महाभारत युद्ध में जब हस्तिनापुर में बैठे कौरवों के पिता धृतराष्ट्र अंधे होने के कारण युद्ध देखने में सक्षम नहीं थे तब संजय ने हस्तिनापुर के महल में बैठकर ही कुरुक्षेत्र के युद्ध का हर दिन का हाल धृतराष्ट्र को सुनाया था। तो कैसे संजय इतनी दूर से महाभारत को इतनी सूक्ष्म दृष्टि से देख पाए? क्या उस काल में यह सबके लिए संभव था या संजय के पास कोई शक्ति थी आज की कड़ी हम लेकर आये हैं एक महत्वपूर्ण जानकारी के साथ कि संजय के पास ऐसी कौन सी विशेष योग्यता प्राप्त थी जिससे वो महाभारत का युद्ध देख सके ?

इससे पहले आइये जानते हैं संजय कौन थे।

संजय धृतराष्ट्र की सभा के सदस्य थे। उन्हें बहुत ही स्पष्वादी, सदाचारी, सत्यवादी, निर्भय, धर्म के पक्षपाती और भगवान कृष्ण के परम भक्त के रूप में देखा जाता है। धर्म का साथ देने वाले संजय धृतराष्ट्र की सभा के सदस्य होने बावजूद भी पांडवों के प्रति सहानुभूति रखते थे। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि उन्होंने बहुत बार धृतराष्ट्र को उनके पुत्रों का पांडवों के प्रति व्यवहार को लेकर चेतावनी दी थी। जब कौरवों द्वारा द्रौपदी का अपमान हुआ तब विदुर, गुरु द्रोण, और भीष्म पितामह ने कौरवों को रोकने का प्रयास किया परन्तु कौरवों ने किसी की बात नहीं मानी और भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया। जब पांडव द्यूतक्रीड़ा में कौरवों से हारकर वन में चले गए थे तब भी संजय ने धृतराष्ट्र को चेतावनी दी थी कि कौरवों के ऐसे असहिष्णु व्यवहार के कारण कौरवों का विनाश तो होगा ही साथ ही इसके साथ निर्दोष प्रजा भी व्यर्थ में ही मारी जायेगी।

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अंततः संजय की बात सत्य हुई और महाभारत जैसे भयंकर युद्ध को नहीं रोका जा सका। चूँकि धृतराष्ट्र अंधे थे युद्ध के आरम्भ होने से पूर्व महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र से कहा कि युद्ध देखने के लिए वे उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान कर सकते हैं परन्तु धृतराष्ट्र को पता था कि उसके अधर्मी पुत्रों का विनाश निश्चित है इसलिए उन्होंने दिव्य दृष्टि प्राप्त करने की बात को स्वीकार नहीं किया। वेदव्यास जी जानते थे कि धृतराष्ट्र अवश्य ही युद्ध के समय रणभूमि का हाल जान्ने के लिए व्याकुल होंगे। इसलिए वेदव्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की जिससे वो न केवल प्रत्यक्ष रूप से हो रही घटनाएं अपितु मन में चिंतन की जाने वाली हर बात को भी जान सकते थे। जब युद्ध में भीष्म पितामह बाणों की शैया पर थे तब संजय ने धृतराष्ट्र को इसकी सूचना दी। धृतराष्ट्र यह सुन शोकाकुल हुए और संजय से युद्ध का सारा हाल पूछा। तब संजय ने पांडवों और कौरवों दोनों पक्षों की स्थिति का वर्णन किया और भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया गीता का उपदेश धृतराष्ट्र को सुनाना आरम्भ किया। भगवद गीता महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है। साथ ही संजय ने भगवान कृष्ण के यथार्थ स्वरुप का भी वर्णन करते हुए कहा कि संसार में जहाँ भी सत्य, सरलता, सहजता और धर्म का पालन होता है वहां श्री कृष्ण का वास होता है और जहाँ भगवान कृष्ण हैं वहां निसंदेह विजय होती है।

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और मित्रों इस प्रकार महर्षि वेदव्यास द्वारा प्राप्त हुई दिव्य शक्ति से संजय ने भगवद गीता समेत युद्ध का पूरा हाल धृतराष्ट्र को सुनाया।

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