कर्ण महाभारत का एक ऐसा पात्र है जो सबको प्रिय है। आज के आलेख में हम कुछ ऐसा बताएँगे जिसे करने का साहस कर्ण के अतिरिक्त और किसी में भी नहीं था। 

कर्ण वध

महाभारत में जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में फंस गया। तब अर्जुन के पास अच्छा अवसर था कर्ण का वध करने का परन्तु कर्ण ने अर्जुन को रोक दिया।  क्यूंकि वो उस समय निहत्था था। वो अपने रथ का पहिया धरती से निकालने में व्यस्त था। अर्जुन कर्ण की बात सुनकर रुक गया। तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से पूछा “हे पार्थ तुम रुक क्यों गए? बाण चलाओ”. अर्जुन ने कहा निहत्थे योद्धा पर आक्रमण करना युद्ध के नियम के विरुद्ध है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को स्मरण कराया।  जब अभिमन्यु बिना किसी अस्त्र शस्त्र के अकेला ही युद्ध कर रहा था। तब क्या उसके मस्तिष्क में एक बार भी युद्ध नियम का विचार आया? साथ ही भगवान ने कौरवों द्वारा द्रौपदी का अपमान भी स्मरण कराया। अर्जुन को यह सब याद करके बहुत क्रोध आया और उसने कर्ण पर बाण चला दिया।

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कर्ण की परीक्षा

उसके बाद कृष्ण एक ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास गए। और कहा हे कर्ण मैंने सुना है कि आप महादानी हैं और दान देने से कभी पीछे नहीं हटते। मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ और आपसे दान मांगने आया हूँ। उसने ब्राह्मण से कहा कि मेरे पास अभी आपको देने के लिए कुछ नहीं है। मैं अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा हूँ ऐसे समय में मैं आपको क्या दे सकता हूँ। तब ब्राह्मण ने कहा कि मैंने सुना है आप किसी को खाली हाथ नहीं जाने देते।

 तब अचानक कर्ण को अपने स्वर्ण दांत का याद आया। तब उसने एक पत्थर से अपने दांत को तोड़कर ब्राह्मण को दान में दे दिया। ब्राह्मण ने कहा कि यह दांत आपके मुख से निकला है। अतः ये जूठा है और अपना जूठन एक ब्राह्मण को देना धर्म के विरुद्ध है। तब जीवन और मृत्यु के मध्य जूझते हुए उसने एक तीर धरती की ओर छोड़ा और वहां से गंगा बहने लगी। उसने गंगाजल से उस दांत की शुद्धि की और ब्राह्मण को दान में दिया।

कर्ण को मिला वरदान 

तब भगवान कृष्ण ने अपना स्वरुप कर्ण को दिखाया और प्रसन्न होकर कहा कि तुम मृत्यु के समय भी अपना धर्म नहीं भूले। तुमसे बड़ा दानी न कोई हुआ है और न ही कभी होगा। भगवान ने कर्ण से वरदान मांगने के लिए कहा। ब्राह्मण रूप में स्वयं परमात्मा थे और मृत्यु के समय उसकी परीक्षा ले रहे थे। यह देख कर्ण चौंक गए। तब कर्ण ने भगवान कृष्ण से अपनी मृत्यु के समय तीन वरदान मांगे। 

पहला वरदान

अगले जन्म में उसके वर्ग के लोगों के साथ न्याय हो।  क्यूंकि सूत दंपत्ति ने उसका पालन पोषण किया था इसलिए उसे शूद्र श्रेणी का मानकर उसके साथ बहुत बार छल हुआ और उसका अपमान किया गया था .अगले जन्म में उसके वर्ग के लोगों के साथ न्याय हो।  क्यूंकि सूत दंपत्ति ने उसका पालन पोषण किया था । इसलिए उसे शूद्र श्रेणी का मानकर उसके साथ बहुत बार छल हुआ और उसका अपमान किया गया।

दूसरा वरदान था कि भगवान अपने अगले जन्म में कर्ण के राज्य में जन्म लें।

तीसरा वरदान था कि उसका अंतिम संस्कार किसी पापमुक्त स्थान पर हो। यह सुनकर भगवान् दुविधा में थे कि धरती पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ पाप न हुआ हो। इसलिए भगवान् ने कर्ण का अंतिम संस्कार अपने हाथों पर किया और इस कारन मृत्यु के पश्चात कर्ण को वैकुण्ठ धाम प्राप्त हुआ।

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