पूर्वजन्म में कर्ण महारथी कर्ण माता कुंती का पुत्र और पांडवों का बड़ा भाई था पर कर्ण को सम्पूर्ण जीवन अपमान और श्राप की छाया में व्यतीत करना पड़ा और अंत में उसके  अर्जुन ने महाभारत युद्ध में उसका वध कर दिया । पाठकों लेकिन ये बहुत कम ही लोग जानते हैं की ऐसा कर्ण के पूर्व जन्म में किये गए पाप के कारण हुआ। पूर्वजन्म के पाप के कारण ही कर्ण को अर्जुन के हाथों मरना पड़ा।  

सहस्त्र कवच और सूर्य देव

कथा के अनुसार त्रेता युग में दम्बोद्भव नाम का एक असुर हुआ करता था. उसने सूर्यदेव की घोर तपस्या की ।दम्बोद्भव की कठिन तपस्या से सूर्यदेव प्रसन्न हो प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने को कहा । दम्बोद्भव ने सूर्यदेव से अमरत्व का वरदान माँगा । लेकिन सूर्य देव ने मना कर दिया तब दम्बोद्भव ने वरदान में एक हजार दिव्य कवच माँगा । साथ ही मांगा की इन दिव्य कवचों को वही तोड़ सके जिसने एक हजार वर्ष तक तपस्या की हो । और जो भी उनके इन दिव्य कवचों को तोड़े उसकी उसी समय मृत्यु हो जाये । दम्बोद्भव के मांग सुनकर सूर्यदेव चिंतित हो गए। वो ये जानते थे की ये असुर इस वरदान का गलत उपयोग करेगा ।किन्तु सूर्यदेव वर देने को मजबूर थे । इस तरह वह सहस्र कवच के नाम से जाना जाने लगा। वरदान प्राप्त कर दम्बोद्भव खुद को अमर मानने लगा। वरदान के अहंकार में लोगों पर अत्याचार करने लगा।

नर और नारायण का जन्म

उधर दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री मूर्ति का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र धर्म से किया। मूर्ति विष्णु जी की परम भक्त थी। उसने सहस्र्कवच के बारे में सुन रखा था।इसलिए उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि इसे ख़त्म करने के लिए वो आगे आएं । मूर्ति की विनती पर विष्णु जी ने कहा की दम्बोद्भव को ख़त्म करने के लिए वे उसके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे ।  कुछ समय बाद मूर्ति ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिसका नाम नर और नारायण था ।

नर और नारायण की तपस्या :

कहने को नर और नारायण दो शरीर थे लेकिन इनकी आत्मा एक ही थी । दोनों भाई बड़े हुए और वन को चले गए । जहाँ नारायण तप करने लगा । एक दिन दम्बोद्भव उस वन में आया और तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा ।उस मनुष्य ने दम्बोद्भव के नजदीक आकर कहा,” मेरा नाम नर है और मैं तुमसे युद्ध करने आया हूँ ।” नर की बात सुनकर दम्बोद्भव ने कहा, ” हे बालक तुम मेरे बारे में क्या जानते हो? मेरा वध वही कर सकता है जिसने एक हजार वर्षों तक तपस्या की हो ।”नर ने हँसते हुए कहा, ” तुम्हारे सामने जो व्यक्ति तपस्या में लीन है वो मेरा भाई नारायण है । मैं और मेरा भाई नारयण एक ही हैं । वह मेरे बदले तप कर रहा है और मैं तुमसे युद्ध करूँगा ।”इसके बाद दोनों दम्बोद्भव और नर में युद्ध शुरू हो गया ।

दम्बोद्भव के साथ युद्ध : पूर्वजन्म कर्ण

जैसे ही हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया । सूर्य के वरदान के कारण कवच टूटते ही नर की मौत हो गयी । यह देख सहस्र कवच खुश हो गया और सोचा की अभी तो एक ही कवच टुटा है । तभी उसने देखा की नर की तरह ही एक व्यक्ति उसकी ओर दौड़ कर आ रहा है । और नर का मृत शरीर जमीन पर पड़ा हुआ है । इतने में वह व्यक्ति नर के पास आकर रुक गया । वास्तव में वो नारायण थे । ये देख दम्बोद्भव ने कहा,  “हे नारायण  तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था ।  इसने व्यर्थ ही अपने प्राण गँवा दिए ।” नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए । उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे ।

भाई के जीवित होते ही नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या करने लगे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया । इसी तरह 999 बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । जब 999 कवच टूट गए तो दम्बोद्भव समझ गया की उसकी मृत्यु नजदीक आ गयी है और युद्ध से भाग कर सूर्यदेव के पास गया ।

सूर्यदेव की शरण में दम्बोद्भव : पूर्वजन्म कर्ण

इधर नर और नारायण भी दम्बोद्भव का पीछा करते सूर्यदेव के पास पहुंचे और सूर्यदेव से दम्बोद्भव को सौंपने को कहा । लेकिन सूर्यदेव इसके लिए राजी नहीं हुए । तब नारायण ने सूर्यदेव को श्राप दिया “आप इस असुर को बचाने का प्रयास कर रहे हैं । जिस कारण आप भी इसके पापों के भागीदार हो । सलिए  आपको भी अगले जन्म में इसके साथ सजा भुगतना पड़ेगा ।”

दम्बोद्भव का पुनर्जन्म : पूर्वजन्म कर्ण

यही असुर द्वापर युग में सूर्य के अंश के रूप में कर्ण के नाम से जन्म लिया । कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं थे । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी । उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास था -सूर्य और सहस्रकवच । दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये । कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश था वही उसे महारथी बनाता था । जबकि उसके भीतर असुर के अंश उसे द्रौपदी वस्त्र हरण जैसे अपराध का भागी बनाता था। यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाती । इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए ।

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