गंगा की उत्पत्ति

गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई | नारद जी ने कहा -वेद वेताओं में श्रेष्ठ भगवन ! पृथ्वी का यह परम मनोहर उपाख्यान सुन चूका। अब आप गंगा का विशद प्रसंग सुनाने की कृपा कीजिये। प्रभो ! सुरेश्वरि,विष्णुस्वरूपा एवं स्वंय विष्णुपदी नाम से विख्यात गंगा सरस्वती के शाप से भारतवर्ष में किस प्रकार और किस युग में पधारी ? किसकी प्रार्थना एवं प्रेरणा से उन्हें वहां जाना पड़ा ? पाप का उच्छेद करनेवाला यह पवित्र एवं पुण्यप्रद प्रसंग सुनना चाहता हूँ।

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गंगा की कहानी | भगवान नारायण कहते हैं – नारद श्रीमान सगर एक सूर्यवंशी सम्राट हो चुके हैं। मन को मुग्ध करने वाली उनकी दो रानियां थी वैदर्भी और शैब्या। उनकी पत्नी शैब्या से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुल को बढ़ानेवाले उस सुन्दर पुत्र का नाम असमंजस पड़ा। उनकी दूसरी पत्नी वैदर्भी ने पुत्र की कामना से भगवान शंकर की उपासना की। शंकर के वरदान से उसे भी गर्भ रह गया। पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसके गर्भ से एक मांसपिण्ड की उत्पत्ति हुई। उसे देखकर वह बहुत ही दुखी हुई और उसने भगवान शिव का ध्यान किया। तब भगवान शंकर के वेष में उसके पास पधारे और उन्होंने उस मांसपिण्ड को साठ हजार भागों में बाँट दिया। वे सभी टुकड़े पुत्र रूप में परिणत हो गए। उनके बल और पराक्रम की सीमा नहीं रही। उनके परम तेजस्वी कलेवर ने ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्नकालीन सूर्य की प्रभा का मानो हरण कर लिया था,परन्तु वे सभी तेजस्वी कुमार कपिल मुनि के शाप से जलकर भस्म हो गए। यह दुखद समाचार सुनकर राजा सगर की आँखें निरंतर जल बहाने लगी। वे बेचारे घोर जंगल में चले गए। तब उसनके पुत्र असमंजस ने गंगा को ले आने के लिए तपस्या आरम्भ कर दी। वे बहुत काल तक तपस्या करते रहे। अंत में काल ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया। असमंजस के पुत्र का नाम अंशुमान था। गंगा को ले आने के लिए लम्बे समय तक तपस्या करने के पश्चात् वे भी काल के गाल में चले गये।

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गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई | अंशुमान के पुत्र भगीरथ थे। भगीरथ भगवान के परम भक्त,विद्वान,श्रीहरि में अटूट श्रद्धा रखनेवाले,गुणवान तथा वैष्णव पुरुष थे। गंगा को ले आने का निश्चय करके उन्होंने बहुत समय तक तपस्या की। अंत में भगवान श्री कृष्ण के उन्हें साक्षात दर्शन हुए। उस समय भगवान के श्री विग्रह से ग्रीष्मकालीन करोड़ों सूर्यों के समान प्रकश फैला रहा था। उनके दो भुजाएं थीं। वे हाथ में मुरली लिए हुए थे। उनकी किशोर अवस्था थी। वे गोप के वेष में पधारे थे। भक्तों पर कृपा करने के लिये उन्होंने यह रूप धारण किया था। मुने भगवान श्री कृष्ण परिपूर्ण प्रब्रह्म हैं। वे चाहे जैसा रूप बना सकते हैं। उस समय ब्रह्मा विष्णु और शिव आदि उनकी स्तुति कर रहे थे और मुनियों ने उनके सामने अपने मस्तक झुका रखे थे। सदा निर्लिप्त,सबके साक्षी,निर्गुण,प्रकृति से परे तथा भक्तों पर अनुग्रह करनेवाले उन भगवान श्री कृष्ण का मुख मुस्कान से सुशोभित था। विशुद्ध चिन्मय वस्त्र तथा दिव्य रत्नो से निर्मित आभूषण उनके श्रीविग्रह को सुशोभित कर रहे थे। उनकी यह दिव्य झांकी पाकर भगीरथ ने बार बार-उन्हें प्रणाम किया और स्तुति भी की। लीलापूर्वक उन्हें भगवान से अभीष्ट वर भी मिल गया। वे चाहते थे कि मेरे पूर्वज तर जाएँ। परम आनंद के साथ उन्होंने भगवान की दिव्य स्तुति की थी।

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गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई, गंगा की कहानी ? भगवान श्रीहरि ने गंगा जी से कहा – सुरेश्वरि ! तुम सरस्वती के शाप से अभी भारतवर्ष में जाओ और मेरी आज्ञा के अनुसार सगर के सभी पुत्रों को पवित्र करो। तुमसे स्पर्शित वायु के संयोग पाकर ही वे सभी राजकुमार मेरे धाम में चले जायेंगे। उनका भी विग्रह मेरे जैसा ही हो जायेगा और वे दिव्य रथ पर सवार होंगे। उन्हें मेरे पार्षद होने का सुअवसर प्राप्त होगा। वे सर्वदा अधि-व्याधि से मुक्त रहेंगे। उनके जन्म-जन्मांतर के पापों की समस्त पूँजी समाप्त हो जाएगी। श्रुति में कहा गया है कि भारतवर्ष में मनुष्यों द्वारा उपार्जित करोड़ों जन्मों के पाप गंगा की वायु के स्पर्श मात्र से नष्ट हो जाते हैं। स्पर्श और दर्शन की अपेक्षा गंगा देवी में मौसल स्नान करने से दस गुना पुण्य होता है। सामान्य दिन में भी स्नान करने से मनुष्यों के अनेकों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। पर्वों तथा विशेष पुण्य तिथियों पर स्नान करने का विशेष फल कहा गया है। सामान्यतः गंगा में स्नान करने की अपेक्षा चंद्रग्रहण के अवसर पर स्नान करने से अनंत गुना अधिक पुण्य कहा गया है। सूर्य ग्रहण में इससे दसगुना अधिक समझना चाहिए। इससे सौगुना पुण्य अर्धोदय के समय स्नान करने से मिलता है।

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गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई? बहुत पहले की बात है अयोध्यापुरी में सगर नाम के राजा थे। उनको पुत्र नहीं था अतः उन्हें पुत्र प्राप्ति की इच्छा थी। सगर की पटरानी का नाम कोर्शनी था। वह विदर्भ देश के राजा की बेटी और बड़ी धर्मिष्ठा और सत्यवादिनी थी। इनकी दूसरी रानी का नाम सुमति था और वह श्र्ष्ठनेमी की बेटी थी और अत्यंत रूपवती अर्थात सुंदरी थी। उन दोनों रानियों सहित महाराज सगर हिमालय के भृगुप्रस्त्र वन नामक प्रदेश में जा कर तप करने लगे। तपस्या करते हुए महाराज सगर को जब सौ वर्ष पूरे हो गए तब सत्यवादी महर्षि भृगु ने सगर की तपस्या से प्रसन्न हो उन्हें यह वर दिया। हे पुरुषश्रेष्ठ तुम्हे बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी और अतुल कीर्ति भी मिलेगी। तुम्हारी दोनों रानियों में से एक का पुत्र तो वंश बढ़ाने वाला होगा और दूसरी के साठ हजार पुत्र होंगे।

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जब मुनि ने ऐसा कहा तब दोनों रानियों ने हाथ जोड़कर कहा हे ब्राह्मण आपका वरदान साथ हो किन्तु यह तो बतलाइये कि एक किसके और साठ हजार पुत्र किसके होंगे। उन रानियों के इस प्रश्न के उत्तर में भृगु जी महाराज ने कहा यह तुम दोनों की इच्छा पर निर्भर है। अर्थात जो जैसा चाहेगी उसके वैसा ही होगा। तुम दोनों अलग अलग बतलाओ कि तुम में से कौन वंश को वृद्धि करने वाला एक पुत्र और कौन बड़े बलवान कीर्तिशाली और सुमित उत्साही साठ हजार पुत्र प्राप्ति का वर चाहती है। हे रघु नंदन भृगु जी के इस प्रश्न को सुन केशिनी ने वंश कर एक पुत्र प्राप्त किया। और सुमति को बलवान कीर्तिमान साथ हजार पुत्र होने का वरदान मिला। हे राम महर्षि भृगु की परिक्रमा कर और उनको प्रणाम कर रानियों सहित महाराज सगर अपनी राजधानी को लौट आये।

कुछ समय बीतने पर सगर की पटरानी केशिनी के गर्भ से असमंजस नाम का एक राजकुमार उत्पन्न हुआ। और रानी सुमति के गर्भ से एक तुंवा निकला। जब तुंवे को फोड़ने पर उसमे से साठ हजार बालक निकले। उन सब को दाइयों ने घी से भरे हुए घड़ों में रख,पाला पोसा और इस प्रकार बहुत समय बिताने पर ये सब जवान हुए। बहुत दिनों में सगर के ये साठ हजार पुत्र जवान हुए। हे राम सगर का ज्येष्ठ राजकुमार असमंजस अयोध्यावासियों के बालकों को पकड़ कर सरयू नदी में फेंक दिया करता और जब वे डूबने लगते तब वह उन्हें डूबते हुए देखकर प्रसन्न होता था। वह बड़ा दुराचारी हो गया और वह सज्जनो को सताने लगा अर्थात उसके आचरण सज्जनो के आचरणों से बहुत दूर थे।

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गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस प्रकार महाराज सगर से पुरवासियों को सताने वाले असमंजस को देश निकाले का दण्ड दिया। असमनजस के अंशुमान नामक एक पराक्रमी पुत्र था। जो सब की सम्मति से चलता था सब से प्रिय वचन बोलता था। बहुत दिनों बाद महाराज सगर की इच्छा हुई कि यज्ञ करें। हे राम ऐसा निश्चय कर वे ऋत्विजों को बुला कर यज्ञ करने लगे।

अपने साठ हजार पुत्रों से यह बोले कि हे पुत्रों यज्ञीय अश्व के हरने वाले दुष्ट राक्षस नहीं दिखलाई पड़ते कि वे किस मार्ग से घोडा चुरा कर ले गए। यज्ञ बड़े बड़े मन्त्रवेत्ता महात्माओं द्वारा कराया जाता है जिससे किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित न हो। अब तुम लोगों को चाहिए कि तुरंत जा कर घोड़े का पता लगाओ। समुद्र से घिरी हुई जीतनी पृथ्वी है सब ढूंढना। एक एक योजन ढूंढ कर आगे बढ़ना। मेरी आज्ञा से अश्वहर्ता को ढूंढते हुए पृथ्वी खोदते जाना जब तक घोडा न दिखाई दे। मैं तो यज्ञीय दीक्षा लिये हुए हूँ। सो जब तक मैं घोड़े को देख न लूँ तब तक अंशुमान और उपाध्यायों सहित यहीं रहूँगा। जाओ,तुम्हारा मंगल हो। हे राम वे महाबली राजकुमार प्रसन्न हो और पिता की आज्ञा पाकर पृथ्वी भर में ढूंढने लगे। हे नरशार्दूल सारी पृथ्वी खोज चुकने के पीछे अपने वज्र के समान नखों से प्रत्येक राजकुमार एक एक योजन पृथ्वी खोदने लगे।