कुम्भ मेला के इतिहास को लेकर कई इतिहासकारो के बीच में कई मतभेद है | कुछ इतिहासकारों का मनना है की कुम्भ मेले की शुरुआत लगभग 850 साल पहले आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गयी थी | जबकि कुछ इतिहास के कागजो से यह साबित होता है की कुम्भ मेला 525 बीसी के लगभग शुरू हुआ था | दूसरी तरफ कुछ इतिहासकरों का कहना है की कुम्भ मेले की शुरुआत समुद्र मंथन काल से मानी जाती है | कहा जाता है की समुद्र मंथन में निकले अमृत कलश से इलाहाबाद, उज्जैन, नासिक और हरिद्वार में गिरा था जिसकी वजह से इन स्थानों पर ही कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है |

कुछ साक्ष्यो से यह स्पष्ट होता है की वैदिक और पौराणिक काल में कुम्भ स्नान और मेले जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी वहीँ दूसरी तरफ शिलादित्य हर्षवर्धन 617 से 647 ईसवी के बीच में प्राप्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है की इस समय में कुम्भ स्नान जैसी व्यवस्था होती थी परन्तु कुछ समय बाद बंद कर दी गई थी | बाद में आदि गुरु शंकराचार्य और उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने मिलकर दस्नामी सन्यासी अखाड़ो के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की थी |

कुम्भ स्नान और मेला क्या है ?

हिन्दू धर्म में कुम्भ स्नान का महत्त्व बहुत अधिक है, कुछ इतिहास करों के अनुसार और प्राचीन ग्रंथो के अनुसार कुम्भ मेले की शुरुआत समुद्र मंथन के समय से मानी जाती है | जब असुरो और देवताओ के बीच में समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर युद्ध की स्थिति बन गयी थी तो मंदार पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से समुद्र मंथन को प्रारंभ किया गया तो इससे 14 रत्न प्राप्त हुए जिसमे 13 तो आपस में बाँट लिए गए है |

परन्तु 14 वे रत्न अम्रत को लेकर आपस में विवाद उत्पन्न हो गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी | तब विष्णु भगबान ने मोहिनी का रूप धारण करके अम्रत कलश को दानवो से ले लिया और इंद्र के पुत्र जयंत को दे दिया | जब जयंत अमृत कलश को दानवो से बचा कर भाग रहे थे तो अमृत की कुछ बूंदे धरती पर गिर गयी | अमरत की ये बूंदे जिन चार स्थानों पर गिरी उन्हें – हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग के नाम से जाना जाता है तभी से यंहा कुम्भ स्नान की शुरूआत मानी जाती है |

कुम्भ मेला से जुडी कथा

जब देवताओ और राक्षसों के बीच में अमृत को लेकर युद्ध हुआ तो यह लगातार बारह दिनों तक चलता रहा था | कहा जाता है की देवताओ और राक्षसों का एक दिन धरती के एक साल के बराबर होता है | इसी वजह से हर उसी स्थान पर कुम्भ का आयोजन प्रत्येक बारह वर्ष बाद होता है | इनमे से चार कुम्भ पृथ्वी पर और आठ कुम्भ देवलोक में होते है |

समुद्र मंथन के अनुसार कुम्भ पर्व का सीध सम्बन्ध तारों से होता है युद्ध के दौरान सूर्य, चन्द्र और शनि देवताओं ने कलश को देवलोक तक पहुचने में मदद की थी इसी वजह से उस समय की वर्तमान स्थिति के अनुसार गृह वापस से उसी स्थिति में आते है तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है और चारो पवित्र स्थानों पर तीन तीन वर्ष के अंतराल में नियमानुसार कुम्भ मेले का क्रमानुसार आयोजन किया जाता है  

कितने तरह के होते है कुम्भ मेले ?

कुम्भ यानी की कलश क्योकिं कुम्भ का अर्थ होता है घड़ा या कलश जिससे की साफ़ स्पष्ट होता है की कुम्भ का सीधा सम्बन्ध समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश से है | देवता जब कलश को राक्षसों से छीन कर ले जा रहे थे तो अमृत की कुछ बूंदे धरती पर तीन नदियों ( गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा ) में गिर गयी थी | ये बूंदे in नदियों में जंहा पर गिरी तभी से उन स्थानों ( हरिद्वार, नासिक, प्रयाग और उज्जैन ) पर कुम्भ मेले के आयोजन की शुरुआत की गयी थी | कुम्भ मेले मुख्यता तीन प्रकार के होते है – अर्धकुम्भ, सिंहस्थ कुम्भ और महाकुम्भ |

 अर्धकुम्भ क्या होता है ? –  

अर्धकुम्भ में अर्ध का अर्थ होता है आधा अर्थात जब दो स्थानों पर कुम्भ मेले का आयोजन 6 वर्षो के अंतराल में होता है तो उसे अर्ध कुम्भ कहा जाता है | यह आर्ध कुम्भ प्रयाग और हरिद्वार में मनाया जाता है | पौराणिक और प्राचीन ग्रंथो के अनुसार दो कुम्भ पर्वो के बीच में 6 वर्षो के अंतराल में अर्धकुम्भ का आयोजन होता है | ग्रंथो के अनुसार कुम्भ पर्व हर तीन वर्षो के अंतराल में हरिद्वार से प्रारंभ होकर के नासिक, प्रयाग और उज्जैन में आयोजित होता है | प्रयाग और हरिद्वार के बीच में 6 साल का अंतर होता है | जिस कारण से in स्थानों पर अर्ध्कुम्भो का आयोजन किया जाता है |

सिंहस्थ कुम्भ क्या होता है ? – 

सिंहस्थ कुम्भ का सीधा सम्बन्ध सिंह राशि से होता है | प्राचीन ग्रंथो के अनुसार जब मेष राशि में सूर्य गृह का और सिंह राशि में ब्रहस्पति गृह का प्रवेश होता है तब उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है | ठीक इसी के दूसरी तरफ मेष राशि में ब्रहस्पति और सिंह राशि में सूर्य का प्रवेश होता है तब नासिक में गोदावरी नदी के तट पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है | इसे महा कुम्भ कहा जाता है क्योंकि यह योग 12 वर्षो के अंतराल पर होता है | इस कुम्भ के कारण ही यह मान्यता शुरू हो गयी है की कुम्भ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्षो के अंतराल पर किया जाता है |

महाकुंभ मेला क्या होता है ? –

शास्त्रोंप्राचीन ग्रंथो और शास्त्रों में लिखा है की देवताओ का एक दिन धरती के एक साल के बराबर होता है | इसी वजह से प्रत्येक 12 वर्ष बाद ठीक उसी स्थान पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जात है | देवताओ का 12 वर्ष धरती के 144 वर्षो के बाद आता है | ऐसी मान्यता है की 144 वर्ष के बाद देवलोक में भी कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है | इसीलिए पृथ्वी पर भी ठीक 12 वर्ष के बाद महा कुम्भ का आयोजन किया जाता है जिसके लिए प्रयाग को निश्चित किया गया है |

कुम्भ के मेलो का आयोजन कब और कंहा होता है ?

हरिद्वार में कुंभ मेला का आयोजन –  

हरिद्वार में आयोजित होने बाले कुम्भ मेला का सम्बन्ध मेष राशि से होता है कहा जाता है की जब मेष राशि में सूर्य गृह और कुम्भ राशि में ब्रहस्पति गृह का प्रवेश होने पर हरिद्वार में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है | हरिद्वार और प्रयाग में आयोजित होने बाले कुम्भ मेलो के बीच में 6 वर्षो का अंतर होता है जिससे यहाँ अर्ध कुम्भ का भी आयोजन होता है |

प्रयाग में कुंभ मेले का आयोजन : 

ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति गृह  कुंभ राशि में और सूर्य गृह मेष राशि में प्रवेश करते है | तब कुंभ मेले का आयोजन 12 वर्षो के पश्चात् प्रयाग में गंगा, सरस्वती और यमुना नदी के संगम स्थान पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है | इस कुम्भ मेले का महत्व सभी कुम्भ मेलो की अपेक्षा अधिक होता है

नासिक में कुम्भ मेला का आयोजन : 

सिंह राशि में ब्रह्स्स्पति गृह के प्रवेश करने पर 12 वर्षो में एक बार नासिक में गोदावरी नदी के तट पर कुम्भ मेला का आयोजन किया जाता है | कहा जाता है की अमावस्या के दिन कर्क राशि में बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र ग्रहों के प्रवेश करने पर नासिक में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है |

उज्जैन में कुंभ मेला का आयोजन –

मेष राशि में सूर्य गृह और सिंह राशि में बृहस्पति गृहों के प्रवेश करने पर कुम्भ मेला का आयोजन क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन में किया जाता है | वहीं दूसरी तरफ यह मान्यता है की अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र ग्रहों के साथ साथ होने पर एवं बृहस्पति गृह के तुला राशि में प्रवेश करने पर मोक्ष प्रदान करने बाले कुम्भ मेले का आयोजन उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर किया जाता है |

कुम्भ में शाही स्नान क्या होता है ?

कुम्भ मेलो में शाही स्नान से जुड़ा प्राचीन ग्रंथो में कोई विशेष रिवाज नहीं है | अखाड़ो को खास और महत्त्व प्रदान करने के लिए ही कुम्भ मेले के आयोजनों में शाही स्नानो की प्रकिया का आयोजन किया जाता है | जिसके चलते शाही स्नान के दिन कुम्भ मेलो में प्रथम स्नान श्रदालुओ और भक्तो की जगह आखाड़ो के साधू संतो को ही प्रथम स्नान करने की प्राथमिकता दी जाती है | अखाड़ो के स्नान कर लेने के बाद सभी को स्नान करने की अनुमति प्रदान की जाती है |

राशियों और ग्रहों का कुम्भ मेले पर क्या असर होता है ?

यह गृहों और राशियों द्वारा ही निर्धारित किया जाता है की कब कहा कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है | जैसे की 2019 में कुम्भ मेले का आयोजन प्रयागराज में किया जाना है | जिसका कारण सिर्फ ग्रहों और राशियों की ही विशेष स्थिति है | जैसे की 2016 में कुम्भ मेले का आयोजन उज्जैन में किया गया था | 2019 के कुम्भ मेले के आयोजन के बाद हरिद्वार में 2022 में आयोजित किया जायेगा | 2022 के बाद 2025 में कुम्भ मेले का आयोजन नासिक में किया जाएगा | 2025 के बाद 2028 में कुम्भ मेले का आयोजन उजैन में किया जायेगा ठीक 12 वर्षो के बाद |

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