वैसे तो महाभारत के मुख्य पात्र और कुरुवंश के स्तम्भ पितामह भीष्म को धर्म का प्रतीक  माना जाता है लेकिन कुछ  विद्वानो का मानना हैं की भीष्म के कारण ही महाभारत युद्ध हुआ।साथ ही विद्वानों का ये भी कहना है की भीष्म ने पूर्व जन्म में कई अपराध किए थे जिसकी वजह से उनकी मृत्यु  बाणों की शय्या पर हुई। पाठकों तो आइये जानते हैं की उन्होंने कौन कौन से घोर पाप किये थे।

पूर्व जन्म में वसु थे भीष्म

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार भीष्म अपने पिछले जन्म में एक वसु थे।आठ वसु भाइयों में से एक ‘द्यु’ नामक वसु ने एक बार वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु नाम के गाय का हरण कर लिया।इससे क्रोधित होकर वशिष्ठ ऋषि ने आठों वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।ऋषि के श्राप से वसुओं ने घबराकर महर्षि वशिष्ठजी से क्षमा के लिए प्रार्थना की।वसुओं की प्रार्थना पर महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि, ” द्यु को छोड़ अन्य सारे वसु जन्म लेने के तुरंत बाद श्राप से मुक्त हो जाओगे।लेकिन ‘द्यु’ को अपनी करनी का फल जीवनभर भोगना होगा।”यही द्यु अपने अगले जन्म में गंगा की कोख से देवव्रत के रूप में जन्म लिया और देवव्रत ही आगे चलकर अपने भीषण प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाए।

भीष्म के घोर पाप

ऐसा माना  जाता है की प्रतिज्ञा लेने के बाद भीष्म ने हस्तिनापुर की गद्दी पर कुरुवंश का शासन बरकरार रखने के लिए कई तरह के अपराध किए थे। सत्यवती के कहने पर ही भीष्म ने काशी नरेश की 3 पुत्रियों अम्बा, अम्बालिका और अम्बिका का अपहरण किया था।बाद में अम्बा को छोड़कर सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य से अम्बालिका और अम्बिका का विवाह करा दिया था।गांधारी और उनके पिता सुबल की इच्छा के विरुद्ध भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से करवाया था।माना जाता है की इसीलिए गांधारी ने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी।

भरी सभा में जब द्रौपदी को निर्वस्त्र किया जा रहा था तो भीष्म चुप बैठे थे।भीष्म ने जान बूझकर दुर्योधन और शकुनि के अनैतिक और छलपूर्ण खेल को चलने दिया।शरशैया पर भीष्म जब मृत्यु का सामना कर रहे थे तब भीष्म ने द्रौपदी से इसके लिए क्षमा भी मांगी थी।महाभारत युद्ध में जब कौरवों की सेना जीत रही थी तो भीष्म ने ऐन वक्त पर पांडवों को अपनी मृत्यु का राज़ बताकर कौरवों के साथ धोखा किया था और युद्ध में भीष्म को बाणों की शय्या पर लेटना पड़ा था जो उनके पूर्व जन्म के अपराध के कारण मिला।

क्यों मिली बाणो की शय्या?

जब भीष्म बाणो की शय्या पर लेटे थे तो श्रीकृष्ण उनसे मिलने आये।तब भीष्म ने श्रीकृष्ण से पूछा, “हे मथुसुदन मेरे ये कौन से कर्मों का फल है जो मुझे बाणों की शय्या मिली?”तब श्रीकृष्ण ने कहा, “पितामह आप कुछ  जन्म पूर्व जब एक राजकुमार थे तब आप एक दिन शिकार पर निकले।उस वक्त एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरकर आपके घोड़े के अग्रभाग पर बैठा था। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया।”

 उस समय वह कांटेदार पेड़ पर जाकर गिरा और कांटे उसकी पीठ में धंस गए।करकैंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकैंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा “हे युवराज जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूं, ठीक इसी प्रकार तुम्हारी भी मृत्यु हो।”इसी कारण आपको इस जन्म में बाणों की शय्या पर लेटना पड़ा है और यही शय्या आपको आपके श्राप से मुक्त भी करवाएगा।”

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