देवी सरस्वती का नाम नन्दा कैसे पड़ा

देवी सरस्वती का नाम नन्दा कैसे पड़ा:

एक ऐसा राजा जिसने अपने पुत्र के आधे शरीर को दान कर दिया

देवी सरस्वती का नाम नन्दा कैसे पड़ा: प्रिये दर्शकों जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म में देवी सरस्वती को विद्या एवं ज्ञान की देवी माना जाता है। और ऐसा भी माना जाता है की पृथ्वी लोक पर मनुष्यों के उद्धार के लिए देवी सरस्वती नदी के रूप में अवतरित हुई थी। जिसके जल को हिन्दू धर्म में गंगाजल की तरह पवित्र माना जाता है। और देवी सरस्वती ही पृथ्वी लोक पर देवी नन्दा के नाम से जानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देवी सरस्वती का नाम नन्दा कैसे और किसकी वजह से पड़ा अगर नहीं तो इस कथा को अंत तक जरूर देखें क्यंकि आज की इस वीडियो में मैं आपको इसी से जुडी कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसका वर्णन पदम् पुराण में किया गया है।

नमस्कार दर्शकों THE DIVINE TALES पर आपका एक बार फिर से स्वागत है।

पदम् पुराण के सृष्टिखण्ड में वर्णित कथा के अनुसार बहुत पहले पृथ्वी पर प्रभंजन नाम के एक महाबली राजा हुआ करते थे। एक दिन की बात है राजा प्रभंजन हिरणो का शिकार करने के लिए वन गए हुए थे वहां पहुंचकर उन्होने देखा कि एक झाडी के भीतर एक हिरणी खड़ी है। फिर उन्होंने अपने तरकस से बाण निकाल कर उस पर चला दिया। राजा के द्वारा चलाया गया तीक्ष्ण बाण तत्काल ही हिरणी को बिंध डाला। उधर बाण लगते ही वह हिरणी आहत होकर जमीन पर गिर गयी। फिर जब उस हिरणी होश आया तो उसने देखा कि उसके सामने राजा प्रभंजन हाथ में धनुष बाण धारण उसके सामने खड़े हैं। यह देख वह हिरणी उससे बोली ओ मूढ़ राजन तुमने ये क्या किया ? क्या तुम्हे ये दिखाई नहीं दिया कि मैं यहाँ अपने संतान को दूध पिला रही थी। और इसी अवस्था में तुमने मुझ निरपराध हिरणी को अपने बाण का निशाना बनाया। तेरा यह अपराध क्षमा के योग्य नहीं है इसलिए मैं तुम्हे श्राप देती हूँ कि इसी समय तुम कच्चा मांस खाने वाले पशु बन जाओ अर्थात तुम बाघ बन जाओ।

उधर हिरणी का श्राप सुनकर सामने खड़े हुए राजा प्रभंजन व्याकुल हो उठे। फिर कुछ क्षण बाद उन्होंने हिरणी के सामने हाथ जोड़ते हुए बोले हे कल्याणी मैं नहीं जानता था कि तुम अपने संतान को दूध पिला रही थी और अनजाने में मैंने तुझ पर ये बाण चला दिया। हो सके तो मुझे क्षमा कर दो और कृपया कर यह बता दो कि मुझे बाघ की योनि से मुक्ति कब मिलेगी। क्योंकि मैं तुमसे अपना श्राप वापस लेने को नहीं कह सकता। तब वह हिरानी बोली राजन आज से सौ वर्ष पश्चात् जब तुम एक गाय के साथ वार्तालाप करोगे तब तुम्हे बाघ की योनि से मुक्ति मिल जाएगी और उस गाय का नाम नन्दा होगा। इतना कहकर उस हिरणी ने अपने प्राण त्याग दिए। उधर हिरणी के प्राण त्यागते ही राजा प्रभंजन बाघ बन गए। उस बाघ की आकृति बड़ी ही भयानक थी। उसके बाद बाघ रुपी राजा प्रभंजन उस वन में मौजूद पशुओं का शिकार कर अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उसके बाद समय बीतता गया और एक दिन बाघ रुपी राजा प्रभंजन के मन में यह विचार आया की आज से वह पशुओं की हत्या नहीं करेंगे परन्तु फिर उन्होंने सोचा की अगर मैंने शिकार करना छोड़ दिया तो जीवित कैसे रह पाउँगा। इस योनि में मेरे द्वारा पुण्य नहीं हो सकता। पता नहीं कब मुझे इस योनि से मुक्ति मिलेगी।

एक ऐसा राजा जिसने अपने पुत्र के आधे शरीर को दान कर दिया

उधर जब राजा प्रभंजन के श्राप के सौ साल पूरे होने वाले थे तब एक दिन उस वन में गौओं का एक बहुत बड़ा झुण्ड घास चरने आया। गौओं के उस झुण्ड में एक बहुत ही हष्ट पुष्ट गाय थी जिसका नाम नन्दा था। नन्दा गौओं के उस झुण्ड की प्रधान गाय थी। नन्दा को किसी से भी डर नहीं लगता था। वह सबके सामने निर्भय होकर चला करती थी। परन्तु उस दिन वह अपने झुण्ड से बिछुड़ गयी और चरते-चरते बाघ रुपी राजा प्रभंजन के सामने जा पहुंची। फिर वह बाघ नन्दा के समीप पहुंचा और बोला आज विधाता ने तुझे मेरा ग्रास नियत किया है क्योंकि तुम स्वंय चलकर मेरे पास आई हो। बाघ के मुख से ऐसी बातें सुनकर नन्दा को अपने पुत्र की याद आने लगी। वह अपने पुत्र को याद कर रोने लगी। नन्दा को रोता हुआ देख बाघ बोला हे गाय इस संसार में सब लोग अपने कर्मो का ही फल भोगते हैं। तुम स्वंय मेरे पास आ पहुंची हो इससे जान पड़ता है कि तेरी मृत्यु विधाता ने आज ही नियत की है। फिर व्यर्थ शोक क्यों करती है ? अच्छा यह तो बता तुम रो क्यों रही हो।

बाघ का प्रश्न सुनकर नन्दा बोली हे व्याघ्र मैं तुम्हे नमस्कार करती हूँ। अगर मुझसे कोई अपराध हो गया हो तो मुझे क्षमा कर दो। मैं जानती हूँ तुम्हारे पास आये हुए प्राणी की रक्षा असंभव है किन्तु मैं जीवन के लिए शोक नहीं करती। क्योंकि एक ना एक दिन तो सभी की मृत्यु होनी ही है उसके लिए क्या चिन्ता किन्तु बाघराज अभी अभी मैंने एक बछड़े को जन्म दिया है। यह बछड़ा मेरी पहली संतान है जिस कारण वह मुझे बहुत ही प्रिय है। मेरा बच्चा अभी मेरे ही दूध पीकर जिन्दा रहता है और इस समय वह भूख से पीड़ित होकर मेरी राह देख रहा होगा। यही सोच कर मैं रोने लगी थी। मैं सोच रही थी की मेरा बच्चा कैसे जिन्दा रहेगा। ?इसलिए मैं उसे दूध पिलाना चाहती हूँ। अतः मुझे थोड़ी देर के लिए जाने दो। बछड़े को दूध पिलाकर और उसे अपनी सखियों की देख रेख में सौंपकर मैं तुम्हारे पास लौट आउंगी। उसके बाद तुम मुझे खा लेना।

नन्दा की बात सुनकर बाघ ने कहा अब तुझे पुत्र से क्या काम है ? नन्दा बोली व्याघ्रेंद्र मैंने पहले पहल बछड़े को जन्म दिया है। अतः उसके प्रति मेरी बड़ी ममता है मुझे जाने दो। मैं तुम्हे वचन देती हूँ कि मैं अपनी जन्मदायिनी माता को देखकर और उन सबसे विदा लेकर आ जाउंगी। यदि मैं पुनः लौटकर न आऊं तो मुझे वही पाप लगे जो ब्राह्मण तथा माता-पिता का वध करने से होता है।इतना ही नहीं जो एक बार अपनी कन्या का दान करके फिर उसे दूसरे को देना चाहते हैं और उन्हें जो पाप लगता है वही मुझे भी लगे।

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नन्दा की बातें सुनकर बाघ रुपी उस राजा विश्वास हो गया और उसने गाय से कहा गाय तुम्हारी इन वचनो से मुझे विश्वास हो गया है। पर कुछ लोग तुमसे यह भी कहेंगे कि स्त्री के साथ हास-परिहास में,विवाह में,गौ को संकट से बचाने में तथा प्राण संकट उपस्थित होने पर जो शपथ की जाती है,उसकी उपेक्षा से पाप नहीं लगता। किन्तु तुम पर इन बातों पर विश्वास न करना। इसलिए तुम्हारी बुद्धि में यह बात नहीं आनी चाहिए कि मैंने शपथों द्वारा व्याघ्र को ठग लिया। तुमने ही मुझे धर्म का सारा मार्ग दिखाया है। अतः इस समय तुम्हारी जैसी इच्छा हो करो। बाघ की बातें सुनकर नन्दा बोली हे व्याघ्र तुम्हारा कथन ठीक है तुम्हे कौन ठग सकता है। तब उस बाघ ने कहा गाय अब तुम जाओ और अपने पुत्र को दूध पिलाओ तथा माता,भाई,सखी से मिलकर शीघ्र ही यहाँ लौट आओ।

बाघ के ऐसा कहने पर नन्दा अपने घर की ओर चल पड़ी किन्तु उसके आँखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। फिर घर पहुंचकर जब उसके कानो में अपने बछड़े की आवाज सुनाई दी तो वह तेजी से दौड़कर उससे जाकर लिपट गई और जोर जो से रोने लगी। अपने माता को रोता हुआ देख बछड़े ने शंकित होकर पूछा ,माँ आज क्या हो गया है ? तुम रो क्यों रही हो ? और आज तुम अत्यंत डरी हुई दिख रही हो ? बछड़े के मुख से ऐसी बातें सुनकर नन्दा बोली पुत्र तुम मेरा दूध पीओ क्योंकि यह हमलोगों की अंतिम भेंट है। आज के बाद तुम्हे अपनी माता का दूध पिने को नहीं मिलेगा। यह सुन बछड़ा बोलै लेकिन माता आप ऐसा क्यों बोल रही हैं। तब नन्दा बोली पुत्र मैं आज जब वन में घास चरने गई थी तो वहां मुझे एक बाघ मिला। वह भूखा था और मुझे खाना चाहता था। इसलिए मैं उसे वचन देकर आई हूँ कि तुम्हे दूध पिलाकर और सखियों से मिलकर उसके पास वापस लौटकर आउंगी।

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अपनी माता की बातें सुनकर बछड़ा बोला माँ मैं भी तुम्हारे साथ उस बाघ के पास चलूँगा। तुम ना रहोगी तो मैं अकेले भी तो मर ही जाऊंगा फिर साथ ही क्यों ना मरुँ ? यदि बाघ तुम्हारे साथ मुझे भी मार डालेगा तो निश्चय ही मुझको वह उत्तम गति मिलेगी। अपने पुत्र की बातें सुनकर नन्दा ने कहा पुत्र मेरी ही मृत्यु नियत है.दूसरे की मृत्यु के साथ अन्य जीवों की मृत्यु नहीं होती क्योंकि जिसकी मृत्यु नियत है उसी की होती है। तुम्हारे लिए माता का यह उत्तम एवं अंतिम सन्देश है,मेरे वचनो का पालन करते हुए यहीं रहो। और जीवन में कभी भी लोभ में आकर ऐसी घास को चरने के लिये न जाना,जो किसी दुर्गम स्थान हो। भयंकर वन में कभी अकेला न रहे। मेरी मृत्यु से तुम घबराना नहीं क्योंकि एक न एक दिन सबकी मृत्यु निश्चित है। पुत्र तुम शोक छोड़कर मेरे इन वचनो का ध्यान रखना।

इतना कहकर नन्दा अपने पुत्र के मस्तक को चूमकर रोती हुई अपने माता के पास जाकर बोली माता मैं अपने झुण्ड के आगे चरती हुई चली जा रही थी। इतने में ही एक व्याघ्र मेरे पास आ पहुंचा। मैंने उसे लौट आने का वचन देकर आप सबसे मिलने आई थी और अब फिर वही जा रही हूँ। माँ अगर मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो मुझे क्षमा करना। फिर नन्दा अपने सखियों से बोली सखियों मैंने जाने अनजान में यदि तुमसे कोई अप्रिय बात कह दी हो अथवा और कोई अपराध किया हो तो उसके लिए तुम सब मुझे क्षमा करना। मैं तुम्ही लोगों को के भरोसे अपने पुत्र को छोड़कर जा रही हूँ। उसका ध्यान रखना। नन्दा की बात सुनकर उसकी माता और सखियों को बड़ा दुःख हुआ। वे बोली यह बड़े आश्चर्य की बात है कि व्याघ्र के कहने से सत्यवादिनी नन्दा पुनः उस भयंकर स्थान में प्रवेश करना चाहती है। नन्दे तुम्हे वहां नहीं जान चाहिए। क्योंकि ऋषियों ने कहा है कि अगर प्राण संकट में हो तो शपथों के द्वारा आत्मरक्षा करने से पाप नहीं लगता। जहाँ असत्य बोलने से प्राणियों की प्राण रक्षा होती हो वहां असत्य ही सत्य है और सत्य भी असत्य है।

सखियों की मुख से ये सारी बातें सुनकर नन्दा बोली बहिनो दूसरों के प्राण बचाने के लिये मैं भी असत्य कह सकती हूँ। किन्तु अपने जीवन की रक्षा के लिये मैं किसी तरह झूठ नहीं बोल सकती। क्योंकि जीव अकेले ही गर्भ में आता है,अकेले ही मरता है,अकेले ही उसका पालन-पोषण होता है तथा अकेले ही वह सुख-दुःख भोगता है,अतः मैं सदा सत्य ही बोलूंगी।यह सुन सखियाँ बोलीं नन्दे तुम सम्पूर्ण देवताओं और दैत्यों के द्वारा नमस्कार करने योग्य हो क्योंकि तुम परम सत्य का आश्रय लेकर अपने प्राणो का भी त्याग कर रही हो,जिनका त्याग बड़ा ही कठिन है।

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तदनन्तर नन्दा वहां से चल पड़ी। और कुछ क्षण पश्चात् उस स्थान पर पहुंची,जहाँ वह बाघ उसका इंतजार कर रहा था। फिर नन्दा ने देखा कि उसका बछड़ा भी दौड़ता हुआ वहां आ गया। फिर दोनों आकर उस बाघ के सामने खड़े हो गए। फिर नन्दा बोली व्याघ्रराज मैं सत्य धर्म का पालन करती हुई तुम्हारे पास आ गयी हूँ,अब मेरे मांस से तुम इच्छानुसार अपनी तृप्ति करो। यह देख वह बाघ बोला गाय तुम बड़ी सत्यवादिनी निकली।आओ तुम्हारा स्वागत है।मुझे तो लग रहा था कि तुम नहीं लौटोगी। तुम्हारे सत्य की परीक्षा के लिये ही मैंने पुनः तुम्हे भेज दिया था। अन्यथा मेरे पास आकर तुम जीवित कैसे लौट सकती थी। मैं तुम्हारे भीतर सत्य खोज रहा था,वह मुझे मिल गया। इस सत्य के प्रभाव से मैंने तुम्हे छोड़ दिया।

आज से तुम मेरी बहिन हुई और यह तुम्हारा पुत्र मेरा भांजा हो गया। शुभे तुमने अपने आचरण से मुझ महान पापी को यह उपदेश दिया है कि सत्य पर ही सम्पूर्ण लोक टिका हुआ है। सत्य के ही आधार पर धर्म टिका हुआ है। कल्याणी अब मैं वह कर्म करूँगा,जिसके द्वारा पाप से छुटकारा पा जाऊं। अब तक मैंने हजारों जीवों को मारा और खाया है। मैं महान पापी,दुराचारी,निर्दयी और हत्यारा हूँ। पता नहीं ऐसा दारुण कर्म करके मुझे अपने पापों से मुक्त होने के लिये कैसी तपस्या करनी चाहिए,उसे संक्षेप में बताओ।

बाघ के मुख से ऐसी बातें सुनकर गाय के आँखों में आंसू भर आया और वह बाघ से बोली गाय बोली भाई बाघ विद्वान् पुरुष सत्य युग में तप की प्रशंसा करते हैं और त्रेता में ज्ञान तथा उसके सहायक कर्म की। द्वापर में यज्ञों को ही उत्तम बतलाते हैं,किन्तु कलियुग में एकमात्र दान ही श्रेष्ठ माना गया है। सम्पूर्ण दानो में एक ही दान सर्वोत्तम है। वह है अभय दान। इससे बढकर दूसरा कोई दान नहीं है। जो समस्त चराचर प्राणियों को अभय-दान देता है वह सब प्रकार के भय से मुक्त होकर पर ब्रह्म को प्राप्त होता है।

तब वह बाघ बोला बहिन पूर्वकाल में मैं एक राजा था किन्तु एक हिरणी के शाप से मुझे बाघ का शरीर धारण करना पड़ा। तब से निरंतर प्राणियों का वध करते रहने के कारण मैं सारि बातें भूल गया था। किन्तु तुमसे मिलकर फिर उनका स्मरण हो आया है,तुम भी अपने इस सत्य के प्रभाव से उत्तम गति को प्राप्त होगी। अब मैं तुमसे एक प्रश्न और पूछता हूँ। तुम्हारा नाम क्या है ?

तब नन्दा बोली भाई मेरे स्वामी का नाम नन्द है और उन्होंने ही मेरा ना नन्दा रख दिया है। नन्दा का नाम कान में पड़ते ही राजा प्रभंजन शाप से मुक्त हो गये। उन्होंने पुनः बल और रूप से संपन्न राजा का शरीर प्राप्त कर लिया। उसी क्षण यशस्विनी नन्दा का दर्शन करने के लिए साक्षात् धर्म वहां आये और बोले नन्दे मैं धर्म हूँ तुम्हारी सत्यता से प्रसन्न होकर यहाँ आया हूँ। तुम मुझसे कोई श्रेष्ठ वर मांग लो। धर्म के ऐसा कहने पर नन्दा ने कहा धर्मराज आपकी कृपा से मैं पुत्र सहित उत्तम पद को प्राप्त होऊं तथा यह स्थान मुनियों को धर्म प्रदान करने वाला शुभ तीर्थ बन जाय। देवेश्वर यह सरस्वती नदी आज से मेरे ही नाम से प्रसिद्ध हो इसका नाम नन्दा पड़ जाय। नन्दा के ऐसा कहते ही वह पुत्रसहित उत्तम लोक में चली गयी। राजा प्रभंजन ने भी अपने पूर्वोपार्जित राज्य को पा लिया। नन्दा सरस्वती के तट से स्वर्ग को गयी थी इसलिए विद्वानों ने वहां सरस्वती का नाम नन्दा रख दिया। और तभी से देवी सरस्वती नन्दा के नाम से जाने जाने लगी। पदमपुराण की माने तो इस नदी के दर्शन मात्र से भी मनुष्य को पाप से छुटकारा मिल जाता है।

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