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आप सभी ने रामायण में वर्णित अनेकों कथाओ को सुना होगा। जैसे की प्रभु श्रीराम और उनके तीनो भाइयों के जन्म से जुडी कथाएं ,या फिर माता सीता से श्री राम के विवाह से लेकर रावण के वध की कहानी। साथ ही अधिकतर पाठक ये भी जानते होंगे की प्रभु श्री राम और उनके भाई लक्ष्मण की मृत्यु कैसे हुई। लेकिन  बहुत कम लोग ये जानते हैं की प्रभु श्री राम के बांकी दो भाई भरत और शत्रुघ्न की मृत्यु कैसे हुई।

राम की कथा

ये तो सभी जानते है की प्रभु श्री राम,लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र थे। बड़े होने पर इन भाइयों का विवाह मिथिला नरेश जनक की चारों पुत्रीयों से हुआ था। विवाह के पश्चात् श्री राम माता सीता और भाइयो और उनकी पत्नी सहित मिथिला से अयोध्या वापस आ गए।अयोध्या में कुछ दिन रहने के बाद माता कैकय के कारण श्री राम को वनवास जाना पड़ा।  वनवास के दौरान ही माता सीता का लंकाधिपति रावण ने हरण कर लिया था। जिस कारण प्रभु राम ने अपनी वानर सेना सही लंका पर चढाई कर रावण का वध किया। रावण के वध के पश्चात् प्रभु राम माता सीता और भाई लक्ष्मण सहित अयोध्या वापस आ गए।

अयोध्या वापसी

वापस आने के बाद कुछ दिनों तक प्रभु राम और माता सीता सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। लेकिन एक धोबी के कारण  प्रभु राम को देवी सीता को त्यागना पड़ा। उसके बाद माता सीता फिर वन में जाकर महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में रहने लगी। जहाँ उन्होंने दो पुत्र को जन्म दिया। दोनों पुत्रों के बड़े होने बाद माता सीता अयोध्या के राज सभा में धरती में समां गयी। माता सीता के पाताल लोक जाने के बाद श्री राम उदास रहने लगे।

कैसे हुई प्रभु राम की मृत्यु ?

कालदेव का आगमन

उनके मन में विचार आने लगा की अब मेरा भी समय पूरा हो चूका है। मुझे भी अब ये मृत्यु लोक छोड़ देना चाहिए। उसी समय ब्रह्मा  जी ने कालदेव को प्रभु राम के पास भेजा। जिस वक्त कालदेव अयोध्या पहुंचे श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ बातें कर रहे थे। कालदेव ने श्री राम से कहा की हे प्रभु मुझे आप से अकेले में जरूरी बातें करनी है। कालदेव की बातें सुनकर लक्ष्मण उठकर वहां से जाने लगे। तभी कालदेव ने प्रभु राम से कहा की वचन दीजिये। जो कोई भी हमारे बातों के बिच में इस कक्ष में प्रवेश करेगा उसे आप  मृत्युदंड देंगे। प्रभु श्री राम ने कालदेव को वचन दे दिया। और लक्षमण से द्वारपाल की जगह खड़ा होने को कहा। बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए लक्षमण द्वार पर खड़े हो गए।

लक्ष्मण को मृत्युदंड

उसी समय ऋषि दुर्वाशा वहां आ गए और राम से मिलने की जिद करने लगे। शुरू में लक्षमण ने उन्हें रोक दिया जिससे क्रोधित होकर ऋषि दुर्वाशा श्राप देने को आतुर हो गए। अंत में दुर्वाशा के क्रोध के सामने लक्षमण को श्री राम की आज्ञा तोड़ने को मजबूर होना पड़ा। लक्ष्मण के कक्ष में प्रवेश करते ही श्रीराम भी दुविधा में पड़ गए। अब लक्ष्मण को मृत्युदंड देना होगा। उन्होंने ऐसे में लक्ष्मण को राज्य निकाला दे दिया। लेकिन लक्ष्मण ने अपने भ्राता के वचन को निभाने के लिए राज्य से बाहर जाने के बजाय सरयू में जल समाधि ले ली। लक्षमण की मृत्यु से दुखी  प्रभु श्रीराम भी जल समाधि लेने का निर्णय किया।

भरत और शत्रुघ्न की मृत्यु 

अपने  बड़े भाई के इस निर्णय का पता जब भरत और शत्रुघ्न को लगा।  दोनों श्री राम को वैकुण्ठ धाम ना जाने की बहुत विनती की। जब श्री राम नहीं माने तो दोनों श्री राम के साथ ही साकेत धाम जाने की जिद पर अड़ गए। बहुत जिद करने पर राम ने दोनों की विनती स्वीकार कर ली। अगली सुबह श्री राम दोनों भाई ,सुग्रीव सहित विभीषण के साथ सरयू नदी के तट प् पहुँच कर जल समाधि ले ली। फिर कुछ देर बाद नदी के भीतर से भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने अपने भक्तों को दर्शन दिए।  इस तरह प्रभु राम,भरत और शतुघ्न वैकुण्ठ धाम को चले गए।   

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