कच और देवयानी की कथा

पौराणिक ग्रंथों में कच और देवयानी की प्रेम कथा का वर्णन मिलता है।कच जहाँ गुरु वृहस्पति के पुत्र थे वहीँ देवयानी असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी। तो पाहकों आई जानते हैं कच और देवयानी की प्रेम कथा के बारे में।

देव-दैत्यों का युद्ध

पौराणिक कथाओं पता चलता है कि देवताओं और दैत्यों के बिच कई हुए हैं। दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य जी थे। जिन्होंने शिव की कठोर तपस्या कर मृत्यु संजीवनी विद्या का ज्ञान हासिल किया था। जिस वजह से दैत्यों को सभी युद्ध में विजय प्राप्त होती थी। क्यूंकि युद्धके मैदान में जो भी दैत्य मारे जाते थे शुक्राचार्य उन्हें अपनी विद्या से पुनः जीवित कर देते थे। शिवजी के द्वारा दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को दिया गया यह वरदान एक बड़ी समस्या बन गयी थी। उधर दैत्यों के गुरु बृहस्पति ऐसी कोई भी विद्या नहीं जानते थे जिससे पुनर्जीवन दिया जा सके।

इस समस्या से निजात पाने के लिए बृहस्पति ने अपने पुत्र कच को दैत्यगुरु शुक्राचार्य का शिष्य बनाने का निश्चय किया। उन्होंने अपने पुत्र से कहा की वह शुक्राचार्य के पास जाकर मृत्यु संजीवनी विद्या का ज्ञान प्राप्त करे।साथ ही बृहस्पति ने कच से कहा कि यदि वो शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को प्रभावित और आकर्षित करने में सफल हो गए तो यह विद्या सीखना और भी आसान हो जायेगा। कच बृहस्पति की तीसरी पत्नी ममता के पुत्र थे।

 शुक्राचार्य के पास कच का आगमन 

अपने पिता के आदेश का पालन करने के लिए दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास पहुंचे। कच देखने से ही एक तेजस्वी और बुद्धिमान युवक प्रतीत होते थे। उनकी सुंदरता और शौर्यता को देख शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी मन ही मन उन पर मोहित हो गयीं। उधर दैत्यों को कच के आने पर यह आभास हो गया था कि  कच वहां मृत्यु संजीवनी विद्या सीखने आया है। दैत्यों ने सोचा कि यदि कच ने विद्या सीख ली तो उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसलिए दैत्यों ने मिलकर कच का वध कर दिया। जब देवयानी को कच के वध की सूचना मिली तो वो सहन नहीं कर सकी। उसने अपने पिता से कच को पुनः जीवित करने को कहा।

शुक्राचार्य देवयानी की कच के प्रति भावनाओं को भांप समझ गए और उन्होंने  कच को फिर से जीवित कर दिया। जैसे ही दैत्यों को पता लगा तो उन्होंने कच को फिर से मार दिया परन्तु पुत्री प्रेम हेतु गुरु शुक्र ने कच को पुनः जीवित कर दिया। यह देख दैत्य क्रोधित हो उठे। फिर दैत्यों ने कच का वध कर,उसके शव को जला दिया। फिर राख को एक पेय पदार्थ में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया।यह बात जब देवयानी को पता चला तो उसने एक बार फिर कच को जीवित करने के लिए अपने पिता से कहा। बेटी बात मानते हुए गुरु शुक्र ने अपनी शक्ति से कच का पता लगाने का प्रयास किया। उन्हें ज्ञात हुआ कि कच उनके पेट में है। 

मृत्यु संजीवनी विद्या का ज्ञान

यह जान शुक्राचार्य संकट में पड़ गए कि यदि वो कच को जीवित करते हैं तो स्वयं मृत्यु को प्राप्त होंगे। तब उन्होंने कच कि आत्मा को मृत्यु संजीवनी का ज्ञान  दिया जिससे कच गुरु के पेट से बाहर निकल आया। जिससे  गुरु कि मृत्यु हो गयी। तब कच ने उस विद्या का उपयोग करके गुरु को पुनः जीवित कर दिया। . देवयानी कच को देख प्रसन्न हो उठी और कच के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।  कच ने उत्तर दिया कि वो गुरु शुक्र के पेट से निकला है अतः उनके पुत्र समान है। इसी कारण मैं तुम्हारे भाई समान हूँ।

कच ने देवयानी को यह भी बताया कि वो मृत्यु संजीवनी की विद्या प्राप्त करने आया था। और अब उसके देवलोक वापस जाने का समय आ गया है। कच के विवाह प्रस्ताव ठुकराने से देवयानी की भावनाओं को ठेस पहुंची। और उसने कच को श्राप दिया की वह कभी इस विद्या का प्रयोग नहीं कर पायेगा। ऐसा श्राप सुनकर कच भी क्रोधित हो उठे और देवयानी को श्राप दिया कि उसका विवाह एक चरित्रहीन व्यक्ति से होगा। इतना कहकर कच देवलोक वापस चले गए। और बाद में देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ संपन्न हुआ.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here