पाठकों इस लेख में हम बात करेंगे आदिशक्ति के छठे रूप कात्यायनी की. देवी कात्यायनी कौन हैं, इनकी कथा और पूजा विधि जानने के लिए इस लेख को अंत तक पढ़िए . तो आइये सबसे पहले माँ कात्यायनी की कथा जानते हैं. 

कत से कात्यायनी

कत नामक एक प्रसिद्ध ऋषि थे जिन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ.जिसका नाम कात्य रखा गया. कात्य के गोत्र में ही विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन ने जन्म लिया. कात्यायन ने वर्षों तक देवी पराम्बा की कठोर तपस्या की. उन्होंने प्रार्थना की कि माँ पराम्बा उनकी पुत्री के रूप में जन्म लें. ऋषि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की .और उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया इसलिए ही उनका नाम कात्यायनी पड़ा.

महिषासुर का वध

ऐसा भी कहा जाता है कि जब पृथ्वी पर दानव महिषासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया. तब महिषासुर का वध करने के लिए त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने अपने अपने तेज को सम्मिलित कर एक देवी को उत्पन्न किया. उस देवी की आराधना सर्वप्रथम ऋषि कात्यायन ने की इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा. देवी ने आश्विन कृष्ण चतुर्दशी के दिन उत्पन्न होकर, सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिनों में ऋषि की आराधना स्वीकार की और दशमी को महिषासुर का वध किया.

कात्यायनी की उपासना

माँ की उपासना परेशानियों को नष्ट करने वाली है. उनकी आराधना से विवाह सम्बन्धी कष्ट और दोष नष्ट हो जाते हैं. माँ की पूजा करने से देवगुरु बृहस्पति प्रसन्न होते हैं और अच्छा वर प्राप्त होने का वरदान देते हैं. वैवाहिक जीवन में यदि कष्ट हों तो भी माँ कात्यायनी की उपासना फल प्रदान करने वाली है. यदि विवाह में बाधा हो तो भी कात्यायनी की पूजा फलदायी है. कहा जाता है कि जब ब्रज की सभी गोपियाँ भगवन कृष्ण को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं तब गोपियों ने माँ कात्यायनी की पूजा की थी. कंठ रोगियों को विशेष रूप से माँ कात्यायनी की पूजा करनी चाहिए.

माँ कात्यायनी का स्वरुप

माँकात्यायनी का स्वरुप अत्यंत आकर्षक, भव्य और आभूषणों से सुसज्जित है. उनकी चार भुजाएं हैं, दायीं ओर ऊपर की भुजा अभयमुद्रा और नीचे वाली वरमुद्रा में है. बायीं ओर ऊपर की भुजा में तलवार और नीचे की भुजा में कमल का पुष्प सुशोभित है. माँ कात्यायनी का वाहन भी सिंह है.

कात्यायनी की पूजा विधि

साधक को आज्ञाचक्र में ध्यान लगाने से कात्यायनी की उपासना करनी चाहिए. नवरात्रि के प्रतिदिन की भांति विधि विधान की पूजा करें. माँ कात्यायनी को शहद अतिप्रिय है अतः पूजा में शहद का भोग अवश्य लगाएं. साथ ही देवी के इस रूप को लाल रंग बहुत प्रिय है तो देवी के विग्रह को लाल रंग की चुनरी पहनाएं, लाल रंग के पुष्प अर्पित करें और लाल रंग के ही वस्त्रों में पूजा करें.

क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम: बीज मन्त्र के उच्चारण साथ देवी का पूजन करें.

अब ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनायै नम: मन्त्र का माला पर जप करें.

इसके पश्चात आरती और क्षमा याचना के साथ पूजा का समापन करें. और यहाँ समाप्त होती है नवरात्रि के छठे दिन की जानकारी.

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