हिन्दूधर्म में जन्म को शुभ और मृत्यु को अशुभ क्यों माना जाता है?

हिन्दुओं में जयंतियों को बड़ा शुभ माना जाता है। वहीं पुण्यतिथियों को कम तरज़ीह दी जाती है। रामायण को महाभारत से ज़्यादा पूजा जाता है क्योंकि रामायण में राम के जन्म की बात कही गई है, वहीं महाभारत में कृष्ण के जन्म का कहीं ज़िक्र नहीं है। ज़्यादा मान-सम्मान भागवत पुराण को दिया जाता है जिसमें कृष्ण के जन्म का वर्णन है। तो आई जानते हैं की हिन्दूधर्म में जन्म को शुभ और मृत्यु को अशुभ क्यों माना जाता है?

हिन्दुओं के ज़्यादातर त्योहार किसी भगवान के जन्म या किसी राक्षस के मरने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। जैसे भगवान राम, कृष्ण और हनुमान के जन्म दिवस मनाए जाते हैं। वैसे ही दुर्गा माता के हाथों महिषासुर का मरना, भगवान राम का रावण को मारना एक उत्सव की तरह मनाया जाता है।

ईसाइयों और मुस्लिमो के  त्योहार ज़रा अलग तरह के होते हैं। इनके कई त्योहार तो मृत्यु के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है। ईसाई जीसस क्राइस्ट का मरने का मातम गुड फ्राइडे के नाम से मनाते हैं वहीँ शिया मुस्लिम भी मुहम्मद साहब के दामाद के मरने का मातम मुहर्रम के नाम से मनाते हैं।

क्या सच में स्वर्ग और नर्क होता है ?

हमारे वेदों में लिखा है शरीर नश्वर है,आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर में प्रवेश करती है तथा उसे छोड़ने के बाद दूसरे शरीर में जाने का इंतजार कराती है। मनुष्य के जीवन का मूल उदेश्य परम चेतना को प्राप्त कर परमात्मा से मिलना है। जन्म के समय इसी परम चेतना को प्राप्त करने का अवसर हर आत्मा को ईश्वर प्रदान करते हैं जो मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। यही मूल कारण है की हिन्दू धर्म में जन्म को शुभ और मृत्यु को अशुभ माना गया है।

वेदों ने मृत्यु को जीवित प्राणियों के दुख के प्रमुख स्रोत के रूप में जाना। वे प्राकृतिक आपदाओं, उम्र बढ़ने, बीमारी और उनके कारण होने वाली मृत्यु के सामने मनुष्य को असहाय मानते है।जब तक मनुष्य जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसा हुआ है तब तक  मृत्यु उसके जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है। क्योंकि वो मृत्यु है जो सभी में छिपी हुई है। वो मृत्यु ही है जो जीवन से भी पहले आ गयी थी और वो मृत्यु ही है जो सभी को नष्ट कर देती है| मृत्यु दुनिया का प्रवाह बनाये रखती है और एक अवस्था से दूसरी अवस्था में ले जाती है। 

हर धर्म के लोग वर्ष में कम से कम एक दिन तो गुज़र चुके अपनों को याद करते हैं। हिन्दुओं में ये पितृपक्ष के 16 दिन में होता है, जब गुजर चुके लोगों के लिए रस्में की जाती हैं। पूजा की जाती है,घरों में कई तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं और ब्राह्मीणो को दान दिया जाता है। लेकिन एक अंतर है. ईसाई धर्म और इस्लाम में माना जाता है कि मरे हुए लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी जी ली है। और अब बस उनका आखिरी फैसला होना बाकी है।

वहीं हिन्दू वही हिन्दू समाज के लोग लाश का कोई भी हिस्सा घर के अंदर या आस-पास भी नहीं आने देते। वो हर चीज़ जो मुर्दों को छू जाए, उसे अपवित्र और मनहूस मानते हैं। दूसरे धर्मों की तुलना में हिन्दू रीति रिवाज़ मरे हुए लोगों से सबसे कम ताल्लुक़ रखते हैं और यह भी तब जब हिन्दू धर्म मौत के बाद पुनर्जन्म पर विश्वास रखता हैं| इसलिए पाठकों मौत से हमें डरना नहीं है क्यूंकि मौत हमें जकड़ कर रखती है. आगे बढ़ने से रोके रखती है.. हिन्दू परंपराओं में भूतकाल को भूलकर आगे की तरफ़ ध्यान देना बेहतर माना जाता है।