क्यों विष्णु जी को लेना पड़ा रामावतार । आज हम प्रस्तुत करने आये है देवर्षि नारद मुनि की एक अद्भुत कहानी। नारद मुनि एक तपस्वी और ज्ञानी ऋषि थे। उनके ज्ञान के शिवजी और माता पार्वती भी प्रशंसक थे। एक बार माता पार्वती शिवजी से नारद मुनि की प्रशंसा कर रही थी। तब शिवजी ने बताया की नारद मुनि को अपने ज्ञान का अहंकार है जिस कारण उन्हें एक बार बन्दर का रूप भी लेना पड़ा था।और इसी वजह से विष्णु जी को त्रेतायुग में रामावतार लेना पड़ा। तब शिवजी ने पूरा वृतांत कुछ इस प्रकार सुनाया। तो आइये जानते है की ऐसा क्या हुआ था की क्यों विष्णु जी को लेना पड़ा रामावतार ।

नारद जी का श्राप और राम जी का जन्म

हिमालय पर्वत पर एक पवित्र गुफा थी जिसके पास से गंगा नदी बहती थी। पर्वतों और वनो के बिच ऐसा सुहावना वातावरण देख नारद मुनि की इच्छा हुई की वो वहां भगवान विष्णु की आराधना करे। और वो वहीँ विराजमान होकर तपस्या में मग्न हो गए। नारद मुनि तपस्या देख इंद्र चिंतित हो उठे। और उनकी तपस्या में विघ्न डालने हेतु कामदेव को भेज दिया। कामदेव ने हरियाली,रंग-बिरंगे फूल,शीतल हवा,अप्सराओं के नृत्य,भवरों की गुंजार और कोयल की आवाज से ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जिससे काम ऊर्जा का संचार हो सके। किन्तु कामदेव के इस षड्यंत्र का नारद मुनि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव ने श्राप मिलाने के भय से इस अपराध के लिए मुनि से क्षमा मांगी। नारद मुनि ने कामदेव को क्षमा किया और अपने लोक की ओर प्रस्थान कर गए।

नारद जी का अहंकार

परन्तु नारद मुनि को अहंकार हो गया की उन्होंने कामदेव को परास्त कर दिया है। उन्होंने यह वृतांत शिवजी को सुनाया तब शिवजी को आभास हुआ की देवर्षि को अहंकार है। शिवजी ने नारद मुनि से कहा की वह यह बात श्री हरी विष्णु को ना बताये। क्यूंकि अगर विष्णु जी को नारद मुनि के अहंकार का आभास होता तो बहुत निराश होते। परन्तु नारद मुनि ने अपने अहम् में शिवजी की बात की भी उपेक्षा की और विष्णु जी को जाकर सब कुछ बता दिया। तब विष्णु जी ने सोचा की नारद के अहम् को तोड़ना पड़ेगा। जिसके लिए उन्होंने एक लीला रचाई।

विष्णु जी ने तोडा नारद जी का अहम्

नारद मुनि ने विष्णु जी से मिलकर विदा ली तो उनका अहम् और भी बढ़ चूका था। भगवान विष्णु ने नारद जी के रास्ते में एक सुन्दर नगर की रचना कर दी। जिसे देख नारद मुनि अभिभूत हो गए। इस नगर के राजा का नाम शीलनिधि था। जिसकी विश्वमोहिनी नाम की एक बहुत ही आकर्षक पुत्री थी। जिसके स्वंयवर के  लिए अनेको देशों के राजा उस नगर में आये हुए थे। राजा ने नारद मुनि का सम्मान सहित उन्हें आसन पर विराजित किया। राजा ने नारद मुनि से अपनी कन्या का  भाग्य  बताने को कहा। जैसे ही विश्वमोहिनी सामने आई नारद मुनि उसे देखते ही रह गए। जब नारद मुनि ने उसका हाथ देखा तो पता लगा की जो भी उससे विवाह करेगा वह अमर हो जायेगा। परन्तु नारद मुनि ने राजा को ये सब नहीं बताया।  मन ही मन उस कन्या से स्वंय की विवाह की बात सोचने लगे।

नारद जी को मिला वानर रूप

इसके बाद नारद जी ने विष्णु जी को याद किया। तब विष्णु जी वहां पधारे तो मुनि ने सारी बात उन्हें बताई।और विष्णु जी से प्रार्थना की हे प्रभु आप मुझे इतना आकर्षक रूप प्रदान करें की यह कन्या मुझसे ही विवाह करे। तब विष्णु जी ने नारद जी को वानर रूप दिया। पहले तो नारद जी अचम्भे में पर गए पर बाद में उन्हें लगा की वो इस रूप में बहुत ही आकर्षक लग रहे हैं। शिवजी के दो गण इस घटना को देख रहे थे।

नारद जी का उपहास

उसके बाद देवर्षि नारद विश्वमोहिनी के स्वंयवर में पहुंचे।  साथ शिवजी के दोनों गण ब्राह्मण का रूप और स्वंय श्री हरी विष्णु राजा का रूप धारण करके पहुंचे। वे दोनों गण नारद जी सुनाकर बोल रहे थे की कन्या इनके आकर्षण को देख इनको की अपना वर चुनेगी। नारद मुनि मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। परन्तु स्वंयवर के समय उस कन्या ने नारद की और देखा भी नहीं। और राजा रूप में उपस्थित विष्णु जी को वरमाला पहना दी। तब शिव गणो ने नारद जी का उपहास करते हुए कहा की ऐसे सूरत पर कौन कन्या आपको अपना वर चुनेगी। तब जैसे ही नारद मुनि ने अपना रूप पानी में देखा वो बहुत क्रोधित हो उठे। क्रोध के कारण उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी। उन्होंने क्रोध में शिव गणो को राक्षस होने का श्राप दे दिया। इस घटना के बाद नारद मुनि को अपना रूप वापस मिल गया था।

विष्णु जी को नारद मुनि का श्राप

विष्णु जी कारण ही उनका उपहास हुआ इसलिए उन्हें विष्णु जी पर बहुत क्रोध आ रहा था। वह तत्काल ही विष्णु जी से मिलाने निकल पड़े। रास्ते में उनकी भेंट विष्णु जी,लक्ष्मी जी और विश्वमोहिनी से हुई। उन्होंने क्रोध में विष्णु जी से कहा की आपके अंदर कपट की भावना है। आपने मनुष्य रूप धारण करके मोहिनी को प्राप्त किया है। इसलिए मैं आपको श्राप देता हूँ की आपको मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ेगा। आपने मुझे स्त्री से दूर किया है इसलिए आपको भी स्त्री से दूर रहना पड़ेगा। आपने मुझे बन्दर का रूप देकर मेरा उपहास किया इसलिए आपको बंदरों से सहायता लेनी पड़ेगी। भगवान विष्णु ने इन सभी श्रापों को स्वीकार किया और नारद जी के ऊपर से अपनी माया को हटा लिया। इस कारण त्रेतायुग में विष्णु जी को राम अवतार के रूप में जन्म लेना पड़ा। उनको सीता जी से दूर रहना पड़ा वानर सेना से सहायता लेनी पड़ी।