मित्रों यूँ तो आपने महाभारत से जुडी कई कथाएं सुनी होगी परन्तु महाभारत से जुडी कई ऐसी कथाएं हैं जिससे आज भी हिन्दू जनमानस अनजान हैं। इस लेख में हम आपको महाभारत काल में दिए गए कुछ ऐसे श्राप के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में ये माना जाता है की उन श्रापों को आज भी जनमानस भुगत रहे हैं।

पहला श्राप – युधिष्ठिर द्वारा स्त्री जाति को दिया गया श्राप

महाभारत में दिए गए श्रापों में युधिष्ठिर का स्त्री जाति को दिया गया श्राप सर्वविदित है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार जब कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान अर्जुन ने महारथी कर्ण का वध कर दिया तब पांडवों की माता कुंती उसके शव के पास बैठकर विलाप करने लगी। यह देखकर पांडवों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की आखिर ऐसी क्या बात है जो हमारी माता हमारे शत्रु के शव पर अपना आंसू बहा रही है। तब ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर अपनी माता कुंती के पास गए और उन्होंने देवी कुंती से पूछा माता क्या बात है  जो आप हमारे सबसे बड़े शत्रु कर्ण के शव पर विलाप कर रही है। तब देवी कुंती ने बताया की पुत्रों जिससे तुम अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते रहे वास्तव में वो तुम सभी का बड़ा भाई था। कर्ण राधेय नहीं बल्कि कौन्तेय था। अपनी माता के मुख से ऐसी बातें सुनकर पांचों पांडव दुखी हो गए। फिर कुछ क्षण रुककर युधिष्ठिर अपनी माता कुंती से बोले हे माते ये बात तो आप सदा से जानती रही होगी की अंगराज कर्ण मेरे बड़े भाई थे तब आप ने हमलोगों को यह बात बताई क्यों नहीं। इतने दिनों तक ये बात आप छुपा कर क्यों रखी,आपके एक मौन ने हम सभी को अपने ही भाई का हत्यारा बना दिया। इसलिए मैं आज इस धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में सभी दिशाओं,आकाश और धरती को साक्षी मानकर सभी स्त्रीजाति को ये श्राप देता हूँ की आज के बाद कोई भी स्त्री अपने अंदर कोई भी रहस्य नहीं छुपा पाएगी।

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दूसरा श्राप – श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप

कथा के अनुसार छतीस साल हस्तिनापुर पर राज करने के पश्चात् जब पांचों पांडव द्रौपदी सहित स्वर्गलोक की और प्रस्थान करने हुए तो उन्होंने अपना सारा राज्य अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के हाथो में सौंप दिया। ऐसा माना जाता है की राजा परीक्षित के शासन काल में भी हस्तिनापुर की सारी प्रजा युधिष्ठिर के शासनकाल की तरह ही सुखी थी। परन्तु कहते हैं ना की होनी को कौन टाल सकता है। एक दिन राजा परीक्षित रोज की तरह ही वन में आखेट खेलने को गए तभी उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए। वे अपनी तपस्या में लीन थे तथा उन्होंने मौन व्रत धारण क़र रखा था। परन्तु ये बात राजा परिलक्षित को मालोमं नहीं था। इसलिए राजा परीक्षित ने कई बार ऋषि शमीक को आवाज लगाई लेकिन उन्होंने अपना मौन धारण रखा। यह देखकर राजा परीक्षित को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में आकर ऋषि के गले में एक मारा हुआ सांप डाल दिया।उधर जब यह बात ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया की आज से सात दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हो जायेगी।और अंत में ऋषि श्रृंगी के श्राप के कारण राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने के कारण ही हुई। और ऐसा माना जाता है की उसी के बाद कलयुग की शुरुआत हुई क्यूंकि  राजा परीक्षित के जीवित रहते कलयुग में इतना साहस नहीं था की वह इंसानो पर हावी हो सके। और आज हम सभी इस कलयुग को उसी श्राप के कारण भोग रहे हैं।

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तीसरा श्राप – श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप

महाभारत युद्ध के अंतिम दिन जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया और बात का पता जब पांडवों को चला तो तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुंचे। पांडवों को अपने सामने देख अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र से वार किया। यह देख श्री कृष्ण ने अर्जुन को ब्रह्मास्त्र चलने को कहा जिसके बाद अर्जुन ने भी अश्व्थामा पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। परन्तु महर्षि व्यास ने बिच में ही दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा एवं अर्जुन से कहा क्या तुम लोग ये नहीं जानते की ब्रह्मास्त्र के आपसे में टकराने से समस्त सृष्टि का नाश हो जायेगा। इसलिए तुम दोनों  अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस ले लो। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने महर्षि से कहा महर्षि मेरे पिताजी ने इसे वापस लेने की विद्या नहीं सिखाई है इसलिए मैं इसे वापस नहीं ले सकता और इसके बाद उसने ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी. तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी। इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे।दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे।और इसी कारण आज भी ये माना जाता है की अश्व्थामा अभी भी जीवित है।

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चौथा श्राप – माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप

महाभारत में मांडव्य ऋषि का वर्णन आता है। एक बार राजा ने भूलवश न्याय में चूक क़र दी और अपने सैनिकों को ऋषि मांडव्य को शूली में चढ़ाने का आदेश दे दिया।परन्तु जब बहुत लम्बे समय तक भी शूली में लटकने पर ऋषि के प्राण नहीं गए तो राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ तथा उन्होंने ऋषि मांडव्य को शूली से उतरवाया तथा अपनी गलती के लिए मांगी। इसके बाद ऋषि माण्डव्य यमराज से मिलने गए तथा उनसे पूछा की किस कारण मुझे झूठे आरोप में सजा मिली। तब यमराज ऋषि से बोले जब आप 12 वर्ष के थे तो आपने एक छोटे से कीड़े के पूछ में सीक चुभाई थी जिस कारण आपको यह सजा भुगतनी पड़ी।यह सुन ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने यमराज से कहा की  किसी को भी 12 वर्ष के उम्र में इस बात का ज्ञान नहीं रहता की धर्म और अधर्म क्या है। क्योकि की तुमने एक छोटे अपराध के लिए मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। अतः मैं तुम्हे श्राप देता हूँ की तुम शुद्र योनि में दासी के पुत्र के रूप में जन्म लोगे। माण्डव्य ऋषि के इस श्राप के कारण यमराज को विदुर के रूप में जन्म लेना पडा।

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पांचवां श्राप – अप्सरा उर्वशी का अर्जुन को श्राप

ये कथा उस समय की है जब तरह साल के वनवास के दौरान एक बार अर्जुन दिव्यास्त्र की खोज में स्वर्ग लोक गया। वहां उर्वशी नाम की एक अप्सरा उनके रूप एवं सौंदर्य को देखकर उन पर मोहित हो गई। फिर एक दिन उर्वशी ने अर्जुन को विवाह करने को कहा तब अर्जुन ने उससे कहा की मैं आपको माता के समान मनाता हूँ इसलिए मैं आपसे विवाह नहीं कर सकत। इस बात पर उर्वशी क्रोधित हो गई तथा उसने अर्जुन से कहा की तुम एक नपुंसक की तरह बात क़र रहे हो, इसलिए मैं तुम्हे श्राप देती हूँ की तुम आजीवन नपुंसक हो जाओ तथा स्त्रियों के बीच तुम्हे नर्तक बन क़र रहना पड़े। यह बात सुनकर अर्जुन विचलित हो गए और फिर वो देवराज इंद्र के पास गए और उन्हें सारी बात बताई। उसके बाद देवराज इंद्र के कहने पर उर्वशी ने अपने श्राप की अवधि एक साल के लिए सिमित कर दी। तब इंद्र ने अर्जुन को संतावना देते हुए कहा की तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं है यह श्राप तुम्हारे वनवास के समय वरदान के रूप में काम करेगा और अज्ञातवास के समय तुम नर्तिका के वेश में कौरवों के नजरो से बचे रहोगे।

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