पौराणिक काल के सबसे बड़े धर्मयुद्ध महाभारत का जब कभी भी जिक्र किया जाता है तो चक्रव्यूह की बातें भीअवश्य ही की जाती है। जी हाँ वही युद्ध रणनीति या व्यूह,जिसमे फंसकर अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु मारा गया था। ऐसा माना जाता है की युद्ध के इस व्यूह को भेदने की कला कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य और भगवान श्रीकृष्ण केअलावा सिर्फ अर्जुन ही जानते थे। हालाँ कि ये भी कहा जाता है की अर्जुन ने अपनी पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदने की कला बताई थी। उस वक्त सुभद्रा के कोख में अभिमन्यु मौजूद थे। और कोख से अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने की कला सीख रहे थे। लेकिन अर्जुन की बात सुनते-सुनते सुभद्रा को नींद आ गयी। जिसके बाद अभिनयु चक्रव्यूह के छह दरवाजे को तोड़ने की कला तो सिख गए लेकिन सातवें द्वार को तोड़ने का राज,राज ही रहग या। तो पाठकों आइये जानते हैं कि चक्रव्यूह क्या थाऔर इसको भेदने का रहस्य क्या है ?

चक्रव्यूह का अर्थ

पौराणिक काल में युद्ध के दौरान दुश्मनो पर अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए दोनों पक्ष की सेना क्रौंच ,सर्प ,गरुड़ और चक्रव्यूह जैसे व्यूह की रचना किया करते थे। जिसमे सबसे ज्यादा घातक व्यूह चक्रव्यूह को माना जाता है। ऐसा माना जाता है की उस काल में चक्रव्यूह युद्ध की ऐसी रणनीति थी जिसमे बड़े से बड़े योद्धा मात खा जाते थे। इस व्यूह की रचना में हजारों सैनिकों का इस्तेमाल किया जाता था जो कई किलोमीटर की दूरी तक एक ऐसा चक्र बना लेते थे, जिसमें प्रवेश करके कोई भी आसानी से बाहर नहीं जा सकता था । इस व्यूह की रचना में लगे सैनिक हमेशा अपना स्थान बदलते रहते थे जिस वजह से चक्रव्यूह आसमान से देखने पर एक घूमते हुए चक्र की तरह दिखता था। चक्रव्यूह को देखने पर इसमें अंदर जाने का रास्ता तो नजर आता था, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता नजर नहीं आता।

कैसा होता था चक्रव्यूह ?

चक्रव्यूह में सैनिको की सात सुरक्षा पंक्ति हुआ करती थी। जिसमे सबसे पहली पंक्ति के सैनिक हमेशा चारो ओर घूमते रहते थे। चक्रव्यूह के पहले सुरक्षा पंक्ति पर सामान्य सैनिकों को तैनात किया जाता था। यदि कोई योद्धा पहली पंक्ति के किसी सैनिक को मारकर अंदर प्रवेश कर भी जाता था तो मरे हुए सैनिको की जगह क्षण भर में दूसरे सैनिक ले लेते थे। चक्रव्यूह के दूसरे पंक्ति में पहली पंक्ति के मुकाबले ज्यादा कुशल सैनिको को तैनात किया जाता था ताकि वो दुशमनो को अंदर जाने से रोक सके। ठीक इसी तरह व्यूह के छठी सुरक्षा पंक्ति तक युद्ध कौशल के हिसाब से सैनिकों और योद्धाओं को तैनात किया जाता था और सबसे अंतिम यानि सातवीं पंक्ति में व्यूह की रचना करने वाले अपने सबसे कुशल और बलशाली महारथियों को रखते थे। जैसे की महाभारत युद्ध के 13वे दिन कौरवों के सेनापति गुरु द्रोणाचार्य ने जब पांडवों पर विजय पाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की थी तब सातवीं पंक्ति में उन्होंने अपने अलावा दुर्योधन,दुःशासन,कर्ण,कृपाचार्य,अश्व्थामा जैसे महारथी को तैनात कर रखा था।

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युद्ध निति चक्रव्यूह

चक्रव्यूह को उस समय इसलिए युद्ध की सबसे घातक रणनीति माना जाता था क्यूंकि अगर कोई योद्धा लगातार लड़ते हुए अंदर की ओर बढ़ता जाएगा तो स्वाभाविक है की वह थकता भी जाएगा। जैसे-जैसे वो सुरक्षा पंक्तियों को तोड़ता हुआ अंदर बढ़ता जाएगा वैसे वैसे अंदर के जिन योद्धाओं से उसका सामना होगा वो थके हुए नहीं होंगे। ऊपर से वे पहले वाले योद्धाओं से ज्यादा शक्तिशाली और युद्ध कौशल में ज्यादा निपुण भी होंगे। शारीरिक और मानसिक रूप से थके हुए योद्धा के लिए एक बार अंदर फंस जाने पर जीतना या बाहर निकलना कठिन हो जाता था। और यही कारण था की जिस योद्धा को इस व्यूह को भेदने की पूरी जानकारी नहीं होती थी वह सातवें सुरक्षा पंक्ति तक जाते जाते थकान के कारण मारा जाता था और आपको याद ही होगा की जब कौरव पक्ष के योद्धाओं ने अभिमन्यु का वध किया था तो वो भी चक्रव्यूह के सातवें दरवाजे पर था और बेहद ही थका हुआ था।

 चक्रव्यूह भेदने का रहस्य

धर्मग्रंथों के अनुसार चक्रव्यूह को वही योद्धा भेद सकता है जो युद्ध निति के साथ साथ एक कुशल धनुर्धर हो। क्योंकि जब एक कुशल योद्धा चक्रव्यूह में प्रवेश करता है ही तो वह पहले से ही व्यूह से निकलने का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। वह जानता रहता है की बाहर की ओर योद्धाओं की संख्या कम है जबकि अंदर के योद्धाओं का घनत्व ज्यादा। घनत्व को बराबर या कम करने के लिए ये जरूरी होगा कि बाहर की ओर खड़े अधिक से अधिक योद्धाओं को मारा जाए। इसलिए वह व्यूह को घुमाते-चलाते रखने के लिए अधिक से अधिक योद्धाओं को अंदर से बाहर धकेलता जाता है। इससे अंदर की तरफ योद्धाओं का घनत्व कम हो होता जाता है। साथ ही एक कुशल योद्धा को यह भी मालूम होता है कि घूमते हुए चक्रव्यूह में एक खाली स्थान भी आता है, जहां से निकला जा सकता है। और इस तरह वह योद्धओं को मारता हुआ व्यूह से निकल जाता है। हालाँकि आज यानि की इस कलयुग युद्ध की इस निति का कोई महत्त्व नहीं रह गया

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