हिन्दू धर्म में श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। द्वापर युग में देवकी और वासुदेव के घर जन्मे श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। गीता के माध्यम से श्री कृष्ण अर्जुन के साथ साथ सम्पूर्ण मनुष्य जाति को जीवन के रहस्यों का ज्ञान भी दिया था। इस कलयुग में भी अगर  मनुष्य गीता के ज्ञान को आत्मसात कर ले तो उसे जीवन में कभी भी कोई संकटों  या दुखों का सामना नहीं करना पड़ेगा। तो आइये जानते हैं भगवान श्री कृष्ण के पांच अनमोल वचन

संकट से कैसे लड़ें

भविष्य के दुःख का कारण दूर करने के लिए हम आज योजना बनाते हैं। किंतु कल के संकट को आज निर्मूल करने से हमें लाभ मिलता है या हानि पहुंचती है । ये प्रश्न हम कभी नहीं करते। सत्य तो ये है की संकट और उसका निवारण साथ जन्म लेते है। व्यक्ति के लिए भी और सृष्टि के लिए भी। आप अपने भूतकाल का स्मरण कीजिए,इतिहास को देखिए आप तुरंत ही ये जान पाएंगे की जब जब संकट आता है। तब तब उसका निवारण करने वाली शक्ति भी जन्म लेती है। यही तो जगत का चलन है,वस्तुतः संकट ही शक्ति के जन्म का कारण है। प्रत्येक व्यक्ति जब संकट से निकलता है तो एक पद आगे बड़ा होता है,अधिक चमकता है,आत्मविश्वास से अधिक भरा होता है ना केवल अपने लिए अपितु विश्व के लिए भी। वास्तव में संकट का जन्म है एक अवसर का जन्म,अपने आप को बदलने का,अपने विचारों को ऊंचाई पर करने का,अपनी आत्मा को बलवान और ज्ञानमण्डित बनाने का। जो ये कर पाता है उसे कोई संकट नहीं होता,किंतु जो यह नहीं कर पाता वो तो स्वंय एक संकट है विश्व के लिए। विचार कीजिये। 

सफलता का रहस्य

कभी कभी कोई घटना मनुष्य के जीवन की साड़ी योजनाओं को तोड़ देती है। और मनुष्य उस आघात को अपने जीवन का केंद्र मान लेता है। पर क्या भविष्य मनुष्य की योजनाओं के आधार पर निर्मित होते हैं ? नहीं,जिस प्रकार किसी ऊँचे पर्वत पर सर्वप्रथम चढाने वाला उस पर्वत की तलाई में बैठकर जो योजना बनाता है क्या वही योजना उसे पर्वत की चोटी तक पहुंचाता है। नहीं,वास्तव में वो जैसे जैसे ऊपर चढ़ता है वैसे-वैसे उसे नई-नई चुनौतियाँ,नई-नई विडम्बनाएं,नए-नए अवरोध मिलते हैं। प्रत्येक पथ पर वो अपने अगले पथ का निर्णय करता है। प्रत्येक पद पर उसे अपनी योजनाओं को बदलना पड़ता है। कहीं पुरानी योजनाएं उसे खाई में ना ढकेल दे। वो पर्वत को अपने योग्य नहीं बना पाता,वो केवल स्वंय को पर्वत के योग्य बना सकता है।

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 क्या जीवन के साथ भी ऐसा ही है ?जब मनुष्य जीवन में किसी एक चुनौती को,एक अवरोध को अपने जीवन का केंद्र मान लेता है,अपने जीवन की गति को ही रोक देता है,तो वो अपने जीवन में सफल नहीं बन पाता और ना ही सुख और शांति प्राप्त कर पाता है। अर्थात जीवन को अपने योग्य बनाने के बदले स्वंय अपने को जीवन के योग्य बनाना ही सफलता और सुख का एक मात्र मार्ग नहीं। 

सही निर्णय कैसे लें

जीवन का हर क्षण निर्णय का क्षण होता है। प्रत्येक पथ पर किसी दूसरे पथ के बारे में कोई निर्णय करना ही पड़ता है। और निर्णय,निर्णय अपना प्रभाव छोड़ जाता है। आज किय गए निर्णय भविष्य में सुख अथवा दुख निर्मित करते है ना केवल अपने लिए अपने परिवार के लिए,आने वाली पीढ़ियों के लिए। जब कोई दुविधा सामने आती है तो मन व्याकुल हो जाता है,अनिश्चय से भर जाता है। निर्णय का वो क्षण युद्ध बन जाता है और मन बन जाता है युद्धभूमि। अधिकतर निर्णय हम दुविधा का उपाय करने के लिए नहीं केवल मन को शांत करने के लिए लेते हैं। पर क्या कोई दौड़ते हुए भोजन कर सकता है,नहीं,तो क्या युद्ध से जूझता हुआ मन कोई योग्य निर्णय ले पायेगा। वास्तव में शांत मन से जब कोई निर्णय करता है तो अपने लिए सुखद भविष्य बनाता है,किन्तु अपने मनको शांत करने के लिए जब कोई निर्णय करता है तो वो व्यक्ति भविष्य में अपने लिए काँटों भरा वृक्ष लगाता है। स्वंय विचार कीजियेगा। 

आत्मविश्वास की ताकत

जीवन में आने वाले संघर्षों के लिए जब मनुष्य स्वंय को योग्य नहीं मानता,जब उसे अपने ही बालों पर विश्वास नहीं रहता तब वो सब गुणों लो त्यागकर दुर्गुणों को अपनाता है। वस्तुतः मनुष्य के जीवन में दुर्जनता जन्म ही तब लेती है जब उसके अंतर में आत्मविश्वास नहीं होता। आत्मविश्वास ही अच्छाई को धारण करता है। ये आत्मविश्वास है क्या ? जब मनुष्य ये मानता है की जीवन का संघर्ष उसे दुर्बल बनाता है तो उसे अपने ऊपर विश्वास नहीं रहता। वो संघर्ष के पार जाने के बदले संघर्ष से छूटने के उपाय ढूंढने लगता है। किन्तु जब वो ये समझता है की ये संघर्ष उसे अधिक शक्तिशाली बनाते हैं ठीक जैसे व्यायाम करने से देह की शक्ति बढती है तो प्रत्येक संघर्ष के साथ उसका उत्साह बढ़ता है। अर्थात आत्मविश्वास और कुछ भी नहीं मन की स्थिति है,जीवन को देखने का दृष्टिकोण मात्र है। और जीवन का दृष्टिकोण तो मनुष्य के अपने वश में होता है। स्वंय विचार कीजिए। 

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बच्चों की परवरिश कैसे करें ?

पिता सदा ही अपने संतान के सुख की कामना करते हैं। उनकी भविष्य की चिंता करते रहते हैं। इसी कारणवश सदा ही अपने सन्तानो के भविष्य का मार्ग स्वंय निश्चित करने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस मार्ग पर पिता स्वंय चला है,जिस मार्ग के कंकड़-पत्थर को स्वंय देखा है,मार्ग की छाया,मार्ग की भूख को स्वंय जाना है उसी मार्ग पर उसका पुत्र भी चले यही इच्छा रहती है हर पिता की। निसंदेह उत्तम भावना है ये। किंतु तीन प्रश्नो के ऊपर विचार करना हम भूल ही जाते हैं।

प्रथम प्रश्न

क्या समय के साथ प्रत्येक मार्ग बदल नहीं जाते ?क्या समय सदा ही नई चुनौतियों को लेकर नहीं आता? तो फिर बाईट हुए समय के अनुभव नई पीढ़ी को किस प्रकार लाभ दे सकते हैं।

दूसरा प्रश्न

क्या प्रत्येक संतान अपने माता-पिता की छवि होता है ?हाँ सन्तानो को संस्कार तो अवश्य माता-पिता देते हैं किन्तु भीतर की क्षमता तो ईश्वर देते हैं। तो जिस मार्ग पर पिता को सफलता मिली है,तो विश्वास है की उसी मार्ग पर उसके सन्तानो को भी सफलता और सुख प्राप्त होगा।

तीसरा प्रश्न

क्या जीवन के संघर्ष और चुनौतियाँ लाभकारी नहीं होती ?क्या प्रत्येक नया प्रश्न नए उत्तर का द्वार नहीं खोलता ?तो फिर सन्तानो को नए-नए प्रश्नो संघर्षों और चुनौतियों से दूर रखना ये उनके लिए लाभ कहलायेगा या फिर हानि पहुंचाना। अर्थात जिस प्रकार संतान के भविष्य का निर्माण करने के बदले  उसके चरित्र का निर्माण करना श्रेष्ठ है वैसे ही सन्तानो के जीवन का मार्ग निश्चित करने के बदले उन्हें नए संघर्षों के साथ जूझने के लिए मनोबल व ज्ञान देना अधिक लाभदायक नहीं होगा।  

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