यूँ तो स्नान करना या न करना इंसान की अपनी मर्जी है परन्तु हिन्दू धर्मशास्त्रों में स्नान से जुडी कई क्रियाओं का वर्णन किया गया है जैसे मनुष्यों को कब स्नान करना चाहिए या फिर किस समय स्नानं करने से मनुष्य अपना धन,वैभव और ऐश्वर्य सब कुछ गवां देता है।

साथ ही हिन्दू पुराणों में स्नान के कई प्रकार भी बताये गए हैं। और तो और  हिन्दू शास्त्रों में वर्णित स्नान से जुडी इन बातों को विज्ञान भी प्रमाणित कर चूका है।  तो मित्रों आइये जानते है की किस समय स्नान करने से कोई भी मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर सकता है और स्नान ना करनेवाले मनुष्यों को जीवनभर कैसे दुखों का सामान करना पड़ता है।

गरुड़ पुराण के अनुसार जो मनुष्य प्रतिदिन शास्त्र में वर्णित क्रियाओं का नियमित रूप से पालन करता है उसे ही दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में बताया गया है की मनुष्यों को ब्रम्ह-मुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करना चाहिए।

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प्रातःकाल स्नान करने से मनुष्यों को लौकिक और पारलौकिक फलों की प्राप्ति होती है। तदनन्तर शौचादि नियमित आवश्यक क्रियाओं से निवृत होकर पवित्र जल स्रोत में स्नान करना उत्तम बताया गया है। प्रातः काल स्नान करने से पापकर्म करने वाले मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिए यत्नपूर्वक प्रातःकाल स्नान करना चाहिए। 

गरुड़ पुराण में परमपिता ब्रह्माजी गरुड़ को स्नान से होनेवाले लाभ के बारे में बताते हुए कहते हैं की रात्रि में जब मनुष्य शांति पूर्वक आराम से सो रहा होता है तब उसके मुख से निरंतर लार आदि अपवित्र मल गिरते रहते हैं। जिससे मनुष्य का शरीर अपवित्र हो जाता है। इसलिए सुबह उठकर धार्मिक कार्य करने से पहले स्नान करके इस अपवित्रता को धो देना अति अनिवार्य है।

इसलिए मनुष्यों को चाहिए की वह प्रातः काल उठकर नियमित आवश्यक क्रियाओं से निवृत होकर सबसे पहले स्नान करे और उसके बाद ही कोई धार्मिक कार्य करे। गरुड़ पुराण में ब्रह्मा जी कहते हैं की बिना स्नान किये धार्मिक कार्य करने से कोई फल नहीं मिलता। इसके विपरीत बिना स्नान किये धार्मिक कार्यों को करने वाला व्यक्ति गरुड़ पुराण में पापी माना गया है।उसके बाद ब्रह्मा जी कहते हैं की वैसे तो स्नान न करना पाप की श्रेणी में नहीं आता लेकिन प्रतिदिन सूर्योदय से पहले स्नान मनुष्य का धर्म माना गया है।

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साथ ही ब्रह्मा जी  कहते हैं की यदि कोई व्यक्ति बिना स्नान किये अपने नए दिन की शुरुआत करता है तो उसका कोई काम नहीं बनता। इसका कारण यह है की बिना स्नान किये व्यक्ति के आस-पास नकारात्मक शक्तियां घेरा बनाये रखती है।और धर्मशास्त्रों के अनुसार  नकारात्मक शक्तियां वहीँ वास करती है जहाँ अपवित्रता का वास हो।

इसलिए गरुड़ पुराण में कहा गया है की जो व्यक्ति प्रतिदिन स्नान नहीं करता वो अनजाने में ही  बुरी ताकतों को अपनी और आकर्षित कर लेता है।

गरुड़ पुराण में अलक्ष्मी,कालकर्णी,क्लेश-द्वेष, त्रुटि जैसी ताकतों को अनिष्ट कार्य शक्तियां बताया गया है।इन शक्तियों में कालकर्णी विघ्न डालने वाली शक्ति है। अर्थात जो व्यक्ति रोज स्नान नहीं करता है उसके कार्यों में विघ्न आने की प्रबलताएँ बढ़ जाती है। वहीँ इस पुराण में अलक्ष्मी का भी जिक्र किया गया है।

हिन्दू धर्म में अलक्ष्मी देवी को माता लक्ष्मी की बहन माना गया है। परन्तु देवी लक्ष्मी से विपरीत अलक्ष्मी को निर्धनता की देवी कहा गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार प्रतिदिन स्नान ना करने वाला व्यक्ति कभी धनवान नहीं होता है क्योंकि उसके घर में अलक्ष्मी का वास होता है। स्नान ना करने वाला व्यक्ति के हाथ अकसर असफलता ही लगती है और वो यश की प्राप्ति नहीं कर पाता।

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इसके आलावा गरुड़ पुराण में ब्रह्मा जी ने कहा है की स्नान ना करनेवाला व्यक्ति अपने निजी जीवन में भी क्लेश से घिरा रहता है।

साथ ही ये भी माना जाता है की स्नान करने से दुर्स्वपन और दुर्विचार से होने वाले पाप भी धुल जाते हैं। और मनुष्य अपने दिन की शुरुआत इन पापों से मुक्ति पाकर करता है। आपको ये भी बता दें की स्नान करने का सही तरीका ये है की सबसे पहले पांव पर पानी डालकर कर कन्धों या फिर सर पर पानी डालना है। यही कारन था की पौराणिक समय में मनुष्य नदी या तालाब में स्नान किया करते थे। क्यूंकि नदी या तालाब में पहले हमारे पांव भींगते हैं फिर बांकी शरीर । स्नान की ये विधि पौराणिक और वैज्ञानिक दोनों लिहाज से ही मान्य है।

गरुड़ पुराण में स्नान करने के छह अलग-अलग तरीकों के बारे में भी बताया गया है।इन तरीकों में सबसे पहला तरीका है कायिक स्नान ये तरीका अमूमन बीमार व्यक्ति प्रयोग करते हैं। कायिक स्नान  वह है जिसमे मनुष्य सर पर पानी डाले बिना स्नान करे या फिर किसी गीले वस्त्र से अपने आप को स्वच्छ कर ले।

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इसे भी गरुड़ पुराण में एक प्रकार का स्नान ही माना गया है। स्नान का दूसरा प्रकार वारुण स्नान।वारुण स्नान जल में डुबकी लगाकर किया जाता है।

गरुड़ पुराण में तीसरा स्नान है दिव्य स्नान। धुप के साथ होनेवाली वृष्टि में किया गया स्नान दिव्य स्नान कहलाता है। स्नान के चौथे प्रकार को इस पुराण में बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इस स्नान का नाम है वायव्य स्नान। गाय की खुर की धुल लगा शरीर को स्वच्छ करना व्यय स्नान कहलाता है। ये स्नान बेहद महत्वपूर्ण होने के साथ साथ बेहद पवित्र भी माना गया है। इसे सबसे उत्तम स्नान कहा गया है और गरुड़ पुराण कहती है की वायव्य स्नान मोक्ष पाने का मार्ग है।

इसके अलावा गरुड़ पुराण में आग्नेय स्नान का जिक्र किया गया है। ये वो स्नान है जो शरीर पर भस्म लगाकर किया जाता है।  स्नान का अगला प्रकार है मन्त्र स्नान। इस स्नान में मन्त्रों को पढ़कर अपने ऊपर जल छिड़का जाता है। बता दें की मन्त्र स्नान और भस्म स्नान ज्यादातर पंडित और अघोरी करते हैं।

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इन सबके आलावा गरुड़ पुराण में ये भी बताया गया है की स्नान से पहले और उसके बाद मनुष्यों को क्या क्या करना चाहिए। स्नान के पूर्व दुग्धधारी वृक्षों से उत्पन्न काष्ठ,मालती,अपामार्ग,बिल्व अथवा कनेर की दातुन लेकर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके एक साफ़ स्थान में बैठकर दांतों को स्वच्छ करना चाहिए!तदनन्तर स्नान करके देवताओं,ऋषियों और पितृगणों का विधिवत तर्पण करना चाहिए।गरुड़ पुराण में लिखा है की स्नान के बाद माता गायत्री का जप यानी गायत्री मन्त्र का जप करके सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए।

इस पुराण के नुसार ऐसा करनेवाला व्यक्ति यशस्वी होता है। यानी अगर आपको अपने जीवन में सफलता के साथ साथ यश भी प्राप्त करना चाहते हैं तो  गरुड़ पुराण के अनुसार आपको प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। वैसे तो मन की स्वच्छता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन मन को स्वच्छ रखने के साथ साथ इंसान को अपने शरीर को भी स्वच्छ रखना जरूरी है। क्यूंकि स्वच्छता ना केवल मनुष्य का धर्म है बल्कि प्रतिदिन स्नान करने से इंसान का शरीर रोगों से भी बचा रहता है।

इसलिए पाठकों मेरी तो सलाह यही  है की सुबह जल्दी उठकर अपने नियमित कार्यों से निवृत होने के बाद सबसे पहले स्नान कर लें क्यों आजकल देखा जाता है की व्यस्त जीवनशैली के कारण अधिकतर मनुष्य सूर्योदय के पश्चात् ही स्नान करते जिसे धर्मशास्त्र में राक्षसत्व स्नान माना गया है। और धर्मशास्त्रों की माने तो  इस कलयुग में मनुष्य के ज्यादा बीमार पड़ने का यह भी एक कारण है।

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