कौन ख़त्म कर सकता था महाभारत युद्ध? महाभारत में वर्णित कई ऐसी कथाएं हैं जिससे आज भी लोग अनजान हैं । जैसे की पाण्डु पुत्र भीम का महाबली पौत्र बर्बरीक अत्यंत बलशाली था ।  बर्बरीक के पास दिव्यशक्तियां थी वह अकेले ही ख़त्म कर सकता था महाभारत युद्ध जिस कारण भगवान श्रीकृष्ण ने उससे सिर मांग लिया ।

बर्बरीक घटोत्कच का पुत्र और भीम का पौत्र था । बचपन में एक दिन वो अपनी दादी हिडिम्बा के साथ आराम कर रहा था । तभी उसने  दादी से पुछा, “मुक्ति क्या होता है?” बर्बरीक के सवालों का जवाब देते हुए उसकी दादी ने कहा, ” हे बर्बरीक,मुक्ति हर मनुष्य का परम उदेश्य होता है जिसे पाकर मनुष्य मृत्यु और जीवन के चक्र से मुक्त हो जाता है और परमात्मा में लीन हो जाता है ।” लेकिन बर्बरीक ने  दादी से फिर सवाल किया “दादी ये तो बताओ की  मुक्ति कैसे प्राप्त की जाती है?” हिडिम्बा ने बर्बरीक के सवाल का जवाब देते हुए कहा, “जो मनुष्य अपने कर्मो के फल को त्याग देता है उसे मुक्ति प्राप्त होती है । इसे पाने में मनुष्य को कई जन्म लग जाते हैं ।”

तब बर्बरीक ने अपनी दादी से सरलता से मुक्ति पाने का उपाय पुछा । दादी ने बर्बरीक से कहा , “जिस किसी मनुष्य की मृत्यु प्रभु के हाथों होती है वह उसी समय परमात्मा में लीन हो जाता है ।” तत्पश्चात बर्बरीक ने कठिन तपस्या की और शक्ति अर्जित करने का सोचा जिससे की उससे कोई मानव न मार सके । इसके बाद बर्बरीक ने महिसागर संगम पर कठिन तपस्या शुरू कर दी । बर्बरीक की तपस्या से प्रसन्न होकर नवदुर्गा ने उसे अपने नौ रूपों के दर्शन दिए और बलशाली होने का वरदान दिया ।साथ ही माँ नवदुर्गा ने बर्बरीक से उसी स्थान पर माँ सिद्धिदात्री की तपस्या करने को कहा ।

बर्बरीक ने नवदुर्गा की सलाह मानकर माँ सिद्धिदात्री की तपस्या आरम्भ की । माँ सिद्धिदात्री बर्बरीक के घोर तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वासुदेव अस्त्र प्रदान किया । इतने से भी बर्बरीक को संतुष्टि नहीं मिली ।  उसने  माँ सिद्धाम्बिका का तप करना शुरू किया । बर्बरीक की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ सिद्धिअम्बिका ने उसे अपराजिता अस्त्र प्रदान किया ।  जिसके बाद बर्बरीक अजय हो गया ।

कुछ समय बाद जब कुरुक्षेत्र में कौरवों  और पांडवों के बीच युद्ध शुरू होने वाला था ।  बर्बरीक ने भी युद्ध में भाग लेने के लिए कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया । इधर भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक की शक्ति से भलीभांति परिचित थे ।  उन्हें डर था की कही बर्बरीक के कारण इस युद्ध में कौरवों की जीत न हो जाये क्योंकि बर्बरीक ने प्रतिज्ञा ली थी की वह कमजोर पक्ष से युद्ध करेगा । बर्बरीक को रोकने के उदेश्य से सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक को रोका । यह जानकर उनकी हँसी भी उड़ायी की वह मात्र तीन बाण लेकर युद्ध में सम्मिलित होने आया है । ब्राह्मण रुपी कृष्ण की बातें सुनकर  बर्बरीक ने कहा, “मेरे तो  एक बाण ही  शत्रु सेना को परास्त करने के लिये पर्याप्त है ।

यदि मैंने सारे बाणों का प्रयोग किया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा ।”  इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती देते हुए कहा, “इस पीपल के पेड़ के सभी पत्तों में छेदकर दिखलाओ”  जिसके नीचे वो दोनो खड़े थे । बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करते हुए अपने तुणीर से एक बाण निकाला ।  ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया । तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा  क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था ।

तत्पश्चात बर्बरीक ने एक बाण पांडवों की शिविर की ओर चलाना चाहा लेकिन  श्री कृष्ण ने धर्म की विजय के लिए सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सर उसके धड़ से अलग कर दिया । बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा, “प्रभु मेरा तो  मुख्य उदेश्य आपके हाथों मृत्यु प्राप्त करना था । मैंने तो आपको देखते ही पहचान लिया था और जानबूझकर आपको क्रोधित कर रहा था ।” बर्बरीक के इस बलिदान से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वरदान मांगने को कहा । बर्बरीक ने पूरा महाभारत युद्ध देखने की इच्छा जताई तो श्री कृष्ण ने युद्ध के अंत तक उसके सर को जिन्दा रहने का वरदान दिया ।

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