-भगदत्त-

महाभारत युद्ध के कई ऐसे भी पराक्रमी पात्र है जिन्हे पूर्णतया भुला दिया गया है। उनका उल्लेख महाभारत की कहानियों में कहीं नहीं मिलता। क्यूंकि अधिकाँश कथाओं में केवल महान और प्रसिद्द चरित्रों का ही वर्णन है। ऐसे ही अनसुने चरित्रों में एक नाम है भगदत्त का। तो आइये जानते हैं की भगदत्त कौन था और वह अर्जुन को क्यों मरना चाहता था

भगदत्त की कथा

जो प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर का पुत्र था।  भगदत्त का उल्लेख महाभारत में मिलता है। भगदत्त मात्र ऐसा चरित्र था जिसने आठ दिन तक अकेले अर्जुन के साथ युद्ध किया। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय जब अर्जुन राज्यों को अपने अधीन कर रहे थे तब अर्जुन और भगदत्त का आठ दिन तक युद्ध चला। अर्जुन ने अनेक प्रयास किये परन्तु प्राग्ज्योतिष पर विजय प्राप्त नहीं कर सके। भगदत्त और अर्जुन के पिता इंद्र घनिष्ट मित्र थे। इसलिए भगदत्त ने युधिष्ठिर को चक्रवर्ती स्वीकार किया था और यज्ञ के लिए शुभकामनाएं दीं थी।

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एक बार भगदत्त का युद्ध कर्ण के साथ भी हुआ था। जिसमे कर्ण की विजय हुई। चूँकि कर्ण ने भगदत्त को पराजित किया था इसलिए भगदत्त ने महाभारत का युद्ध कौरवों की ओर से लड़ा। कर्ण ने सभी दिशाओं में राजाओं को अपने अधीन कर लिया था। इसका उल्लेख महाभारत के उद्योग पर्व के 164वें अध्याय में मिलता है।  महाभारत के समय भगदत्त की आयु बहुत अधिक थी और इस योद्धा ने भीम, अभिमन्यु और सात्यिकी जैसे योद्धाओं को पराजित किया था। द्रोण पर्व के 24 वें अध्याय में वर्णन मिलता है कि अभिमन्यु और अन्य अनेक योद्धाओं ने एक साथ भगदत्त पर आक्रमण कर दिया था परन्तु भगदत्त के सामने सबने घुटने टेक दिए।

अर्जुन और भगदत्त का युद्ध

द्रोण पर्व के 27वें अध्याय में उल्लेखनीय है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के 12 वें दिन भगदत्त का सामना अर्जुन के साथ हुआ। दोनों के मध्य भयंकर संग्राम हुआ। एक समय तो ऐसा आया जब भगदत्त ने अपने हाथी से अर्जुन को लगभग कुचल ही दिया था। परन्तु भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को बचा लिया। इसके पश्चात पुनः भगदत्त के सामने आने पर अर्जुन ने भगदत्त के अनेक अस्त्रों को विफल कर दिया।  भगदत्त  घायल हो गया। तब भगदत्त ने वैष्णव अस्त्र का प्रयोग किया जिसे काटना अर्जुन के लिए असंभव था। जब तक वैष्णवास्त्र अर्जुन को आकर लगता तब तक भगवान् कृष्ण बीच में आ गए।  उनके सामने अस्त्र वैजन्ती माला में परिवर्तित हो गया. और इस प्रकार भगवान् कृष्ण द्वारा पुनः भगदत्त से अर्जुन के प्राणों की रक्षा हुई।

भगदत्त का वध

तब भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अब वो भगदत्त पर प्रहार कर उसका अंत करे। तब सबसे पहले अर्जुन ने भगदत्त के सुप्रतीक नामक पराक्रमी हाथी पर नाराच का प्रहार किया। यह प्रहार इतना तीव्र था कि बाण हाथी के कुम्भस्थल में पंख समेत प्रवेश कर गया। तब गजराज ने तुरंत ही धरती पर अपने दांत टेक दिए और वहीँ प्राण त्याग दिए। तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि भगदत्त की आयु बहुत अधिक है। और झुर्रियों के कारण उसकी पलकें झुकी रहती हैं और उसके नेत्र बंद रहते हैं। चूँकि भगदत्त बहुत पराक्रमी और शूरवीर है इसलिए उसने अपने नेत्रों को खुला रखने के लिए अपने मस्तक पर पट्टी बाँधी रखी है।  तब उसने सबसे पहले भगदत्त के मस्तक पर बंधी इस पट्टी पर तीर मारा। जिसके परिणामस्वरूप भगदत्त के मस्तक की पट्टी क्षीण हो गयी।  उसके नेत्र बंद हो गए और उसकी आँखों के सामने अँधेरा हो गया और अवसर पाकर अर्जुन ने भगदत्त का वध कर दिया। 

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