भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही किसी भी जीव का वध अपने स्वार्थ के लिए करना अपराध माना गया है। सनातन धर्म में सदैव ही यह शिक्षा दी गयी है कि मानव से लेकर किसी छोटे से छोटे जीव की हत्या करना पाप है। जबकि इसी देश और इसी धर्म में बलि की प्रथा भी देखी गयी है। ये दोनों ही बातें एक दूसरे के बिलकुल विपरीत हैं। विश्व के अनेक देशों में बलि देने की प्रथा रही है। हमारे देश में माँ काली को बलि दी जाती है। आज भी काली के अनेक मंदिरों में देवी को मांस का भोग लगाया जाता है। बंगाल के काली घाट, आसाम के कामाख्या जैसे मंदिरों में मछली या बकरे का भोग लगाया जाता है।  वास्तव में बलि देने का क्या अर्थ है? और क्यों मंदिरों में चढ़ाई जाती है बलि ?

माँ काली का रूप

माँ काली का रूप भयंकर है।उन्हें क्रोध और संहार की देवी माना जाता है। उन्होंने लोककल्याण हेतु रक्तबीज, चण्ड मुंड, शुम्भ निशुम्भ जैसे राक्षसों का संहार किया। इसलिए उनके हाथ में रक्त का एक कटोरा भी देखा जाता है। तो क्या दुष्टों का वध करने वाली महाकाली अपने भक्तों से भी बलिकी आशा करती हैं?

बलि देने का अर्थ

बलि देने का अर्थ है ऊर्जा को मुक्त करना और उस ऊर्जा को किसी और कार्य में प्रयोग करना।नारियल, नीबू आदि अर्पित करना भी बलि देना है परन्तु उसमे किसी को हानि नहीं पहुँचती। माँ काली किसी की हत्या से प्रसन्न होकर इच्छापूर्ति नहीं करतीं। यह केवल मानसिकता पर निर्भर करता है। जो लोग आज भी बलिदेने में विश्वास रखते हैं उनकी मानसिकता ही यह है कि बलि देने से उनका जीवन समृद्ध और सुखी होगा ।. परन्तु यदि गहनता से देखा जाए तो यह एक मानसिक रोग मात्र है।

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क्या बलि देना सही है ?

ऐसे कृत्य से कोई देवी देवता प्रसन्न नहीं हो सकते । यह क्रूरता का एक निम्न स्तर का उदाहरण है। जो लोग बिना विचार किये केवल अपने उद्देश्य को सिद्ध करना चाहते हैं । वो तो मनुष्य की बलि देने की सीमा तक पहुँच जाते हैं। इसके लिए सदैव ऐसे व्यक्ति या पशु को चुना जाता है जो जीवंत और ऊर्जावान हो। अधिक आयु के प्राणी की कभी बलि नहीं दी जाती । यहाँ तक कि लोग अपने बच्चों की भी बलि देते हैं । यहाँ पर लोगों को विचार करने की आवश्यकता है कि जिसकी भी बलि वो दे रहे हैं ।उससे देवी या देवता का कोई सम्बन्ध नहीं है । उदाहरणतया यदि बकरे की बलि दी जाती है तो उसे अंततः लोग ही ग्रहण करते हैं न कि वो देवता जिसके नाम पर बलि दी गयी है।

देवी नहीं चाहती बलि

यदि बलि को अध्यात्म से जोड़ा जाता है तो यह बिल्कुल आधारहीन विचार है । अध्यात्म का इन सबसे कोई लेना देना नहीं है । वास्तव में अध्यात्म भौतिक जगत से बिल्कुल परे है । मनुष्य को यह जन्म इसलिए मिलता है कि वह अध्यात्म का अभ्यास करके सत्य को खोजे और मनुष्य जन्म को सार्थक बनाये । न कि बलि जैसे कृत्यों से अपने स्वार्थ को सिद्ध करे और स्वयं को पाप के कुएं में धकेले । माँ काली या कोई भी देवी देवता किसी भी प्रकार की मांस की इच्छा नहीं रखते । मनुष्य को इस भ्रम से बाहर निकलकर एक बड़े दृष्टिकोण से जीवन को देखने की आवश्यकता है ।