कृपाचार्य

पाठको इस लेख में मैं लेकर आया हूँ कौरवों और पांडवों के कुलगुरु कृपाचार्य से जुडी एक कथा। कृपाचार्य महाभारत के उन पात्रों में से एक हैं विषय में ज़्यादा से ज़्यादा लोग जानना चाहते हैं। कृपाचार्य को सात चिरंजीवियों में से एक माना जाता हैं। वे कौरवों और पांडवों के गुरु थे, उन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की  ओर से लड़ा था। कृपाचार्य की बहन कृपी का विवाह द्रोणाचार्य के साथ हुआ था। लेकिन मित्रों क्या आप जानते हैं कि कृपाचार्य माँ के गर्भ से नहीं जन्मे थे? नहीं तो चलिए मैं आपको बताता हूँ की कैसे हुआ था कृपाचार्य का जन्म ?

महाभारत की कथा

कृपाचार्य के जन्म का पूरा विवरण महाभारत के आदि पर्व में किया गया है। कथा के अनुसार महर्षि गौतम के पुत्र ऋषि शरद्वान थे। जिनका जन्म शरद्वान बाणों के साथ हुआ था। इसी वजह से उनकी  रूचि जितनी बाणों में थी उतनी किसी भी विद्या में नहीं थी। तपस्या से उन्होंने सभी अस्त्र शस्त्र प्राप्त कर लिए थे। शरद्वान की गहन तपस्या और अस्त्र शस्त्र का ज्ञान देख देवराज इंद्र भयभीत हो गए। और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए इंद्र ने जानपदी नामक देवकन्या को स्वर्ग से भेजा। जानपदी शरद्वान के आश्रम पहुंची और उन्हें लुभाने का प्रयास करने लगी। शरद्वान ने संयम से स्वयं पर नियंत्रण तो कर लिया परन्तु कुछ समय के लिए उनके मन में विकार का भाव उत्पन्न हो गया। जिसके कारण उनका शुक्रपात हो गया। फिर वह उसी समय अपने धनुष बाण और आश्रम छोड़कर वहां से चले गए।

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कृपाचार्य और कृपी का जन्म

शुक्रपात होने पर उनका वीर्य सरकंडों पर गिरा जो भागों में विभाजित हो गया।कुछ समय बाद इन दो भागों से दो संतानों की उत्पत्ति हुई । एक कन्या और एक बालक। उसी समय वहां से हस्तिनापुर के राजा शांतनु गुज़र रहे थे। उन्होंने इन दोनों बच्चों को देखा और ईश्वर की कृपा समझकर उन्हें अपने महल ले गए। शांतनु ने बालक का नाम कृप और बालिका का नाम कृपी रखा। कृप भी अपने पिता शरद्वान के समान धनुर्विद्या में बहुत पारंगत थे। बड़े होने के पश्चात कृप को भीष्म पितामह द्वारा कौरवों और पांडवों की शिक्षा के लिए नियुक्त किया गया। इस प्रकार वे आचार्य बने और कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुए। प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त होने के पश्चात पांडवों और कौरवों को अस्त्रों और शस्त्रों की विशेष शिक्षा देने के लिए द्रोणाचार्य को नियुक्त किया गया। जिनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हुआ।

ये तो थी कृपाचार्य और कृपी की जन्म कथा लेकिन आइये एक दृष्टि द्रोणाचार्य के जन्म पर भी डालते हैं।

द्रोणाचार्य का जन्म

गुरु द्रोण के जन्म की कथा भी बहुत रोचक है। उनका जन्म एक यज्ञ पात्र से हुआ। द्रोणाचार्य भारद्वाज मुनि के पुत्र थे। एक बार मुनि गंगा नदी में स्नान कर रहे थे। वहाँ उन्होंने घृतार्ची नामक एक अप्सरा को गंगा स्नान कर निकलते हुये देखा। उस अप्सरा को देख कर उनके मन में काम वासना जागृत हुई और उनका वीर्य स्खलित हो गया। जिसे उन्होंने एक यज्ञ पात्र में रख दिया। इसी यज्ञ पात्र से द्रोण की उत्पत्ति हुई। द्रोण ने अपने पिता के आश्रम में ही अस्त्रों शस्त्रों का ज्ञान अर्जित किया। और बाद में द्रोण ने कौरवों और पांडवों को अस्त्रों शस्त्रों की उच्च शिक्षा प्रदान की। इस प्रकार द्रोण गुरु द्रोणाचार्य के नाम से प्रसिद्द हुए।

तो मित्रों इस इस तरह महाभारत के ये दो पराक्रमी योद्धा कृपाचार्य और द्रोणाचार्य बिन माँ के जन्मे  थे। आशा है आपको यह जानकारी पसंद आयी होगी। 

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