कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग

श्री कृष्ण ने क्यों नहीं किया राधा से विवाह ? – जानने के लिए यहां क्लिक करें।

आइये सबसे पहले जानते हैं की श्री कृष्ण के अनुसार ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग क्या है ?मित्रों भगवत गीता हिन्दू धर्मका एक ऐसा धार्मिक ग्रन्थ है जिसमे मनुष्यों के जीवन के साथ साथ मृत्यु के बाद होने वाली समस्याओं और उसके समाधान के बारे में बताया गया है। जिसे अगर कोई मनुष्य अपने जीवन में उतार ले तो वह किसी भी समस्या का हल चुटकियों में कर सकता है। साथ ही गीता में बताया गया है की वही ज्ञान सच्चा और सुख देनेवाला ज्ञान होता है जो प्राणी को मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसरित कराता है। इसलिए गीता को मुक्ति प्रदायक धार्मिक ग्रन्थ भी कहा जाता है। परन्तु  आज के इस पोस्ट में हम आपको बताएँगे की मनुष्यों को ऐसा कौन सा कर्म करना चाहिए जिससे उनको परमधाम यानी मोक्ष की प्राप्ति हो?

यह भी पढ़ें – पूतना के अलावा श्री कृष्ण इन असुरों का किया था वध

कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था जिसके बाद ही अर्जुन अपने बंधू बांधवों से युद्ध करने के लिए तैयार हुए थे। और इसी उपदेश के दौरान वासुदेव ने मोक्ष का मार्ग बताते हुए कहा था की मनुष्य के लिए जरूरी है की वह ज्ञानी  हो और इसके लिए जरूरी है ज्ञान योग। तो आइये सबसे पहले जानते हैं की श्री कृष्ण के अनुसार ज्ञानयोग क्या है ?

ज्ञानयोग:

ज्ञानयोग के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण गीता में यह बताते हैं की हम और आप जिस जगत में निवास करते हैं वह परमात्मा से ही उत्पन्न होता  है और अंत में परमात्मा में ही लीन हो जाता है। अर्थात यह  समझना चाहिए कि सम्पूर्ण भूत प्रकृति से उत्पन्न हुआ है और सम्पूर्ण जगत् का उद्भव एवं प्रलय का मूल कारण परमात्मा है। परन्तु मनुष्यों के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि ज्ञानयोग का विषय क्या होना चाहिए?  इसका उत्तर यह है कि वह समग्र ज्ञान जिससे मनुष्य  परमपद् मोक्ष को प्राप्त कर सके अर्थात पारम्पितापरमेश्वर में विलीन हो जाये। इसके लिए मनुष्य को आत्मा, प्रकृति एवं ईश्वर को जानना आवश्यक है जिसे जानकर मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने दो प्रकार के प्रकृति अपरा और परा प्रकृति के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन बुद्धि और अहंकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी जो प्रकृति है वह अपरा यानी की मूल प्रकृति है तथा दूसरी परा प्रकृति, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है, वहीँ आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि आत्मा न तो किसी काल में जन्म लेता है और न ही मरता है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है। क्योंकि यह आत्मा अजन्मा, नित्य, सनातन और पुराना है। यह शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता। साथ ही आत्मा ‘सर्वगत्’ अर्थात् सर्वव्यापक है। योग का आचरण करने वाला शुद्धात्मा जिसने अपने आत्मा और इन्द्रियों पर विजय पा लिया है ऎसा श्रेष्ठ पुरुष कर्म करता हुआ भी कर्म में लिप्त नहीं होता। कर्म का लेप न होने के लिए इसे सर्वात्मभाव की सिद्धि प्राप्त होनी चाहिए। गीता के इसी अध्याय में भगवान कृष्ण ने भी बताया है की ईश्वर सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म है और सबका एकमात्र आधार है। ईश्वर स्वयं अत्यन्त तेजस्वी है, इसलिए उनके  पास अंधकार नहीं रह सकता । इसलिए इन्ही दिव्य परम पुरुष का सबको ध्यान करना चाहिए। और जो मनुष्य निश्चल मन से इस दिव्य स्वरुप का ध्यान करता है, वह उस दिव्य परम श्रेष्ठ पुरुष  अर्थात परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। ऐसे समय ओंकार का जप और परमेश्वर का चिन्तन करता हुआ जो शरीर को त्याग कर जाता है, वह नि:सन्देह परमश्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है। अर्थात निष्काम भाव से कर्म करने पर ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। तभी उस ज्ञान से परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।

भगवान कृष्ण गोपियों के वस्त्र क्यों चुराते थे ? – जानने के लिए यहां क्लिक करें।

कर्मयोग:

कर्मयोग वर्णन गीता के तीसरे अध्याय में किया गया है। कर्मयोग के बारे में श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य में कर्म करने की स्वाभाविक प्रवृति पाई जाती है। क्योंकि मनुष्य बिना कर्म किये एक भी क्षण नहीं रह सकता है भले ही वो उसे इच्छा से करे या फाई अनिच्छा से। जैसे मान लो की कोई मनुष्य सो रहा है तब भी वह सोने का कर्म कर रहा है। क्योंकि मनुष्य जब सो भी रहा होता है तो उसका मस्तिष्क कुछ ना कुछ मनन या चिंतन अवश्य कर रहा  होता है। इतना ही नहीं यदि मनुष्य को निद्रावस्था में स्वप्न भी आता है  तब भी वह स्वप्न रुपी कर्म कर रहा होता है। इतना ही नहीं अगर कोई मनुष्य खाली बैठा हुआ है और वह सोच रहा है की वह कोई भी कर्म नहीं कर रहा है तो वह उसकी भूल है क्योंकि कुछ ना करते हुए भी वह जीवित रहने का कर्म करता है। साँस लेना,ह्रदय का धड़कना जैसे  कर्म शरीर के स्वभाव से ही होते हैं। इतना ही नहीं अगर कोई रोगी हो जाता है तो वह एक प्रकार का कर्म ही करता रहता है। इस लिए किसी भी मनुष्य के लिए कर्म न करना तो एक क्षणमात्र भी संभव नहीं है। परन्तु जो मनुष्य अपने इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त भाव से कर्म करता है , वही श्रेष्ठ कर्म है है। इसलिए मनुष्यों के लिए कर्म न करने की अपे़क्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। धर्मशास्त्र के द्वारा प्रत्येक मनुष्य के लिए कर्म निश्चित किया गया है। जैसे ब्राह्मण के लिए शम-दम-तप कर्म क्षत्रिय  के लिए शौर्य, युद्ध ,दान आदि ,वैश्य के लिए कृषि, गौरक्षा, वाणिज्य और  शूद्र के लिए सेवा करना धर्मशास्त्र द्वारा निश्चित किये हुए कर्म हैं। इसलिए जो कर्म धर्मशास्त्र से नियत हुआ है, वह उस मनुष्य को सदा करना चाहिए। साथ ही मनुष्यों को यह भी समझना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य के साथ उसका कर्म जन्मता है। इसके आलावा श्री कृष्ण यह भी बताते हैं कि यज्ञकर्म से मनुष्य बन्धन से छूटता है और यज्ञरहित अन्य कर्मों से मनुष्य को बन्धन होता है।  इसलिए हे अर्जुन तू कर्म कर।क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। और उसे जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

एक लड़की जिसने कृष्ण की मूर्ति में जान ला दी – जानने के लिए यहां क्लिक करें।

इससे आगे गीता में भगवान् कृष्ण भक्तियोग के बारे में बताते हुए कहते है की ज्ञानयोग एवं कर्मयोग के लिए भक्ति का होना भी आवश्यक है जिसका वर्णन गीता के बारहवें अध्याय में किया गया है। तो आइये जानते हैं की कृष्ण के अनुसार भक्तियोग क्या है

भक्तियोग:

कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कौन्तेय किसी भी प्राणी के लिए भक्ति के बिना निष्काम कर्म नहीं हो सकता।क्योंकि  जब प्राणी भक्तियोग के माध्यम से अपना सबकुछ भगवान् को अर्पित कर देता है और  उसकी सांसारिक पदार्थों में आसक्ति समाप्त हो जाती है  तभी वह वास्तविक रूप से परमात्मा को जान पाता है। इसके बाद श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो प्राणी परमेश्वर का मन लगाकर,श्रद्धापूर्वक  उपासना करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ योगी हैं। किन्तु श्रेष्ठ योगी होने के लिए प्राणियों में ये तीन गुणों का होना आवश्यक हैं.और वे तीन गुण हैं मन आवेश्य अर्थात ईश्वर में मन लगाना,दूसरा गुण है नित्ययुक्त अर्थात  ईश्वर से नित्य योग संबंध करना यानी कुशलता के साथ कर्म करना और तीसरा गुण है परया श्रद्धया उपेत अर्थात श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होना। इन सब के आलावा िप्राणियों के लिए ये भी जनन आवश्यक है की ईश्वर का रूप क्या है ? ईश्वर का रूप वही है जो इस विश्व में दिखाई देता है। विश्व का वही रूप परमात्मा का अखण्ड रूप है अर्थात कहने का तात्पर्य यह है की ईश्वर का रूप और जो प्राणी ईश्वर के किसी एक रूप को मानकर उसकी भक्ति करता है वही भक्ति श्रेष्ठ भक्ति कहलाती है। साथ ही श्री कृष्ण कहते हैं की  जो पुरुष इन्द्रियों को  वश में करके एकाग्र मन से अचल, निराकार, अविनाशी ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में मुझको ही प्राप्त होते हैं।

क्यों हुआ था श्री कृष्ण और भगवान शिव के बीच युद्ध – जानने के लिए यहां क्लिक करें।

इसलिए हरेक प्राणी को चाहिए की अगर वह परमात्मा में लीन होना चाहता है और मोक्ष की जिज्ञासा रखता है तो उसे गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा कहे गए इन दिव्य ज्ञान को अपने जीवन में भी लागु करे और दूसरों को भी इससे अवगत कराएं।