खजुराहो भारत देश के एक राज्य मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बहुत ही प्रसिद्ध शहर है जो अपने प्राचीन और अद्भुत कला शैली के मंदिरों के लिए विश्व में प्रसिद्ध है | जिसे आज हम खजुराहो के नाम से जानते है उसे प्राचीन काल में इसे खाजुर्पुरा और खजूर वाहिका के नाम से भी जाना जाता था | मंदिरों के लिए फेमस यह शहर पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से बने मंदिर, सम्भोग की विभिन्न कलाओ के आक्रतियों के लिए भी फेमस है | यहाँ बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन दोनों धर्म के मंदिर भी मिलते है | भारत देश के अलावा पर्यटन प्रेमी यहाँ देश विदेश से भी यहाँ की सुन्दरता और अद्भुत कला शैली से प्रभाबित होकर यहाँ साल भर आते रहते है |

खजुराहो के मंदिरों का इतिहास

इतिहासकरो के अनुसार खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल से भी पुराना मन जाता है | कहा जाता है की यह शहर चंदेल वंश के संस्थापक राजा चंद्र्वर्मन द्वारा बसाया गया था और उनकी प्रथम राजधानी भी था | राजा चंद्र्वर्मन बुन्देलखंड में शासन करने बाले गुर्जर राजा थे वे अपने आप को चंदवंशी मानते थे | खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवी से लेकर 1050 ईसवी के बीच माना जाता है |

मध्यकाल के दरबारी कवि चंदबरदाई ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक पृथ्वीराजरासो में महोबा खंड के भाग में चंदेल वंश के जन्म का वर्णन किया है | उन्होंने अपनी पुस्तक में कहा है की काशी के राजपंडित सूर्यनाथ की पुत्री हेमवती बहुत ही सुन्दर और अपूर्व सौन्दर्य की स्वामिनी थी | एक बार जब वे अपनी सखियों के साथ गर्मियों की रात में कमल पुष्पों से भरे हुए तलब में स्नान कर रही थी | तब इंद्रदेव इन पर मोहित हो गए और मानव का रूप धारण करके धरती पर आगये और हेमवती को हरण कर लिया |

ख़राब भाग्य के चलते हेमवती गर्भवती हो गयी और उन्होंने चंद्रदेव पर जिन्दगी ख़राब करने का आरोप लगा दिया | अपनी गलती का ज्ञान होने पर इन्द्रदेव ने हेमवती को वरदान दिया की उसकी गर्भ से एक बहादुर पुत्र का जन्म होगा जो राजा बनकर एक यज्ञ का आयोजन करेगा जिससे उसके सारे पाप ख़त्म हो जायेगे और हेमवती को खाजुर्पुरा जाने का आदेश दिया |

हेमवती ने खाजुर्पुरा में चंद्र्वर्मन नाम के बहादुर पुत्र को जन्म दिया जिसने चंदेल वंश की स्थापना की और अपनी माता के आदेश पर तालाबो बागो और ८५ अद्भुत मंदिरों का निर्माण करबाया और आगे चलके उनके उत्तराधिकारियों ने खाजुर्पुरा यानी की खजुराहो में अनेको भव्य मंदिरों का निर्माण करबाया |

कहा जाता है की चंद्र्वर्मन अपने पिता के सामान ही तेजस्वी और बहादुर थे वे सोलह साल की उम्र में ही बिना हथियार के शेर और बाघ जैसे जंगली जानवरों को अपने हाथो से ही मार देते थे | हेमवती ने पुत्र की वीरता को देखकर चंद्रदेव की आराधना की जिस से प्रसन्न हो कर चंद्रदेव ने चंद्र्वर्मन को एक पारस पत्थर दिया जिससे लोहे को भी सोने में बदला जा सकता था | इसके बाद चन्द्रवर्मन ने कई युदधो में शानदार विजय प्राप्त की और खजुराहो के मंदिरों के साथ कालिंजर का विशाल किले का निर्माण भी करवाया |

खजुराहो के मंदिरों के इतिहास से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य

खजुराहो में मिलने बाले मंदिरों को देखने से पता चलता है की यहाँ मुख्यता दो धर्मो हिन्दू और जैन धर्मो के लोगो के लिए ही वंहा मन्दिरो का निर्माण करवाया गया था जो in धर्मो की परम्परा और इनके इतिहास को दर्शाता है | खजुराहो के स्मारकों का समूह चंदेल वंश में राजा चंद्र्वर्मन के शासन काल में बनबाया गया था | इतिहासकारों के कहे अनुसार 12 शाताव्दी के आसपास खजुराहो में 85 मंदिरों का निर्माण करबाया गया था जो की लगभग 20 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हुए थे |

इन 85 मंदिरों में से अब यहाँ केवल 20 मंदिर ही बचे है जो की लगभग 6 किलोमीटर के दायरे में फैले हुए है | बचे हुए मंदिरों में यहाँ अब एक कंदरिया महादेव का मंदिर बना हुआ है जो 1017 ईसवी से 1029 ईसवी के बीच में गंडा राजा के शासन काल में बनबाया गया था | कंदरिया महादेव का मंदिर में बहुत सी ऐतिहासिक मूर्तियों के समूह से बना है | in मूर्तियों पर उस समय के इतिहास में घटने बाली बहुत से घटनाओं की जानकारी का वर्णन किया गया है और यह मूर्तिया प्राचीन भारतीय कला का उत्कृष्ट उदहारण है |

राजा चंद्र्वर्मन के बाद खजुराहो के बहुत से मंदिर राजा यशोवर्मन और डगा शासन काल में बनबाये गए थे | यशोवर्मन की कला शैली और महानता को हम लक्ष्मण मंदिर में देख सकते है | इतिहासकारों के अनुसार खजुराहो के मंदिरों में बहुत से मंदिरों को 970 ईसवी से 1030 ईसवी के बीच में बनबये गए थे |

खजुराहो के मंदिरों के इतिहास के कुछ रोचक तथ्य

पार्शियन इतिहासकार रिहन अल बिरूनी ने भी अपनी पुस्तक में वर्णन किया है की 1022 ईसवी से महमूद गजनी ने कालिंजर के किले पर कई आक्रमण किये और खजुराहो को अपने राज्य जजहुती की राजधानी बनाया | मगर महमूद गजनी का आक्रमण असफल रहा क्योंकि हिन्दू राजा ने खजुराहो को छोड़ने के लिए फिरोती के तौर पर बहुत अधिक धन प्रदान किया | 

12 वी शताब्दी तक खजुराहो के मंदिरों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ मगर 13वीं शताव्दी के बाद दिल्ली सल्तनत के आक्रमण के बाद जब कुतबुद्दीन ऐबक ने आक्रमण कर चंदेल साम्रज्य को छीन लिया और खजुराहो के मंदिरों में कई परिवर्तन हुए | इसके ठीक एक शताव्दी बाद मोरक्कन यात्री इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक में भी खजुराहो का कजर्रा नाम से वर्णन किया है |

मध्यभारतीय काल में लगभग 13वीं शतब्दी से 18वीं शताव्दी के बीच में खजुराहो के मंदिर मुस्लिम शासको के नियंत्रण में थे | वैसे तो इस काल में बहुत से मंदिरों को तोड़कर उन मंदिरों का अपमान किया गया जैसे की 1495 ईसवी में अपनी सेना की ताकत पर खजुराहो के मंदिरों की तोड़फोड़ कर उनका अपमान किया | लेकिन कुछ समय बाद हिन्दुओं और जैन धर्म के लोगों ने एकत्रित होकर खजुराहों के मंदिरों को सुरक्षित किया | जैसे जैसे समय बदलता गया पेड़ पोधो और जंगलो के साथ साथ खजुराहो के मंदिरों का विकाश और मंदिर सुरक्षित होते गए |

1830 में स्थानीय लोगो ने ब्रिटिश सर्वेक्षक टी.एस.बार्ट को खजुराहो के मंदिरों के बारे में बताया लेकिन उनके अनुसार in मंदिरों का सबसे ज्यादा उपयोग हिन्दू योगी ( संत ) ही करते थे | हजारो हिन्दू और जैन धर्म के लोग शिवरात्रि मनाने फरवरी और मार्च के महीने में हर साल यहाँ आते थे | बाद में 1852 ईसवी में मैसी ने खजुराहो के मंदिरों में अनेको कलाक्र्तियों का निर्माण भी करबाया |

खजुराहो के मंदिरों में बनी कामसूत्र की मूर्तियों का रहस्य

खजुराहो के मंदिरों में अद्भुत कला शैली और सौन्दर्य के साथ साथ कलात्मक कार्य भी किया गया है | इनमे से कुछ मंदिरों पर आंतरिक और बाहरी दोनों ही तरफ 10% से 15% हिस्से पर कामसूत्र की कलाकृतियों को बनाया गया है | इनमे से कुछ मंदिरों में बहार की तरफ लम्बी लम्बी दीवारे बनायीं गयी है जिन पर भी छोटी छोटी कामसूत्र की कलाकृतियों को बनाया गया हुआ है | कुछ इतिहासकारों का कहना है की पुराने समय में यहाँ पर कामुकता की सभी कलाओं का अध्यन और अभ्यास किया जाता था | वंही कुछ इतिहासकारों का यह भी मनना है की कामसूत्र की कलाक्र्तियाँ भी हिन्दू परम्परा का ही एक भाग है और यह मानव शरीर के लिए बहुत ही जरूरी है | जेम्स मैक्कोन्नाची ने अपनी पुस्तक कामसूत्र के इतिहास ( द हिस्ट्री ऑफ़ कामसूत्र ) में भी खजुराहो का वर्णन किया है |

खजुराहो मंदिर से जुडी कुछ रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी

  • खाजुराहो का नाम हिंदी के एक शब्द खजूर से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है खजूर का फल |
  • प्राचीन खजुराहो मंदिरों का निर्माण उत्कृष्ट कलाशैली में कुंडलीदार रूप में जटिल रचना के आकार में किया गया था |
  • अद्भुत खजुराहो के सभी मंदिर उत्तर भारतीय शिखर मंदिर के आकर में एक साथ जुड़े हुए है |
  • खजुराहो में बने मंदिरों के अन्दर के कमरे आपस में एक दुसरे से जुड़े हुए है और उन सभी कमरों में सभी कमरों में एक ही तरह की कलाकृतियों को बनाया गया है |
  • इतिहासकारों के आनुसार माना जाता है की खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवी से लेकर 1050 ईसवी के बीच में चंदेल वंश के साम्राज्य के काल में हुआ है |
  • हजारो पर्यटन प्रेमी, श्रदालु और यात्री पूरी दुनिया से यहाँ की खूबसूरती और मंदिरों को देखने पुरे साल आते ही रहते है |
  • प्राचीन काल में बने खजुराहो के मंदिरों में मंदिरों की संख्या 85 थी लेकिन बाहरी आक्रमण और प्राक्रतिक आपदाओ के कारण सब नष्ट हो गए और अब केवल 20 मंदिर ही बचे हुए है |
  • खजुराहो के मंदिर कामसूत्र की कलाकृतियों के साथ साथ आकर्षित कलाकृति और ऐतिहासिक मूर्तियों के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है |
  • खजुराहो के मंदिरों को केवल कामसूत्र की कलाकृतियों के लिए ही प्रसिद्ध मानना गलत होगा क्युकी ये कलाक्र्तिया हिन्दू परम्परा और कलाओं का ही प्रतिनिधत्व करती है |
  • यहाँ के मंदिरों में मध्यकालीन महिलाओं के जीवन से जुडी परम्पराओ और रीती रिवाजो को भी मूर्तियों के रूप में वर्णित किया गया है |

खजुराहो के मंदिर तक कैसे पहुंचे ?

खजुराहो के मंदिर तक जाने के लिए आप अपनी इच्छा अनुसार वायु मार्ग, रेल मार्ग और सड़क मार्ग किसी भी मार्ग का प्रयोग कर सकते है

वायु मार्ग – खजुराहो का एअरपोर्ट शहर से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्तिथ है और यहाँ दिल्ली, वाराणसी, आगरा और काठमांडू से पंहुचा जा सकता है |

रेल मार्ग – खजुराहो के रेलवे स्टेशन तक पहुँचने के लीये दिल्ली और वाराणसी से रेल सेवा मिलती है | दिल्ली और मुंबई की और से आने बाले यात्रियों के लिए झाँसी स्टेशन से भी सुविधाजनक रेलवे मार्ग है | चेन्नई और वाराणसी से आने बाले यात्रियों के लिए सतना स्टेशन से भी सुविधाजनक मार्ग है | खजुराहो रेलवे स्टेशन से टैक्सी और बस के माध्यम से खजुराहो के मंदिरों तक आसानी से पहुंचा जा सकता है |

सड़क मार्ग – खजुराहो के मंदिरों तक सड़क मार्ग से महोबा, छतरपुर, सतना, झाँसी, पन्ना, हरपालपुर, इलाहबाद, वाराणसी, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, सागर और आगरा के सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है | दिल्ली से सफ़र करने पर राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से पल्बल, कौसी कला से मथुरा के रस्ते आगरा पहुचकर वहा राष्ट्रीय राजमार्ग ३ से धोलपुर और मुरैना के रास्ते से ग्वालियर पहुँच कर वहा से राष्ट्रीय राज्मढ़ 75 से झाँसी से मौरानीपुर और छतरपुर से होते हुए बमीठा फिर वंहा से राज्य राजमार्ग के रस्ते आसानी से खजुराहो तक पहुंचा जा सकता है |

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