पाठकों आप सभी ने रामायण की कई कहानियां पढ़ी होगी। परन्तु क्या आप माता सीता की चूड़ामणि की कहानी जानतें हैं। मित्रों अपहरण के समय माता सीता के पास एक ऐसी चूड़ामणि थी जिसके लंका में रहते हुए प्रभु श्री राम भी रावण का कभी भी वध नहीं कर पाते। इसलिए माता सीता ने हनुमान जी को वह चूड़ामणि राम को भेंट करने के लिए दे दी थी। इस पोस्ट में हम आपको बताएँगे की माता सीता के पास वह चूड़ामणि कहाँ से आई और उसमे क्या ऐसी शक्ति थी जिसकी वजह से इस मणि के रहते श्री राम भी नहीं कर सकते थे रावण का वध।

इस कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय चौदह रत्नो के आलावा दो देवियां रत्नाकर नंदिनी और महालक्ष्मी भी उत्पन्न हुई थी। रत्नाकर नन्दिनी ने विष्णु जी को देखते ही अपना तन मन उनको समर्पित कर दिया। और जब वह उनसे मिलने के लिए आगे बढीं तो सागर ने अपनी पुत्री को विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया दिव्य रत्न जड़ित चूडा मणि भेंट किया। इतने में महालक्षमी का जन्म हुआ और लक्षमी जी ने भी जब विष्णु जी को देखा तो मन ही मन उन्हें अपना पति मान लिया। यह देखकर रत्नाकर नन्दिनी मन ही मन लक्ष्मी जी ईर्ष्या करने लगी। जब इस बात का पता भगवान् विष्णु को चला तो वह रत्नाकर नन्दिनी के पास पहुँचे और बोले मैं तुम्हारे मन की बात जानता हूँ। इसलिए मैं जब जब पृथ्वीलोक पर धर्म की स्थापना के लिए अवतार लूंगा ,तब तब तुम भी मेरी संहारिणी शक्ति के रूप में धरती पर अवतार लोगी। मैं वचन देता हूँ की कलयुग में कल्कि रूप में तुम्हे सम्पूर्ण रूप से ग्रहण करूँगा। इसलिए तुम अभी से त्रिकूट पर्वत के शिखर पर वैष्णवी नाम से तपस्या करो और अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करो।

भगवान विष्णु का आदेश पाते ही देवी रत्नाकर नंदिनी ने अपने केश से चूड़ामणि निकालकर विष्णु जी को दे दिया और त्रिकूट पर्वत की ओर चल पड़ी। उस समय देवराज इंद्र भी वहां उपस्थित थे। चूड़ामणि को देखते ही इंद्र के मन में उसे पाने का लोभ आ गया। जब यह बात विष्णु जी को पता चली तो उन्होंने चूड़ामणि इंद्र देव को दे दी। और देवराज इंद्र ने ले जाकर चूड़ामणि को इन्द्राणी के केशों में लगा दी। कुछ समय बाद शम्बासुर नाम के एक असुर ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देवताओं और असुर में घोर युद्ध हुआ जिसमे देवताओं को हर का सामना करना पड़ा। पराजय के पश्चात सारे देवता शम्बासुर के डर से छिप गए। कुछ दिन बाद इंद्रदेव अयोध्या आये और राजा दशरथ से सहायता मांगी। इंद्र देव के अनुरोध पर राजा दशरथ अपनी पत्नी कैकयी के साथ शम्बरासुर से युद्ध करने के लिए स्वर्ग लोक चल पड़े। स्वर्ग पहुँच कर राजा दशरथ ने शम्बरासुर का वध कर दिया।

शम्बरासुर का वध करने की खुशी में इन्द्र देव तथा इन्द्राणी ने राजा दशरथ तथा कैकयी का जमकर स्वागत किया और ढेर सारे उपहार दिए। जहाँ इन्द्र देव ने दशरथ जी को स्वर्ग की गंगा मन्दाकिनी के दिव्य हंसों के चार पंख भेंट किये। वहीँ इन्द्राणी ने कैकेई को वही दिव्य चूडामणि भेंट की। साथ ही ये   वरदान भी दिया की जिस नारी के केशपास में ये चूडामणि रहेगी उसका सौभाग्य अखन्ड रहेगा। और जिस किसी भी राज्य में यह चूड़ामणि रहेगी उस राज्य को कोई भी पराजित नही कर पायेगा। इसके पश्चात् राजा दशरथ और कैकयी अपने राज्य अयोध्या वापस आ गये ,जहाँ आकर कैकयी ने वह चूड़ामणि रानी सुमित्रा को दे दी। और जब माता सीता प्रभु श्री राम से विवाह कर अयोध्या आई तो रानी सुमित्रा ने मुंह दिखाई के रूप में वही चूड़ामणि माता सीता को दे दी। यही कारण है की हरण के पश्चात माता सीता का पता लगाने के लिए जब हनुमान जी लंका पहुँचे और उनकी भेंट अशोक वाटिका में सीता जी से हुई तो हनुमान जी ने प्रभु राम की दी हुई मुद्रिका सीतामाता को  और कहा

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा

जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा

तब माता सीता ने वही चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को देदी। और हनुमान जी से कहा की  ये चूड़ामणि मेरे स्वामी प्रभु श्री राम को दे देना क्यूंकि लंका में इसके रहते रावण का विनाश होना संभव नहीं है।

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