देवताओं आदि के साथ श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध

महाभारत काल के पांच श्राप जिन्हें आज भी भुगत रहे हैं लोग

देवताओं आदि के साथ श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध:

देवताओं आदि के साथ श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध, कृष्ण और अर्जुन की कथा | दर्शकों ये तो हम सभी जानते हैं की महाभारत का युद्ध पांडवों और कौरवों के बिच लड़ा गया था और इसमें पांडवों की विजय हुई थी परन्तु हिन्दुओं का धर्मग्रन्थ महाभारत इन धर्म और अधर्म के बिच हुए युद्ध के आलावा भी अपने अंदर कई ऐसी कथाएं समेटे हुए है जिससे आज भी अधिकतर जनमानस अनजान है। आपके लिए महाभारत से एक ऐसी ही कथा लेकर आये हैं जिसे शायद ही आप जानते होंगे। महाभारत की ये कथा भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के देवताओं के साथ हुए युद्ध से जुडी हुई है। तो चलिए अब बिना किसी देरी के जानते हैं की आखिर श्री कृष्ण और अर्जुन के साथ देवताओं को युद्ध क्यों करना पड़ा और इसका परिणाम क्या हुआ ?

धर्मग्रन्थ महाभारत के आदिपर्व में वर्णित ये कथा उस समय की है जब अग्निदेव के कहने पर भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन ने खाण्डव वन का दाह यानि उसे जलना शुरू किया था। खांडव वन में आग लगते ही उसमे रह रहे सभी पशु पक्षी एवं जीव -जंतु रोदन करने लगे। यह देख देवराज इंद्र को रहा नहीं गया और उन्होंने मेघों को वर्षा करने का आदेश दिया और मेघ जब इंद्र की आज्ञा पाकर बरसने लगे तो अर्जुन ने बहुत से बाणो की वर्षा करके सारे खांडव वन को ऐसे ढंक दिया जैसे कुहरा चन्द्रमा को ढक देता है। अर्जुन के चलाये हुए बाणो से सारा खाण्डववन इस तरह ढक गया की कोई भी प्राणी उस वन से निकल नहीं पा रहा था। जब खाण्डव वन जलाया जा रहा था उस वन के राजा महाबली नागराज तक्षक वहां नहीं थे। वे किसी काम से ,कुरुक्षेत्र चले गए थे। परन्तु तक्षक का बलवान पुत्र अश्वसेन वहीं रह गया था। उसने उस आग से अपने को छुड़ाने के लिए काफी प्रयत्न किया। किन्तु अर्जुन के बाणो से रुंध जान के कारण वह बाहर निकल न सका। अंत उसकी माता सर्पिणी अपने पुत्र को बचाने के लिए आकाश में उड़कर भागने की चेष्टा की। परन्तु पाण्डुकुमार अर्जुन ने तीखे बाण से उस भागती हुई सर्पिणी का मस्तक काट दिया। देवताओं आदि के साथ श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध.

महाभारत का युद्ध दिन में ही क्यों लड़ा गया ?

महाभारत श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध |उधर इंद्र सर्पिणी की यह अवस्था अपनी आँखों से देख रहे थे। और फाई उन्होंने उसे छुड़ाने की इच्छा से आंधी और वर्षा कर पाण्डुकुमार अर्जुन को मोहित कर दिया। इतने ही में तक्षक का पुत्र अश्वसेन उस संकट से मुक्त हो गया। किन्तु जब अर्जुन इंद्र की मायाजाल से बाहर आये तो उन्होंने देखा की अश्वसेन बच गया है यह देख उन्हें क्रोध आ गया। उसके बाद अर्जुन ने आकाश में उड़नेवाले प्राणियों के दो-दो,तीन-तीन टुकड़े कर डाले। फिर क्रोध में भरे हुए अर्जुन ने टेढ़ी चाल से चलने वाले उस नाग को शाप दिया अरे तू आश्रयहीन हो जायेगा। अग्नि और श्री कृष्ण ने भी उसका अनुमोदन किया। यह देख देवराज इंद्र ने अपने ऐन्द्रास्त्र को प्रकट किया। फिर तो बड़ी भारी आवाज के साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी। उसने समस्त समुद्रों को क्षुब्ध करते हुए आकाश में स्थित हो मूसलाधार पानी बरसाने वाले मेघों को उत्पन्न किया। वे भयंकर मेघ बिजली की कड़कड़ाहट के साथ धरती पर वज्र गिराने लगे और मूसलाधार वर्षा होने लगी। यह देख अर्जुन ने प्रतिकार के रूप में उन मेघों को नष्ट करने के लिए वायव्य नामक अस्त्र का प्रयोग किया। उस अस्त्र से इंद्र के छोड़े हुए वज्र और मेघों का ओज एवं बल नष्ट हो गया। जल की सारी धाराएं सूख गयीं और बिजलियाँ भी नष्ट हो गयी। क्षणभर में आकाश धुल और अन्धकार से रहित हो गया। और शीतल हवा चलने लगी। यह सब देख अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए और पुनः बड़ी-बड़ी लपटों के साथ प्रज्वलित हो खाण्डववन को अपने में समाने लगे।

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कृष्ण और अर्जुन की कथा | इतने में ही गरुड़ की तरह दिखने वाला एक पक्षी श्रीकृष्ण और अर्जुन की ओर झपटा। फिर नागों का झुण्ड पाण्डव अर्जुन के समीप भयानक जहर उगलते हुए उन पर टूट पड़े। यह देख अर्जुन ने बाणों द्वारा उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और उन सभी के शरीर उसी जलती हुई अग्नि में समा गए। तत्पश्चात असुर,गन्धर्व,यक्ष,राक्षस और नाग युद्ध के लिये उत्सुक हो र्जना करते हुए वहां दौड़े आये। किसी के हाथ में लोहे की गोली छोड़नेवाले यन्त्र था तो कुछ लोगों ने हाथों में चक्र,पत्थर आदि उठा रखे थे। वे सब-के-सब श्रीकृष्ण और अर्जुन को मार डालना चाहते थे।कुछक्षण पश्चात् वे सभी अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे। यह देख अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से उन सबके सिर उड़ा दिये। और महातेजस्वी श्रीकृष्ण ने चक्र द्वारा दैत्यों और दानवों के समुदाय का संहार कर दिया। तब देवताओं के महाराज इंद्र श्वेत ऐरावत पर आरूढ़ हो क्रोधपूर्वक उन दोनों की ओर दौड़े। इंद्र ने बड़े वेग से अपना वज्रास्त्र उठाकर चला दिया और देवताओं से कहा लो ये दोनों मारे गये। इसके बाद एक एक कर सभी देवगन धनुष तलवारऔर अपने अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुन पर टूट पड़े। यह देख श्रीकृष्ण और अर्जुन देवताओं को अपनी बाणों से घायल करने लगे। बहुत से देवता बार-बार प्रयत्न करने पर भी कभी सफल मनोरथ न हो सके। उनकी आशा टूट गयी और वे भय के मारे युद्ध छोड़कर इंद्र की ही शरण में चले गए। श्री कृष्ण और अर्जुन के द्वारा देवताओं की गति कुण्ठित हुई देख आकाश में खड़े हुए महर्षिगण बड़े आश्चर्य में पड़ गये। इंद्र भी उस युद्ध में अर्जुन का पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए और पुनः उन दोनों के साथ युद्ध करने लगे।

तदनन्तर इंद्र ने अर्जुन के पराक्रम की परीक्षा लेने के लिये पुनः उनपर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा करने लगे।परन्तु अर्जुन ने अपने बानो के द्वारा वह सारी वर्षा नष्ट कर दी। उधर जब इंद्र ने देखा की उनके द्वारा पत्थरों की वर्षा विफल हो गई है तो वे पुनः पुनः पत्थरों की भारी वर्षा करने लगे। यह देख इंद्रकुमार अर्जुन ने वेगशाली बाणों द्वारा पत्थरों की उस वृष्टि को फिर विलीन कर दिया। इसके बाद इंद्र ने पाण्डुनन्दन अर्जुन को मारने के लिये अपने दोनों हाथों से एक पर्वत का महान शिखर वृक्षों सहित उखाड़ लिया और उसे उनके ऊपर चलाया। यह देख अर्जुन ने बाणों द्वारा उस पर्वत शिखर को हजारों टुकड़े करके गिरा दिया। छिन्न-भिन्न होकर गिरता हुआ वह पर्वत शिखर ऐसा जान पड़ता था मानो सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रह आकाश से टूटकर गिर रहे हों। वहां गिरे हुए उस महान पर्वत शिखर के द्वारा खाण्डव वन में निवास करनेवाले बहुत से प्राणी मारे गए।

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इस प्रकार पर्वत शिखर के गिरने से खाण्डव वन में रहनेवाले सभी वनचर प्राणी भयभीत हो उठे और उद्विग्न हो इधर-उधर भागने लगे। तब श्रीकृष्ण ने अपने चक्र को उन दैत्य आदि प्राणियों के विनाश के लिये छोड़ा। उस चक्र के प्रहार से पीड़ित हो दानव,निशाचर आदि समस्त क्षुद्र प्राणी सौ-सौ टुकड़े होकर क्षणभर में आग में गिर गये। श्रीकृष्ण के द्वारा बार-बार चलाया हुआ वह चक्र अनेक प्राणियों का संहार करके पुनः हाथ में चला आता था।

उधर जब देवतागण उन दोनों के बल से खाण्डव वन की रक्षा करने और उस आग को बुझाने में सफल ना हो सके तब पीठ दिखाकर चल दिए। उधर इंद्र देवताओं को विमुख हुआ देख अपने पुत्र अर्जुन की प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए। तभी इंद्र को सम्बोधित करते हुए आकशवाणी हुई हे देवराज तुम्हारे सखा नागराज तक्षक इस समय यहाँ नहीं हैं। वे खांडवदाह के समय कुरुक्षेत्र चले गये थे। भगवान वासुदेव तथा अर्जुन को किसी प्रकार युद्ध से जीता नहीं जा सकता। मेरे कहने से तुम इस बात को समझ लो। ये दोनों पहले के देवता नर और नारायण हैं। देवलोक में भी इनकी ख्याति है। इनका बल और पराक्रम केस है यह तुम भी जानते हो। ये अपराजित वीर हैं। सम्पूर्ण लोकों में किसी के द्वारा भी ये युद्ध में जीते नहीं जा सकते। ‘अतः इंद्र तुम्हारा देवताओं के साथ यहाँ से चले जाना ही उचित है। खाण्डववन के इस विनाश को तुम उसका प्रारब्ध ही समझो।

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यह आकाशवाणी सुनकर देवराज इंद्र ने इसे ही सत्य मान क्रोध छोड़कर उसी समय स्वर्ग लोक को लौट गये। देवराज इंद्र को वहां से प्रस्थान करते देख समस्त स्वर्गवासी देवता सेना सहित उनके पीछे-पीछे चले गए। उस समय देवताओं सहित देवराज इंद्र को जाते देख श्रीकृष्ण और अर्जुन ने सिंहनाद किया। देवराज के चले जाने पर केशव तथा अर्जुन अत्यंत प्रसन्न हो उस खाण्डव वन का दाह कराने लगे। अर्जुन के बाण चलाते समय उनके बाणों से कट जाने के कारण कोई भी जीव वहां से बाहर न निकल सका।

फिर पितरों और देवताओं के लोक में भी खाण्डववन के दाह की गर्मी पहुँचने लगी। बहुतेरे प्राणियों के समुदाय कातर हो जोर-जोर से चीत्कार करने लगे। हाथी,मृग और चीते भी रोदन करने लगे। उनके आर्तनाद से गंगा तथा समुद्र के भीतर रहनेवाले मत्स्य भी थर्रा उठे। उस समय जो कोई राक्षस,दानव और नाग वहां एक साथ संघ बनाकर निकलते थे,उन सबको भगवान श्री हरी चक्र द्वारा मार देते थे। इस प्रकार वन जंतुओं के मांस,रूधिर के समूह से अत्यंत तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूम रहित हो गये। उनकी आँखें चमक,उठीं जिह्वा में दीप्ती आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यंत तेज से प्रकाशित होने लगा। श्री कृष्ण और अर्जुन का दिया हुआ वह इच्छानुसार भोजन पाकर अग्निदेव बड़े प्रसन्न और पूर्ण तृप्त हो गए। उन्हें बड़ी शांति मिली। इसी समय तक्षक के निवास स्थान से निकलकर सहसा भागते हुए मयासुर पर भगवान मधुसूदन की दृष्टि पड़ी। अग्निदेव मूर्तिमान हो सिर पर जटा धारण किये मेघ के समान गर्जना करने लगे और उस असुर को जला डालने की इच्छा से मांगने लगे।

कलयुग के बाद का युग कैसा होगा ?

मय दानवेन्द्रो की शिल्पियों में श्रेष्ठ था,उसे पहचानकर भगवान वासुदेव उसका वध करने के लिए चक्र लेकर खड़े हो गए। मय ने देखा एक ओर मुझे मरने के लिए श्री कृष्ण ने चक्र उठा रखा है और दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं। तब वह अर्जुन की शरण में गया और बोला अर्जुन मुझे बचाओ। यह देख अर्जुन के मन में दया आ गयी अतः उन्होंने मयासुर से कहा तुम्हे डरना नहीं चाहिए। अर्जुन के अभयदान देने पर भगवान श्रीकृष्ण ने मयासुर को मारने की इच्छा त्याग दी और अग्निदेव ने भी उसे नहीं जलाया। उसके बाद अग्निदेव ने श्रीकृष्ण और अर्जुन के द्वारा इंद्र के आक्रमण से सुरक्षित रहकर खाण्डववन को पंद्रह दिनों तक जलाया।

लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं की आखिर अग्निदेव ने खाण्डववन को क्यों जलाया अगर नहीं तो जानने के लिए निचे कमेंट करें ताकि हम आपके लिए ये कथा जल्द लेकर हाजिर हों। और अगर आपको हमारी ये कथा पसंद आई हो तो लाइक के साथ साथ शेयर भी करें और अब हमें इजाजत दें आपका बहुत बहुत शुक्रिया।