हिन्दू धर्म ग्रंथों में ऋषि-महर्षियों से जुडी कई कथाओं का वर्णन मिलता है। जिससे हमें पता चलता है की पौराणिक समय में ऋषियों को अपने तपोबल के दम पर कई शक्तियां प्राप्त थी। ऐसे ही एक महर्षि दधीचि के बारे में तो आप सभी ने सुना ही होगा। इस पोस्ट में आप महर्षि दधीचि और भगवान विष्णु के बिच हुए एक   युद्ध के बारे में जानेंगे जिसका वर्णन  लिंगपुराण में मिलता है। तो आइये जानते हैं महर्षि दधीचि और भगवान विष्णु के बिच क्यों हुआ था युद्ध ?

 महर्षि दधीचि और राजा क्षुप

 कथा के अनुसार ब्रम्हा जी का क्षुप नाम का एक तेजस्वी पुत्र था जो राजा होने के साथ साथ महर्षि दधीचि का परममित्र भी था। एक बार की बात है ब्रह्मा जी के पुत्र क्षुप और महर्षि दधीचि में क्षत्रिय और ब्राह्मण की श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। राजा क्षुप ने महर्षि दधीचि से कहा की इस लोक में अग्नि,इंद्र,याम,वरुण,सोम,वायु और कुबेर का तेज एक राजा यानि की क्षत्रिय ही धारण कर सकता है और दूसरा कोई नहीं। इसलिए हे मित्र राजा ईश्वर के समान होता इसलिए तुम्हे मेरा अपमान करने की बजाय मेरी पूजा करनी चाहिए। अपने मित्र क्षुप की मुख से ऐसी वचन को सुनकर महर्षि दधीचि को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में राजा क्षुप को बाएं हाथ से उसके सर पर एक जोडदार घूँसा जड़ दिया। उसके बाद क्षुप ने  भी घूंसे के जवाब में पलट कर वज्र  से दधीचि के शरीर पर प्रहार किया। वज्र के प्रहार से दधीचि तत्काल जमीन पर गिर पड़े ।

दधीचि का प्रतिशोध

अपने उपहास से दधीचि प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगे। उन्होंने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को याद किया। अतः शुक्राचार्य ने अपने योगबल से दधीचि के शरीर में प्रवेश करके कहने लगे की “हे दधीचि तुम देवों के देव महादेव का पूजन करो क्योंकि मृतसञ्जीवनी विद्या भगवान शिव पास ही है। शिव की कृपा से तुम अवध्य हो जाओगे। उसके आगे शुक्राचार्य ने दधीचि से कहा की तुम महामृत्युंजय का जाप करो और  इनके द्वारा हवन कर तथा अभिमंत्रित जल ग्रहण करो फिर तुम  शिवलिंग का ध्यान करो। ऐसा करने से तुम्हारा सारा भय ख़त्म हो जायेगा। उसके बाद दधीचि ने शुक्राचार्य के कहे अनुसार भगवान महादेव की घोर आराधना की जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने दधीचि मुनि को बज्र की हड्डी तथा अवध्यता प्रदान किया।

दधीचि और राजा क्षुप का युद्ध

फिर  वे राजा क्षुप के पास दोबारा गये और इस बार उन्होंने क्षुप पर अपने पैरो से प्रहार किया। तथा क्षुप ने भी दधीचि की छाती पर प्रहार किया लेकिन  दधीचि को कुछ भी नहीं हुआ।उसके पश्चात् क्षुप ने दधीचि पर कई अस्त्र सश्त्र प्रयोग किये लेकिन दधीचि पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। क्योंकि शिव जी कृपा से दधीचि बज्र के से शरीर वाले हो गये थे। यह देखकर राजा क्षुप को बड़ा आश्चर्य हुआ।

भगवान विष्णु के पांच छल

भगवान विष्णु और राजा क्षुप

तब उसने भगवान विष्णु को याद किया। चुकी क्षुप विष्णु जी का भक्त था तो भगवान विष्णु तत्काल क्षुप की के सामने  चक्र, गदा, पद्म, शंख के साथ प्रगट हुए। तब क्षुप ने  विष्णु जी को प्रणाम किया और बोले बोले की हे भगवन दधीचि नामक ब्राम्हण मेरा मित्र था जोकि भगवान शिव का भक्त हैं । उसने मुझे अपने बाये पैर से मारा हैं. और बड़े घमंड से कहता हैं कि मैं किसी से नहीं डरता, अब आपको जो उचित लगे आप वो करें, अपने भक्त की मुख से ऐसी बातें सुनकर भगवान विष्णु ने कहा हे राजन महर्षि दधीचि रूद्र के भक्त हैं  और उन्हें अभय प्राप्त हैं। इसलिए हे राजन तेरी विजय नहीं हो सकती।  परन्तु  राजन मैं दधीचि से युद्ध कर विजय का प्रयत्न करूँगा, ऐसा कहकर भगवान विष्णु वहाँ से चले गए

महर्षि दधीचि और भगवान विष्णु का युद्ध

कुछ देर बाद महर्षि दधीचि के आश्रम के पास पहुँचे और बोले कि हे महर्षि दधीचि आप तो महादेव के भक्त हो अतः मैं आपसे वरदान माँगना चाहता हूँ, क्या आप मुझे वर दे सकते हैं। यह सुन दधीचि मुस्कुराते हुए बोले कि मैं आपको और आपकी इच्छा को भलीभांति जनता हूँ फिर भी मैं आपसे तनिक भी भयभीत नहीं हूँ। आप ब्राम्हण के भेष में तीनो लोकों के पालनकर्ता श्री विष्णु हो, भगवान रूद्र कि कृपा से मैं भूत भविष्य और वर्तमान सब जनता हूँ। मैं ये भी जानता हूँ की आपको राजा क्षुप ने यहाँ भेजा है क्यूंकि  मैं आपकी भक्त वत्सलता से भलीभांति परिचित हूँ। अतः आप ब्राम्हण का भेष त्याग दीजिये. रही बात मेरे भयभीत होने कि तो मैं महादेव की कृपा से तनिक भी भयभीत नहीं हूँ। ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ब्राम्हण का रूप त्यागकर हसने लगे और बोले हे दधीचि आपको तनिक भी भय नहीं हैं। आप रूद्र की अर्चना में तत्पर हो इसलिए आप सर्वज्ञ हो लेकिन एक बार मेरी आज्ञा मानकर कह दो की मैं डरता हूँ।

जब सुदर्शन चक्र के भय से भागे ऋषि दुर्वाषा

भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर दधीचि ने कहा हे भगवान मैं रूद्र के आलावा किसी से नहीं डरता। महर्षि के ऐसे वचन सुनकर श्री हरी विष्णु को क्रोध आ गया तथा मुनि दधीचि पर चक्र से प्रहार कर कर दिया। लेकिन वह चक्र भी कुंठित हो गया। तब महर्षि हसकर बोले की हे भगवन आपने जिस सुदर्शन चक्र से मुझपर प्रहार किया है वह भी आपको महादेव ने ही दिया है। अतः यह मुझे नहीं मार सकता।  इसलिए आप मुझे मारने के लिए ब्रम्हास्त्र आदि का प्रयोग करें। उनकी बात सुनकर विष्णु जी ने उनपर हर प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाये तथा सभी देवता भी भगवान विष्णु की सहायता करने लगे।

युद्ध का परिणाम

उधर महर्षि दधीचि महादेव का स्मरण करके कुशाओं की एक मुठी फेंक देते जिस कारण भगवान विष्णु के सारे अस्त्र सस्त्र निष्फल हो जाते। भगवान विष्णु ने अपने शरीर से लाखो करोडो गण उत्पन्न किये परन्तु ऋषि दधीचि ने उन्हें भी नष्ट कर दिया। तब श्री विष्णु जी ने करोड़ों देवता और रूद्र उत्पन्न किये। जिन्हे देखकर दधीचि आश्चर्यचकित हो गये।  और बोले हे प्रभु आप इस माया को छोड़ दें मैं अपने शरीर में भी आपको समस्त ब्रम्हांड दिखा सकता हूँ। अतः यह माया छोड़कर अपने भुजaबल से मुझसे युद्ध करें।

उधर नारायण को इस प्रकार निष्फल होते देख परमपिता ब्रम्हा वहाँ प्रकट हुए और विष्णु और दधीचि को युद्ध रोकने को कहा । भगवान विष्णु ने ब्रम्हाजी को प्रणाम किया किया और फिर वो वहाँ से चले गये। राजा क्षुप को बहुत दुःख हुआ, दधीचि के पास आये और बोले कि हे महर्षि मैंने जो अज्ञानता वश आपका तिरस्कार या अपमान किया हैं उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। आप तो महाज्ञानी है अतः मुझे क्षमा कर दें  लेकिन दधीचि कहाँ सुनने वाले उन्होंने राजा क्षुप भगवान विष्णु तथा समस्त देवताओं को श्राप दें दिया कि आप सभी राजा दक्ष के यज्ञ में रूद्र के क्रोध से भस्म हो जाओगे।  ऐसा कहकर दधीचि आश्रम में चले  गये और उदास मन से राजा क्षुप भी अपनी i राजधानी लौट गए।

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