राजा परिक्षित की मृत्यु

कलयुग का आगमन

परीक्षित महाराज की एक गलती के कारण ही कलयुग का आगमन हुआ। कलयुग के आगमन और इसकी आयु बढ़ने के साथ प्रत्येक वस्तु एवं प्राणी का पतन आरम्भ हुआ। कलयुग के अंत में पतन अपनी चरम सीमा पर होगा। जिस कारण, मनुष्य एक जानवर की भांति हो जायेगा।

भगवत पुराण की कथा

महाराज परीक्षित ने भगवत पुराण शुकदेव गोस्वामी जी से सुना था। भगवत पुराण, जो सभी पुराणों का निचोड़ है। जो भगवन श्री हरी की सभी लीलाओं को वर्णित करता है। इसको सुनने के पश्चात् परीक्षित महाराज को सम्पूर्ण आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ। पूरा भागवत पुराण सुनने के पश्चात परीक्षित महाराज शुकदेव गोस्वामी जी से कहते हैं । आप अत्यंत दयालु हैं। आपकी कृपा से ही मुझे जीवन का उद्देश्य मिल गया है। मेरे ज्ञान चक्षु खुल गए हैं। अब मैं स्वयं को पूरी तरह से भगवान् श्री हरि के चरणों में अर्पित करना चाहता हूँ।  मेरी गहन इच्छा है कि मैं भगवान् के ध्यान में लीन रहकर ही अपनी देह त्यागूँ ।  आप मुझे आज्ञा दें। तभी परीक्षित महाराज समेत सभी साधुओं ने शुकदेव गोस्वामी जी आराधना की  और शुकदेव गोस्वामी वहां से प्रस्थान कर गए।

महाराज परिक्षित की मृत्यु

महाराज परीक्षित गंगा नदी के किनारे, कुश घास पर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवन विष्णु के ध्यान में लीन होकर एक पेड़ की तरह एक स्थान पर स्थिर हो गए। तभी तक्षक नाग ने एक ब्राह्मण का भेष धारण कर परीक्षित महाराज को काट लिया। उसके विष से महाराज परीक्षित का शरीर मिटटी में मिल गया। इस महान राजा की मृत्यु को देख धरती से स्वर्ग तक सभी लोग शोकमयी हो गए। जब परीक्षित के पुत्र जनमेजय को पिता की मृत्यु का पता लगा तो उन्हें बहुत क्रोध आया । उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमे सभी सापों की आहूति दी गयी । तक्षक ने देखा कि शक्तिशाली सांप भी यज्ञ में जलकर भस्म हो रहे हैं तब उसने इंद्र की शरण ली।

जनमजेय का बदला

जनमेजय ने ब्राह्मणो से पूछा की तक्षक की आहुति अब तक क्यों नहीं दी गयी है? तब ब्राह्मणो ने बताया कि उसे इंद्र ने शरण दी है। जनमेजय ने तक्षक के साथ इंद्र को भी यज्ञ में भस्म करने का आदेश दिया। ब्राह्मणो ने मन्त्र का उच्चारण आरम्भ किया । जिसके प्रभाव से तक्षक समेत इंद्र अपने विमान से धरती कि ओर आ रहे थे। जब बृहस्पति ने देखा कि मन्त्रों कि शक्ति से इंद्र भस्म हो सकते हैं । तब बृहस्पति ने जनमेजय को समझाया कि धरती पर प्रत्येक व्यक्ति कि मृत्यु उसके पिछले कर्मों के अनुसार होती है।

तुम्हारे पिता महाराज परीक्षित को भी उनके पिछले कर्मों के अनुसार ही मृत्यु प्राप्त हुई है। इसलिए हे राजन ! इस यज्ञ में, जो दूसरों को क्षति पहुँचाने कि मंशा से आरम्भ किया गया है। उसमे अनेक निर्दोष भस्म हो चुके हैं. कृपा करके इसे रोक दीजिये। तब जनमेजय ने यज्ञ को रोककर गुरु बृहस्पति कि आराधना की। और इस प्रकार राजा परीक्षित मृत्यु को प्राप्त हुए।

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