कर्ण कौन थे ?

दानवीर कर्ण जो की माता कुंती के संतान होने के बावजूद उन्हें सूत पुत्र होने का अपमान कई बार सहन करना पड़ा था | कर्ण माता कुंती और सूर्य देव की संतान थे मगर जब कर्ण का जन्म हुआ तब माता कुंती अविवाहित थी जिसकी वजह से उन्होंने कर्ण को जन्म लेते ही त्याग दिया था | कर्ण का लालन पोषण एक रथ चलानेवाले परिवार ने किया जिसकी वजह से कर्ण को सूत पुत्र कहा गया और कर्ण उस सम्मान से वंचित रहे जिसके वो हकदार थे | कर्ण के जीवन से जुडी कई ऐसी बाते है जो हर इंसान को पता होना चाहिए तो आइये जानते है कर्ण कौन था?

द्रोपदी ने क्यों नहीं किया कर्ण से विवाह ?

कर्ण ने जब पहली बार द्रोपदी को देखा तो उसी क्षण द्रोपदी पर मोहित हो गया और द्रोपदी से विवाह करना चाहता था | दूसरी तरफ जब पहली बार द्रोपदी ने कर्ण की तस्वीर को देखा तो तय कर लिया की स्वयंवर में माला वो कर्ण के गले में ही डालेगी लेकिन फिर भी ऐसा संभव न हो सका | कर्ण और द्रोपदी दोनों आपस में विवाह करना चाहते थे मगर नहीं कर सके क्योंकि कर्ण सूतपुत्र कहलाते थे | किस्मत ने इनका विवाह नहीं होने दिया और द्रोपदी का विवाह अर्जुन के साथ हो गया जिसकी वजह से कर्ण पांड्वो से और खासकर अर्जुन से नफरत करने लगा | कर्ण ने द्रोपदी के सामने अपना विवाह प्रस्ताव भी रखा था मगर अपने परिवार के सम्मान को बचाने के लिए द्रोपदी ने कर्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था | द्रोपदी ने जब कर्ण के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया तब कर्ण ने दो विवाह किये थे तो आइये जानते है कैसे हुए कर्ण के दो विवाह |

कर्ण के हुए दो विवाह

कुंती ने जब कर्ण को जन्म दिया तब वो अविवाहित थी जिसकी वजह से उन्होंने समाज के डर और लोक लाज के डर से कर्ण को त्याग दिया | कर्ण का लालन पोषण एक रथ चलानेवाले परिवार ने किया जिसकी वजह से कर्ण को सूत पुत्र कहकर बुलाया जाने लगा | कर्ण का लालन पोषण करनेवाले कर्ण के पिता आधीरथ चाहते थे की कर्ण विवाह कर ले जिसकी वजह से पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए कर्ण ने रुशाली नाम की सूत पुत्री से विवाह किया था |

कर्ण की दूसरी पत्नी का नाम सुप्रिया था वैसे तो सुप्रिया का नाम महाभारत में ज्यादा नहीं मिलता है | कर्ण को अपनी दोनों पत्नियों रुशाली और सुप्रिया से नौ पुत्र प्राप्त हुए जिनके नाम क्रमशः वृशसेन, वृशकेतु, सत्यसेन, चित्रसेन, सुशेन, शत्रुजय, द्वैपात, प्रसेन और बनसेन | कर्ण के सभी नौ पुत्रों ने कौरवो की तरफ से महाभारत के विशाल युद्ध में भाग लिया जिसमे से कर्ण के आठ पुत्र वीरगति को प्राप्त हो गए | प्रसेन की मृत्यु सत्यकी के हाथों हुई, शत्रुजय, द्वैपात, और वृश्सेन की मृत्यु अर्जुन के हाथो से हुई वनसेन की मृत्यु भीम के हाथों से हुई और चित्रसेन, सत्यसेन और सुशेन की मृत्यु नकुल के हाथो से हुई थी | कर्ण का केवल एक पुत्र वृश्केतु ही जीवित बचा था कर्ण के मृत्यु के बाद उसकी पहली पत्नी रुशाली ने कर्ण की चिता में सती होना स्वीकार किया |

महाभारत के युद्ध के बाद जब पांड्वो को सत्य का पता चला की कर्ण एक सूत पुत्र नहीं बल्कि उन्ही के ज्येष्ठ भाई थे तो उन्होंने कर्ण के पुत्र वृश्केतु को हस्तिनापुर की गद्दी सौंप दी | इसके बाद वृश्केतु ने अर्जुन के सरंक्क्षण में कई युद्ध लडे और इन युद्धों में विजय भी प्राप्त किया था |

क्यों किया श्री कृष्ण ने अपने हाथों पर कर्ण का अंतिम संस्कार ?

कर्ण को बहुत ही दानवीर माना जाता है जिसका कई बार प्रमाण कर्ण ने दिया भी है, यह जानते हुए भी की कवच और कुंडल दान में देने पर उसे पांडव आसानी से हरा देगें फिर भी दानशीलता के कारण कर्ण ने दान कर दिए थे | जब कर्ण अपने अंतिम समय में मृत्युशैया पर लेटे हुए तो श्री कृष्ण ने कर्ण की दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए एक ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण से दान माँगा तब कर्ण ने कहा कि ” मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है |” तब श्री कृष्ण ने कहा कि “अपना सोने का दांत ही देदो” तब कर्ण ने एक पत्थर से अपने दांत को तोड़कर श्री कृष्ण को दे दिया और एक बार फिर दानवीर होने की सत्यता को प्रमाणित कर दिया जिससे श्री कृष्ण बहुत प्रभावित हुए और कर्ण से वरदान मांगने के लिए कहा |

कर्ण ने श्री कृष्ण से कहा की उनका पालन पोषण एक निर्धन सूत परिवार में हुआ जिसकी वजह से उन्हें कई बार अपमान और छल का सामना करना पड़ा |उन्होंने विनती की जब भगवान् कृष्णा दुबारा से धरती पर आये तो पिछड़े वर्ग के लोगो के जीवन को सुधारने का प्रयत्न जरुर करें | इसके साथ ही कर्ण ने दो वरदान और मांगे कर्ण ने दूसरा वरदान माँगा की जब भी वो फिर से अवतार लेकर धरती पर आये तो उनके ही राज्य अवतार लेकर आयें और आखरी वरदान ये माँगा की उनका अंतिम संस्कार उस स्थान पर किया जाए जंहा कोई पाप न हो | पूरी धरती पर कोई ऐसा स्थान नहीं था जंहा की पाप न हो तब श्री कृष्ण ने कर्ण का अंतिम संस्कार अपने हाथो में कर लिया जिससे मृत्यु के बाद दानवीर कर्ण साक्षात् बैकुंठ धाम को प्राप्त कर लिए |

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