भक्ति

क्या आप पाखंड और दिखावटी पूजा से इतर वाकई में सच्ची ईश्वर भक्ति प्रेम की तलाश में है। तो ये पोस्ट आप ही के लिए है।इस पोस्ट में हम आपको बताएँगे की  भगवान की भक्ति क्या है ?

भक्ति का अर्थ

ईश्वर के प्रति जो परम प्रेम है उसे ही भक्ति कहते हैं। अपनी देह अथवा पत्नी अथवा घर या अन्य विषयों के प्रति जो प्रेम है उसे आसक्ति कहते हैं।  इन दोनों में जो भेद है उसे समझने की चेष्टा करें। भक्ति नि:संदेह प्रेमरूपा है। किंतु हर प्रकार का और हर किसी से किया गया प्रेम भक्ति नहीं है। ईश्वर का प्रेम मनुष्य जाति के प्रति उनकी सहनशीलता में प्रकट होता है। ईश्वर ने संसार में पापियों का पूर्ण रूप से नाश कभी नहीं किया। भारत की संस्कृति जिस भगवान का वर्णन करती है. वह पाप से घृणा करते हैं। परंतु पापियों से प्रेम करते हैं। राक्षसों को मिले वरदान इस बात को प्रमाणित करते हैं। ईश्वर की दृस्टि में कोई भी इंसान अच्छा या बुरा नहीं होता है। बुरी मनुष्य की सोच होती है अतः भगवान् तो सभी से प्रेम करते है।

ईश्वर कौन है या क्या है?

इसके पहले हम यह खोजें कि कौन-सा ऐसा प्रेम है जो किसी चीज पर आश्रित नहीं है। अपने आपसे जो प्रेम होता है वह बिल्कुल निरपेक्ष और निरतिशय होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप से बहुत प्रेम करता है। तभी तो दर्पण में अपनी छवि बार-बार निहारता है। अपना नाम, अपना चित्र अखबार, टीवी में देखना चाहता है। इस प्रकार स्वयं के प्रति जो हमारा प्रेम है वह देश, काल, परिस्थिति पर निर्भर नहीं करता। अब यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जो परम आनंद स्वरूप है वही परम प्रेम का विषय हो सकता है तो इसलिए मैं क्या हूं? मैं हूं परम आनंद स्वरूप और जब यह कहा गया है  कि ईश्वर से ही परम प्रेम हो सकता है। और मेरा परम प्रेम अगर मैं स्वंय ही हूँ  तो इसका अर्थ यह हुआ कि ईश्वर मेरी आत्मा है और मेरे साथ ही हैं। ईश्वर मुझसे अलग नहीं है परन्तु हम हैं कि सोचते हैं की हम बड़े दुखी हैं। हमें आनंद चाहिए तथा वह भी बाहर खोजते हैं। कितना बड़ा अज्ञान है यह।.हम सब ईश्वर की संतान हैं और वो हम सब में वास करता है।

पाप और पुण्य

ईश्वर मनुष्यों को पापो से मुक्ति देने के लिए कई बार अलग अलग रूपों में इंसानो के बिच आये। ताकि सभी का  भगवान् पर विश्वास बना रहे। भगवान् में विश्वास रखने वाले को किसी प्रकार का कष्ट का सामना न करना पड़े। उसका किसी प्रकार से अहित ना हो. और वह अपने जीवन में अनंत काल तक यश और  वैभव पाता रहे. ईश्वर के प्रेम से मनुष्य जाति को असीमित अनुग्रह प्राप्त होता है। मनुष्य योनि को पाप की योनि बताया जाता है। पाप ने मनुष्य को ईश्वर से अलग कर दिया है। पाप का अर्थ उस लक्ष्य को खोना है। जो ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया है। मनुष्य योनि में जन्म लेने का एकमात्र उद्देश्य आत्मा का परमात्मा में मिलान है। मनुष्य ईश्वर से प्रेम करें। व संगति रखें, तो प्रभु की कृपा भी बानी रहती है। हमारी संस्कृति भी यह कहती है कि पाप की मजदूरी मृत्यु के समान है। ईश्वर का वरदान इंसानो के साथ अनंत जीवन से रहा है। आजकल के समय में इंसानो की गलत संगति और गलत काम काज से हमारे विचार और कार्य पाप से दूषित हो गए हैं।

क्या सच में स्वर्ग और नर्क होता है ?

यदि इस संसार में पाप ना हो तो हमें अपने घरों में ताले लगाने की जरूरत ही नहीं होगी। पुलिस चौकी और कारागार इसलिए है ताकि  संसार में इंसानो के द्वारा हो रहे पापो की सजा दी जाए। ईश्वर के हिसाब से हमारा छुटकारा हमरे द्वारा किया गया नेक काम ही दिला सकता है। 

गीता कहती है, किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं हो सकता है। क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्य की दुनिया में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है। जिसके द्वारा हम उद्धार पा सके. सच्ची ईश्वर भक्ति ही उद्धार का मार्ग है।

सच्ची भक्ति कहाँ मिलती है ?

 ये सच्ची भक्ति केवल तीर्थ स्थलों पर जाना और मंदिरों में अनुष्ठानो से प्राप्त नहीं होती है। दान देना, गरीबो की मदद करना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना। अथवा ऐसे सभी कार्य इंसानो को उद्धार दिला सकता है।  ईश्वर किसी धर्म की स्थापना के लिए इस संसार में नहीं आए थे। मनुष्य जाति को उनके पापों से छुटकारा देने और इंसानो को अच्छे रह पे चलने के लिए ही ईश्वर ने इस संसार में हैं। मनुष्य को ईश्वर का हर क्षण धन्यवाद करना चाहिए। क्योंकि उन्होंने हमारे उद्धार के लिए अलग अलग रूपों में संसार में जन्म लिया।  भगवान् ने मनुष्य को सही मार्ग दिखने के कई प्रकार से निंदा पीड़ा और कष्ट सहे। ईश्वर का कहना है की जो इंसान उन पर विश्वास करेगा उन सब को अपने पास ले जाने के लिए यह  बार बार मनुष्य योनि में अवतार लेते रहेंगे। ईश्वर एक है अलग अलग जगहों पे भगवान् को अलग अलग तरीको से पूजा जाता है।