हमारा देश सनातन काल से ही ऋषि मुनियों का देश रहा है। हिन्दू धर्मग्रन्थों मे कई महान और तेजश्वी ऋषियों का उल्लेख मिलता है। उन्ही ऋषियों में एक ऋषि दुर्वाशा की कथा मैं आपको बताने जा रहा हूँ। ऋषि दुर्वाशा को उनके क्रोध के कारण जान जाता है। क्रोधित होने पर ऋषि दुर्वाशा सभी को श्राप दे देते थे। लेकिन एक बार उनका दिया हुआ श्राप उन्ही पर भारी पर गया और जब सुदर्शन चक्र के भय से भागे दुर्वासा

राजा अम्बरीष की कथा

एक समय में अम्बरीष नाम के बड़े धर्मात्मा राजा हुआ करते थे। उनके राज्य की सारी प्रजा बड़ी सुख शांति से रहा कराती थी । वह सभी मोह-माया से  दूर निश्चिन्त होकर अपना अधिकतर समय ईश्वर की आराधना में लगाते थे। राजा अम्बरीष भगवान विष्णु को ही अपना सबकुछ मानते थे। उन्हीं का नाम लेकर वो अपनी प्रजा का देखभाल करते और स्वयं भगवान के भक्त रूप में सरल जीवन बिताते। उनको दान-पुण्य, परोपकार करते देख ऐसा लगता जैसे स्वयं भगवान ही सब कार्य अपने हाथों से सम्पन्न करा रहे हों। उनका मानना था की ये सांसारिक सुख सब एक दिन नष्ट हो जाएगी, पर भगवान की भक्ति ही उन्हें लोक, परलोक तथा सर्वत्र उनके साथ रहेगी।राजा अम्बरीष की ऐसी निःस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न हो भगवान ने अपना सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया था।

अम्बरीष का महाभिषेक

एक समय की बात है अम्बरीष ने एक वर्ष तक द्वादशी प्रधान व्रत रखने का निश्चय किया। इस दौरान वो  ब्राह्मणों को भोजन कराते तथा दान करते। उसके पश्चात ही अन्न, जल ग्रहण कर व्रत का पारण करते। एक बार उन्होंने वर्ष की अंतिम द्वादशी को व्रत की समाप्ति पर भगवान विष्णु की पूजा की। महाभिषेक की विधि से सब प्रकार की सामग्री तथा सम्पत्ति से भगवान का अभिषेक किया तथा ब्राह्मणों, पुरोहितों को भोजन कराया, खूब दान दिया। उसके पश्चात् ब्राह्मण-देवों की आज्ञा से जब राजा अम्बरीष व्रत की समाप्ति पर पारण करने बैठे ही थे की अचानक वहां महर्षि दुर्वासा आ पधारे। अम्बरीष ने खड़े होकर ऋषि को प्रणाम किया और आदर से उन्हें बैठाया तथा भोजन करने के लिए प्रार्थना करने लगे।

अम्बरीष और दुर्वासा ऋषि

दुर्वासा ऋषि ने उनके आग्रह को स्वीकार करते हुए कहा हे राजन थोड़ा रुको, मैं नदी में स्नान करके आ रहा हूँ, तब भोजन करूँगा। ऐसा कहकर दुर्वासा वहां से स्नान करने चले गए। पर नदी पहुंचकर वह स्नान-ध्यान में इतना डूब गए कि उन्हें याद ही न रहा कि राजा अम्बरीष बिना उनको भोजन कराएं अपना व्रत का पारण नहीं करेंगे। दुर्वाशा ऋषि को गए हुए बहुत देर हो चूका था। द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। द्वादशी के रहते पारण न करने से व्रत खण्डित होता और उधर दुर्वासा को खिलाएं बिना पारण किया नहीं जा सकता था। अम्बरीष दोनों स्थितियों से परेशान थे। अंत में ब्राह्मणों ने परामर्श दिया कि द्वादशी समाप्त होने में थोड़ा ही समय शेष है। पारण द्वादशी तिथि के अंदर ही होना चाहिए। दुर्वासा अभी नहीं आए। इसीलिए राजन ! आप केवल जल पीकर पारण कर लीजिये। जल पीने से भोजन कर लेने का कोई दोष नहीं लगेगा और द्वादशी समाप्त न होने से व्रत खण्डित भी नहीं होगा।

दुर्वासा ऋषि का क्रोध

शास्त्रो के विधान के अनुसार ब्राह्मणों की आज्ञा से उन्होंने व्रत का पारण कर लिया। अभी वह जल पी ही रहे थे कि दुर्वासा आ पहुंचे। दुर्वासा ने देखा कि मुझ ब्राह्मण को भोजन कराएं बिना अम्बरीष ने जल पीकर व्रत का पारण कर लिया। बस फिर क्या था, क्रोध में भरकर शाप देने के लिए हाथ उठाया ही था कि अम्बरीष ने विनयपूर्वक कहा-“ऋषिवर ! द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। आप तब तक आए नहीं। वर्ष भर का व्रत खण्डित न हो जाए, इसीलिए ब्राह्मणों ने केवल जल ग्रहण कर पारण की आज्ञा दी थी। जल के सिवा मैने कुछ भी ग्रहण नहीं किया है।”पर दुर्वासा क्रोधित हो जाने पर तो किसी की सुनते नहीं थे। अपनी जटा से एक बाल उखाड़कर जमीन पर पटक कर कहा-“लो, मुझे भोजन कराए बिना पारण कर लेने का फल भुगतो। इस बाल से पैदा होने वाली कृत्या ! अम्बरीष को खा जा।”

सुदर्शन चक्र और दुर्वासा ऋषि

बाल के जमीन पर पड़ते ही एक भयंकर आवाज के साथ कृत्या राक्षसी प्रकट होकर अम्बरीष को खाने के लिए दौड़ी। भक्त पर निरपराध कष्ट आया देख उनकी रक्षा के लिए नियुक्त सुदर्शन चक्र प्रकट हो गया और फिर चक्र ने उस राक्षसी का वध कर दिया।भगवान के सुदर्शन चक्र को अपनी ओर आते देख दुर्वासा घबराकर भागे, पर चक्र उनके पीछे लग गया। कहां शाप देकर अम्बरीष को मारने चले थे, कहां उनकी अपनी जान पर आ पड़ी। चक्र से बचने के लिए वे भागने लगे। जहां कही भी छिपने का प्रयास करते, वहीं चक्र उनका पीछा करता। भागते-भागते ब्रह्मलोक  में ब्रह्मा के पास पहुंचे और चक्र से रक्षा करने के लिए गुहार लगाई।

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ब्रह्मा बोले-“दुर्वासा ! मैं तो सृष्टि को बनाने वाला हूं। किसी की मृत्यु से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। आप शिव के पास जाए, वे महाकाल है। वह शायद आपकी रक्षा करे।”दुर्वासा शिव के पास आए और अपनी विपदा सुनाई। दुर्वासा की दशा देखकर  शिव को हंसी आ गई। बोले-“दुर्वासा ! तुम सबको शाप ही देते फिरते हो। ऋषि होकर क्रोध करते हो। मैं इस चक्र से तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि यह विष्णु का चक्र है, इसलिए अच्छा हो कि तुम विष्णु के पास जाओ। वही चाहे तो अपने चक्र को वापस कर सकते है।”

दुर्वासा की जान पर आ पड़ी थी। भागे-भागे भगवान विष्णु के पास पहुंचे। चक्र भी वहां चक्कर लगाता पहुंचा। दुर्वासा ने विष्णु से अपनी प्राण-रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु बोले-“दुर्वासा ! तुमने तप से अब तक जितनी भी शक्ति प्राप्त की, वह सब क्रोध तथा शाप देने में नष्ट करते रहे। तनिक सी बात पर नाराज होकर झट से शाप दे देते हो। तुम तपस्वी हो। तपस्वी का गुण-धर्म क्षमा करना होता है। तुम्हीं विचार करो, अम्बरीष का क्या अपराध था ? मैं तो अपने भक्तो के ह्रदय में रहता हूं। अम्बरीष के प्राण पर संकट आया तो मेरे चक्र ने उसकी  रक्षा की। अब यह चक्र तो मेरे हाथ से निकल चुका है इसलिए जिसकी रक्षा के लिए यह तुम्हारे पीछे घूम रहा है, अब उसी की शरण में जाओ। केवल अम्बरीष ही इसे रोक सकता  है।”

अम्बरीष  ने बचाई जान

दुर्वासा उल्टे पाँव भागे और अम्बरीष के पास आए । अम्बरीष अभी भी बिना अन्न ग्रहण किए, उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। दुर्वासा को देखते ही उनको प्रणाम कर बोले-“मुनिदेव ! मैं तब से आपकी प्रतीक्षा में बिना अन्न ग्रहण किए केवल वही जल पिया है, आप कहां चले गए थे ?दुर्वासा ने चक्र की ओर इशारा करके कहा-“अम्बरीष ! पहले इससे मेरी जान बचाओ। यह मेरे पीछे पड़ा है। तीनो लोको में मैं भागता फिरा, पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश किसी ने मेरी रक्षा नहीं की। अब तुम ही इस चक्र से मेरे प्राण बचाओ।”अम्बरीष हाथ जोड़कर बोले-“मुनिवर ! आप अपना क्रोध शांत करे और मुझे क्षमा करे। भगवान विष्णु का यह चक्र भी आपको क्षमा करेगा।” अम्बरीष के इस कहते ही चक्र अन्तर्धान हो गया। इसके बाद ऋषि दुर्वाशा ने राजा को आशीर्वाद दिया और वो  अपने आश्रम के लिए निकल पड़े।

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