शिवपुत्र जलंधर

आज हम आपको शिवपुत्र जलंधर की कथा बताने जा रहे हैं। आखिर जलंधर कौन था और उसका जन्म कैसे हुआ था। जलंधर को शिवपुत्र क्यों कहा जाता है। आइये मिलकर जानते हैं शिवपुत्र जलंधर की कथा।

कौन था जालंधर ?

एक बार इंद्र देव ने गुरु बृहस्पति के साथ शिव के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत जा रहे थे। जब महादेव को इंद्र के आने का पता चला तो उन्होंने इंद्र की परीक्षा लेने के लिए एक जोगी का रूप धारण कर लिया। फिर उनके रास्ते में बैठ गए। इंद्र ने जोगी रूप में शिव जी से पूछा तुम कौन हो? शिव जी बिना कोई उत्तर दिए शांति से बैठे रहे। इंद्र ने अपना प्रश्न दोहराया, तब भी जोगी ने कोई उत्तर नहीं दिया। यह देख इंद्र को क्रोध आया और उन्होंने अपने वज्र से जोगी पर आक्रमण करने का प्रयास किया। यह देख शिव जी क्रोधित हो उठे। क्रोध के कारण उनके नेत्र लाल हो गए। अब तक गुरु बृहस्पति समझ गए थे कि जोगी के रूप में स्वयं महादेव हैं। उन्होंने शिव जी से विनती की कि वो इंद्र को क्षमा कर दें। 

गुरु बृहस्पति की विनती को स्वीकार कर शिव जी ने अपने नेत्र समुद्र कि ओर कर दिए। और इस प्रकार शिव जी ने इंद्र को क्षमा किया। फिर वापस कैलाश कि ओर प्रस्थान कर गए। इंद्र एवं बृहस्पति भी अपने स्थान पर वापस लौट गए।

जलंधर का जन्म कैसे हुआ

महादेव ने अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में डाला। यह एक ऐसा स्थान था जहाँ समुद्र और गंगा का मिलाप होता है । वर्तमान में इसे गंगासागर कहा जाता है । शिव जी की क्रोधाग्नि से समुद्र से एक बालक उत्पन्न हुआ । वो बालक बहुत ज़ोर ज़ोर से रोने लगा । उसके रोने की ध्वनि से सम्पूर्ण संसार बहरा हो गया । सभी देवता परेशान होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे । तब ब्रह्मा जी उस ध्वनि का अनुसरण करते हुए समुद्र तक गए और बालक को गोदी में उठाया । तब बालक ने ब्रह्मा जी का गला बहुत ज़ोर से पकड़ लिया । जिस कारण उनकी आँखों में आंसू आ गए।  ब्रह्मा ने इस बालक का नाम जलंधर रखा । शुक्राचार्य को बुलाकर बालक का राज्याभिषेक किया गया । समुद्र ने उसका पालन पोषण किया ।




जलंधर का विवाह

जलंधर का विवाह कालनेमि नामक असुर की पुत्री वृंदा के साथ हुआ । वृंदा भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी । आगे जाकर जलंधर राक्षसों का शासक बना । ऐसा कहा जाता है कि जलंधर की शक्ति का रहस्य उसकी पतिव्रता पत्नी थी । वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर को देवी देवता भी पराजित नहीं कर सकते थे । जिस कारण जलंधर को बहुत अभिमान हो गया था । उसे लगता था कि उस पर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता । जलंधर ने अपने पूरे जीवन में बहुत सी गलतियां की । परन्तु उसकी सबसे बड़ी गलती थी वृंदा के पतिव्रत धर्म की अवहेलना करना । वो देवताओं की पत्नियों को सताने लगा था । केवल देवता ही नहीं यहाँ तक कि एक बार उसने बैकुंठ पर आक्रमण कर लक्ष्मी जी को भी प्राप्त करने का प्रयास किया ।

शिव और जालंधर का युद्ध

तब लक्ष्मी जी ने जलंधर से कहा कि हम दोनों की उत्पत्ति जल से हुई है । इसलिए हम दोनों के मध्य भाई बहिन का सम्बन्ध है । लक्ष्मी जी की बात सुनकर जलंधर बैकुंठ से वापस चला गया । इसके पश्चात् वो कैलाश पहुंचकर पार्वती जी को अपने अधीन करना चाहता था । यह देख पार्वती क्रोधित हो उठीं और इस कारण शिव और जलंधर के बीच युद्ध आरम्भ हुआ । परन्तु जलंधर की शक्ति के कारण महादेव हर प्रहार में विफल होते गए ।

जलंधर का वध

तब भगवान विष्णु जलंधर के रूप धारण कर वृंदा के समक्ष पहुंचे । वृंदा ने सोचा की जलंधर उसके पास आया है । वो भगवान विष्णु के साथ पत्नी जैसा व्यवहार करने लगी  । जिससे उसका पत्नी धर्म टूट गया और कैलाश पर शिव जी जलंधर का वध करने में सफल हुए । सतीत्व टूट जाने के कारण वृंदा ने लाज से आत्मदाह कर लिया । उसके शरीर के भस्म होने से उस स्थान पर तुलसी का पौधा उग आया । अर्थात तुलसी वृंदा का ही रूप है जो भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है ।

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