श्रोताओं भारत पौराणिक काल में जैसे साधु और संतों की स्थली रही है। वैसे ही भारत में नाथ योगियों की परंपरा भी बहुत ही प्राचीन काल से रही है। नाथ परंपरा को हिन्दू सनातन धर्म का एक अभिन्न अंग माना गया है। इस नाथ परंपरा में एक से बढ़कर एक महान योगी हुए। जिन्होंने हिन्दू धर्म को एक नए ढंग से परिभाषित किया। आज में इसी नाथ संप्रदाय में जन्मे एक  महान योगी बाबा गुरु गोरखनाथ के बारे में बताने जा रहूं।

मत्स्येन्द्रनाथ की कथा

हिन्दू धर्म में गुरु गोरखनाथ को महान योगी माना जाता है। ऐसा माना जाता है की गुरु गोरख नाथ जी का जन्म किसी स्त्री के गर्भ से नहीं हुआ था | वो एक गोबर के ढेर से उत्पन्न हुए थे। कथा के अनुसार एक बार गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी भिक्षा मांगने एक गांव  गए | जहाँ उन्हें  एक रोती बिलखती महिला दिखी। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जब उस महिला के नजदीक गए | वो महिला उनके चरण पकड़ कर और जोर से रोने लगी। यह देख मत्स्येंद्रनाथ जी ने उसे उठाते हुए पूछा हे माई तुम क्यों रो रही हो। तब महिला ने कहा बाबा मेरे विवाह के कई साल हो गए।  लेकिन मुझे अभी तक संतान सुख की प्राप्ति नहीं हुई है। इसलिए हे बाबा आप मुझे माँ बनने का आशीर्वाद दें ताकि मैं जल्द से जल्द अपने संतान का मुख देख सकूँ।

महिला की बात सुनकर मत्स्येंद्रनाथ जी ने मन्त्र पढ़ना शुरू किया। फिर झोली से निकाल कर एक चमत्कारी भस्म महिला को दिया। और बोले इस भस्म के सेवन से तुम्हे पुत्र धन की प्राप्ति होगी और वो वहां से चले गए। इधर वो महिला भस्म लेकर अपनी सहेलियों के पास पहुंची और उन्हें सब बातें बताई | महिला के सहेलियों ने उससे कहा की भला कोई स्त्री भस्म से कैसे गर्भवती हो सकती है। उस पाखंडी बाबा ने तुम्हे ठगा है। महिला भी अपनी सहेलीयों की बातों में आकर उस दिव्य भस्म को एक गोबर की ढेर पर फ़ेंक आई।


गोबर के ढेर से हुआ जन्म

समय बीतता गया उस महिला को कोई भी संतान नहीं हुआ। भाग्य से 12 साल बाद एक दिन मत्स्येंद्रनाथ जी उसी गांव से गुजर रहे थे। उसी समय उन्हें वह महिला दिखाई दी। जिसे उनहोने 12 साल पहले संतान प्राप्ति के लिए दिव्य भस्म दिया था। वो उस महिला के नजदीक गए और पूछा कैसी हो माई और तेरा बेटा कैसा है। अब तो वह बड़ा हो गया होगा। मत्स्येंद्रनाथ जी की बातें सुनकर महिला रोने लगी और सारी बातें मत्स्येंद्रनाथ जी को बता दी। महिला की बातें सुनकर मत्स्येंद्रनाथ जी आश्चर्यचकित रह गए। फिर बोले अरे माई वो दिव्य भस्म था और वो कभी व्यर्थ नहीं हो सकता। क्या तुम मुझे उस गोबर के ढेर के पास ले जा सकती हो। मत्स्येंद्रनाथ जी की बात सुनकर महिला ने हाँ में अपना सर हिलाया और वहां से दोनों चल पड़े।

गोरखनाथ जी का जन्म

कुछ देर चलने के बाद दोनों एक गोबर के ढेर के पास पहुंचे। महिला ने बाबा को बताया की यही वो गोबर का ढेर है जहाँ उसने उस दिव्य भस्म को फेंका था। इसके बाद मत्स्येंद्रनाथ जी ने बालक को आवाज लगाना शुरू किया। उसी समय चमत्कार हुआ और गोबर के ढेर को चीरता हुआ एक दिव्य बालक उत्पन्न हुआ। जो देखने में 12 साल का ही लग रहा था। उसके बाद बालक ने मत्स्येंद्रनाथ को प्रणाम किया। गोबर से उत्पन्न होने के कारण मत्स्येंद्रनाथ जी ने उस बालक का नाम गोरखनाथ रखा।  फिर बालक को साथ लिए तपस्या करने वन की और चल दिए।  यही बालक आगे चलकर गुरु गोरख नाथ कहलाया जिसके नाम पर उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर बना हुआ है।

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