथ वह स्त्री निवास उसी पर्वत पर निवास करने लगी |