मित्रों श्री कृष्ण के व्यक्तित्व के अनेक पहलू हमें देखने को मिलता है। बालरूप में कभी वो माँ के सामने रूठने की लीलाएँ करने वाले बालकृष्ण के रूप में दिखते हैं तो कभी उसी बालरूप में दैत्यों और असुरों का वध करते समय उनका रौद्र रूप हमें देखने को मिलता है। जबकि  बड़े होने पर धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते समय उनका योगेश्वर कृष्ण रूप हमें देखने को मिलता है। और यही कारण है की भगवान श्री कृष्ण  के भक्त उन्हें लीलाधर के नाम से भी उन्हें पुकारते हैं। जैसा की हम सभी जानते हैं की बालकृष्ण ने पूतना राक्षसी का वध किया था लेकिन पूतना के आलावा भी कई और दैत्य थे जिनका अंत श्री कृष्ण ने अपने बालरूप में किया था। इस पोस्ट में हम आपको श्री कृष्ण के द्वारा बालरूप में किये गए कुछ ऐसी लीलाओं के बारे में बताएँगे।

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महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार जब श्री कृष्ण के माता-पिता देवकी और वसुदेव का विवाह संपन्न हुआ तो एक आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी में यह बताया गया की देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाला आठवीं संतान कंस का वध करेगा। आकाशवाणी सुनकर देवकी के भाई और मथुरा नरेश कंस घबरा गया और उसने अपने बहन और बहनोई को मथुरा के बंदीगृह में कैद कर दिया। बाद में बंदीगृह में कंस ने देवकी और वसुदेव की सात संतानों का बारी बारी से वध कर दिया लेकिन आठवीं संतान के रूप में जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो भगवान की माया से वसुदेव ने कृष्ण को यशोदा के घर पहुंचा दिया। लेकिन यह बात अधिक दिनों तक छिप न सकी. कंस को मालूम पड़ गया कि देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो चुका है और वह गोकुल में है। इसके बाद कंस ने कई राक्षसों और दैत्यों को कृष्ण की हत्या करने के लिए भेजा परन्तु श्री कृष्ण ने कान्हा के रूप में इन सभी राक्षसों का वध कर दिया।

1) पुतना का वध

मथुरा नरेश कंस ने सबसे पहले पूतना नाम की राक्षसी को श्री कृष्ण का वध करने के लिए गोकुल भेजा। पूतना ने कंस की आज्ञा से गोकुल पहुंचकर एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर लिया और अपने स्तन में विष का लेप लगाकर गोकुल में जन्मे नवजातशिशु को स्तनपान के जरिये मारने लगी। इसी क्रम में एक दिन मौका पाकर पुतना ने पालने में खेल रहे कृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। परन्तु श्री को यह ज्ञात हो गया की यह कोई साधारण स्त्री नहीं है बल्कि एक राक्षसी है। फिर उन्होंने सबसे पहले स्तनपान करते-करते उसके शरीर में मौजूद सारे दूध पि लिए और फिर उसके प्राण खींचने लगे जिसकी वजह से राक्षसी पूतना दर्द से चींखने लगी और श्री कृष्ण को लेकर आकाश में उड़ चली परन्तु कुछ देर बाद वह धराम से निचे आ गिरी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए । यह देख गोकुल वासी आश्चर्य चकित हो गए,उधर जब इस बात का पता कंस को चला तो वह तिलमिला उठा और  तृणावर्त नाम के असुर को श्री कृष्ण को मारने के लिए गोकुल भेजा।

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2) तृणावर्त का वध

कंस ने भगवान कृष्ण को मारने के लिए अनेकों प्रयास किये थे। इस बार कंस ने भगवान श्री कृष्ण का वध करने के लिए तृणावर्त नाम के एक राक्षस को भेजा। यह राक्षस कंस का ख़ास निजी सेवक भी था।  कंस की आज्ञा पाकर तृणावर्त ने एक बवंडर का रूप धारण कर लिया और वह गोकुल पहुँच गया। भगवान श्री कृष्ण को देखते ही वह असुर उन्हें अपने साथ आकाश में उड़ा ले गया। आंधी के कारण गोकुल के लोग लोग देखने में भी असमर्थ हो गए। सारा गोकुल कुछ समय के लिए अंधकारमय हो गया। जब वह आंधी कम हुई तो लोग  यशोदा जी की पुकार सुनकर उनकी और दौड़ पड़े। यशोदा जी उस समय अपने पुत्र को न देखकर फूट-फूटकर रो रही थी। वहीँ तृणावर्त श्री कृष्ण का वध करने के लिए उन्हें आकाशमण्डल में ले गया। उधर जब भगवान कृष्ण को यह पता चला की यह एक दैत्य है तो उन्होंने अपना भार इतना बढ़ा लिया कि तृणावर्त उनका भार संभाल ही नहीं पा रहा था। जिसकी वजह से उसका वेग कम हो गया और वह आगे की और बढ़ न सका। तृणावर्त भगवान कृष्ण के भार को नीलगिरी चट्टान के बराबर समझने लगा। उसके बाद श्री कृष्ण ने तृणावर्त का गला इतनी जोर से पकड़ा की वह उनसे अपना गला छुड़ा ही नहीं पाया। उस राक्षस का दम घुटने लगा। उसकी आँखें बाहर की और आने लगी और वह कुछ बोल भी नहीं पा रहा था और उसके प्राण वहीँ पर निकल गए।उसके बाद गोकुल वासियों ने देखा कि एक भयानक राक्षस एक चट्टान पर जाकर गिर पड़ा है और उस राक्षस का प्रत्येक अंग चकनाचूर हो गया है। भगवान श्री कृष्ण उसके शरीर पर बैठे हुए हैं। यह देखकर वहां खड़े सभी लोग आश्चर्य चकित हो गए।

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3) वृषभासुर का वध

तृणावर्त की मौत की खबर सुनकर कंस क्रोध से पागल हो गया और उसने बदला लेने के लिए वृषभासुर नामके असुर को गोकुल भेजा। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार व्रज में आनंदोत्सव मनाया जा रहा था। उसी समय वहां एक असुर वृषभासुर आ गया। वह राक्षस एक बैल का रूप धारण करके गायों के बीच में जा घुसा। वह बैल बहुत ही विशाल था। दिखने में उसका शरीर सबसे अलग ही प्रतीत हो रहा था। कुछ समय बाद बैलरूपी वृषभासुर अपने खुरों को जोर-जोर से पटकने लगा। जिससे धरती भी कांपने लगी। उसकी गर्जना इतनी भयनाक थी कि गायों और स्त्रियों के गर्भ तक गिरने लगे । उसे देखकर लोग अत्यंत ही भयभीत हो गए। यहां तक कि पशु भी भयभीत होकर अपने स्थान को छोड़कर भागने लगे। सभी लोग भगवान श्री कृष्ण को पुकारने लगे और कहने लगे कि कान्हा हमें इस बैल से बचाओ। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने सभी लोगों को साहस बंधाया और कहा कि डरने की कोई बात नहीं है। भगवान श्री कृष्ण समझ गए थे कि यह कोई यह कोई बैल नही है बल्कि कोई राक्षस है। श्री कृष्ण ने उस बैल को ललकारा और कहा कि हे पापी! रूक जा तु इन पशुओं और मासूम लोगों को क्यों डरा रहा है। इतना कहकर भगवान श्री कृष्ण ने उस बैल को क्रोध दिलाया और एक मित्र के कंधे पर हाथ रखकर खड़े हो गए। यह सुनकर वृषभासुर को अत्ंयत क्रोध आया ।वह धरती को अपने खुरों से खरोंचने लगा और अचानक ही उसने भगवान श्री कृष्ण पर हमला कर दिया। उसनें अपनी पूंछ को जोर – जोर से घूमाना शुरु कर दिया और सींगों को आगे की और लाकर लाल आंखों से श्री कृष्ण पर झपटा। लेकिन श्री कृष्ण ने उसके सींगों को पकड़ लिया और उसे जमीन पर गिरा दिया। लेकिन वह तेजी से उठकर खड़ा हो गया। इसके बाद वह फिर भगवान श्री कृष्ण पर झपटा। उसका पूरा शरीर पीसने से भीगा हुआ था। जब श्री कृष्ण को लगा कि यह राक्षस नहीं मानेगा।

तब भगवान श्री कृष्ण ने उस पर प्रहार करना शुरु कर दिया। श्री कृष्ण ने उसके सीगों को पकड़ा और लात मारकर धरती पर गिया दिया। इसके बाद श्री कृष्ण ने उसे पैरों से दबाना शुरु कर दिया और उसके सींग उखाड़ कर फैंक दिए। उस बैल का मूत्र और गोबर वहीं पर निकल गया और वह दर्द से तड़प-तड़प कर वहीं पर मर गया।

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4) बकासुर का वध

कंस ने वत्सासुर के बाद बकासुर को कृष्ण को मारने के लिए भेजा। बकासुर एक बगुले का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को मारने के लिए पहुंचा। एक दिन की बात है, सब ग्वालबाल अपने झुंड-के-झुंड बछड़ों को पानी पिलाने के लिए जलाशय के तट पर ले गये। उन्होंने पहले बछड़ों को जल पिलाया और फिर स्वयं भी पिया। ग्वालबालों ने देखा कि वहाँ एक बहुत बड़ा जीव बैठा हुआ है। वह ऐसा मालूम पड़ता था, मानों इन्द्र के वज्र से कटकर कोई पहाड़ का टुकड़ा गिरा हुआ है। ग्वालबाल उसे देखकर डर गये। वह ‘बक’ नाम का एक बड़ा भारी असुर था, जो बगुले का रूप धर के वहाँ आया था। उसकी चोंच बड़ी तीखी थी और वह स्वयं बड़ा बलवान था। उसने झपटकर कृष्ण को निगल लिया। परन्तु बगुले के अंदर पहुंचते ही श्री कृष्ण अपने शरीर से अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करने लगे जिसकी ताप की वजह से उस दैत्य ने श्रीकृष्ण के शरीर पर बिना किसी प्रकार का घाव किये ही झटपट उन्हें उगल दिया और फिर बड़े क्रोध से अपनी कठोर चोंच से उन पर चोट करने के लिए टूट पड़ा। तभी श्री कृष्ण ने अपने दोनों हाथों से उसके दोनों चोंच पकड़ लिये और फिर देखते ही देखते उसे बिच से चिर डाला जिसके बाद वह दैत्य अपने असली रूप में आ गया और मारा गया।

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5) अघासुर का वध

बकासुर के वध की खबर सुनकर कंस बहुत ही डर गया और मन ही मन सोचने लगा की उसका अंत निकट आ गया है लेकिन उसने हिम्मत नहीं हरी और फिर उसने एक अघासुर नामके असुर को श्री कृष्ण का वध करने के लिए भेजा। अघासुर पुतना और बकासुर का छोटा भाई था। अघासुर ने कृष्ण को मारने के लिए विशाल अजगर का रूप धारण कर लिया और अपना मुंह खोलकर रास्ते में ऐसे बन बैठा जैसे कोई गुफा हो। उस समय श्रीकृष्ण और सभी बालक वहां खेल रहे थे। गुफा को देखकर सभी बाल ग्वाले और श्री कृष्ण उसके अंदर चले गए और मौका पाकर अघासुर ने अपना मुंह बंद कर लिया। जब सभी को अपने प्राणों पर संकट नजर आया तो सभी श्रीकृष्ण से बचाने की प्रार्थना करने लगे। तभी कृष्ण ने अपना शरीर तेजी से बढ़ाना शुरू कर दिया।जिसकी वजह से अजगर रुपी उस राक्षस का पेट फैट गया और सभी सकुशल बाहर निकल आये और अंत में अघासुर बांकी राक्षसों की तरह परलोक सिधार गया।