भगवान कृष्ण के प्रमुख युद्ध:

भगवान कृष्ण के प्रमुख युद्ध| भगवान विष्णु के आठवें और पूर्ण अवतार भगवान कृष्ण की हमेशा ही रसिक, प्रेमी, नटखट गोपाल, की छवि रही है परन्तु इस रूप से परे भगवन कृष्ण का एक अत्यंत बलशाली रूप भी था. बहुत ही कम लोग जानते हैं की भगवान कृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे, वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे. साथ ही उन्हें द्वन्द युद्ध में विशिष्टता प्राप्त थी. धर्म की रक्षा के लिए वे सदैव ही तत्पर रहे. इस पोस्ट में हम आपको बताएँगे भगवान कृष्ण द्वारा लड़े गए मुख्य युद्धों, उनकी शक्ति और उनके अस्त्रों एवं शस्त्रों के विषय में.

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भगवान कृष्ण के जन्म लेते ही तीनो लोकों में समस्त देवगणों ने उन्हें नमस्कार किया. वासुदेव जब भगवान कृष्ण को नन्द के यहाँ ले जा रहे थे तो यमुना नदी ने अपना स्तर बढाकर उनके चरण स्पर्श किये और वापस पुनरावस्था में चलीं गयीं. और इसमें अचम्भे की तो कोई बात ही नहीं है. परमवेश्वर का एक स्पर्श मात्र ही उद्धार के द्वार खोल देता है. 

बाल्यावस्था से ही वे समस्त लोक में विख्यात हो गए थे. बचपन में ही उन्होंने युद्ध करके बड़े से बड़े राक्षसों को परास्त किया. आइये जानते हैं भगवान कृष्ण के मुख्य युद्धों के विषय में

कंस के साथ युद्ध:

श्रीमदभागवतम में भगवान कृष्ण के द्वारा की गयी सभी लीलाओं का वर्णन मिलता है. भगवान कृष्ण के जीवन का पहला युद्ध तो उनके जन्म लेते ही आरम्भ हो गया था और इस युद्ध के विषय में हम सभी जानते हैं. उनके मामा को एक आकाशवाणी से ज्ञात हुआ था की देवकी और वासुदेव का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा इसलिए वो जन्म होते ही उनकी सभी संतानों का वध कर देता था. सातवीं संतान के रूप में शेषनाग ने माँ देवकी के गर्भ में प्रवेश किया परन्तु भगवान विष्णु ने शेष की रक्षा के लिए योगमाया की सहायता से देवकी की इस सातवीं संतान को वासुदेव की पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया. इसके पश्चात भगवान विष्णु स्वयं देवकी के गर्भ में आठवें पुत्र के रूप में प्रवेश हुए. भगवान के जन्म लेते ही कारागृह के सभी संतरी सो गए और वसुदेव भगवान कृष्ण को नंदबाबा के महल में पहुंचाने में सफल हो सके.

जब कंस को इस बात का पता चला तब उसने कृष्ण वध के लिए विभिन्न रूपों में दैत्यों को भेजना आरम्भ किया, भगवान कृष्ण ने बचपन में ही इन सभी दैत्यों का वध किया था. इनमे पूतना वध सबसे अधिक प्रसिद्ध है. कंस द्वारा भेजे गए असुर मृत्यु को प्राप्त हुए तब अंततः कंस ने कृष्ण और बलराम को एक समारोह में आमंत्रित किया. इस समारोह में कंस कृष्ण का वध करना चाहता था परन्तु जैसे ही कंस ऐसा करने के लिए आगे बढ़ा, श्री कृष्ण ने उसके बालों को पकड़कर उसकी गद्दी से उसे खींच लिया और उसका वध किया. इसके पश्चात भगवान ने अपने माता पिता को कारागृह से मुक्त किया और उनकी वंदना की.

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जरासंध का वध:

कंस के पश्चात भगवान का युद्ध कंस के ससुर जरासंध के साथ हुआ. जरासंध के साथ पहले भी अनेक बार युद्ध हो चुका था. जरासंध मगध का बहुत ही क्रूर शासक था. हरिवंश पुराण के अनुसार उसने अनेक राज्य जैसे कलिंग, विदेह, चेदि, काशी, गांधार,  मद्र, कश्मीर, पांड्य आदि के राजाओं को परास्त कर इन राज्यों को अपने अधीन कर लिया था. पुराणों में उल्लेखनीय है की जरासंध ने १८ बार मथुरा पर चढ़ाई की. जरासंध का वध करना आसान नहीं था. श्री कृष्ण की योजना के अनुसार भगवान कृष्ण, अर्जुन और भीम ब्राह्मण का भेष धारण करके उसके पास पहुंचे और उसे कुश्ती के लिए ललकारा. जरासंध समझ गया था की वे ब्राह्मण नहीं हैं तब कृष्ण ने वास्तविक परिचय दिया. कुछ विचार करके जरासंध ने भीम को कुश्ती करने के लिए चुना. दोनों की कुश्ती का यह युद्ध १३ दिन तक चला. भीम ने अनेक बार जरासंध के २ टुकड़े किये परन्तु उसका शरीर बार बार जुड़ जाता था तब भगवान कृष्ण ने भीम को इशारा किया की वो दोनों टुकड़ों को विपरीत दिशा में फेंके. भीम ने ऐसा ही किया तब जरासंध की मृत्यु हुई क्यूंकि विपरीत दिशा में फेंके जाने के कारन दोनों टुकड़े जुड़ नहीं पाए..

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कालयवन से युद्ध:

अनेक पौराणिक कथाओं के अनुसार, जरासंध ने १८ बार मथुरा पर चढ़ाई की और इनमे से १७ बार वो असफल रहा. अंतिम चढ़ाई में उसने कालयवन नामक एक विदेशी शासक को साथ में लिया और मथुरा नरेश को युद्ध का सन्देश भेजा. मथुरा नरेश कृष्ण ने उत्तर में सन्देश भेजा की युद्ध केवल उनके और कालयवन के मध्य ही होगा. कालयवन सहमत हो गया. जब कृष्ण और कालयवन का युद्ध हो रहा था तो कृष्ण युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे और एक गुफा में प्रवेश कर गए. कहा जाता है की इसी युद्ध के पश्चात कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा. कालयवन ने भी गुफा में प्रवेश किया और वहां उसने एक व्यक्ति को गुफा में सोते हुए देखा. उसने उस व्यक्ति को कृष्ण समझकर उस पर पाँव मारा. जैसे ही उस व्यक्ति ने आँखें खोलीं तो तत्काल ही कालयवन उसके तेज से जलकर भस्म हो गया. ये पुरुष और कोई नहीं अपितु महान तपस्वी इक्ष्वाकु वंश के महाराज मान्धाता के पुत्र राजा मुकुंदचंद थे. भगवन कृष्ण जानते थे की उनके गुफा में प्रवेश करने मात्र से ही कालयवन मृत्यु को प्राप्त होगा

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कृष्ण और शिव का जीवाणु युद्ध:

इसे विश्व का प्रथम जीवाणु युद्ध माना जाता है. इस युद्ध में भगवान कृष्ण ने बाणासुर और महादेव शिव के साथ युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग किया. बाणासुर शोणितपुर के राजा थे, उनकी कन्या का नाम उषा था. उषा अनिरुद्ध से प्रेम करती थी. अनिरुद्ध श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के पुत्र थे. उषा ने एक बार अपनी मायावी सहेली चित्रलेखा से कहकर अनिरुद्ध का हरण करवा लिया. इसके पश्चात अनिरुद्ध और उषा ने गन्धर्व विवाह कर लिया. जब बाणासुर को यह ज्ञात हुआ तो उसने अनिरुद्ध को कारागृह में डाल दिया. बाणासुर को शिव से वरदान प्राप्त था और शिव जी ने उसकी रक्षा का वचन भी उसे दिया था. जब भगवान कृष्ण को अनिरुद्ध के कारागृह में होने की बात पता चली तो उन्होंने बाणासुर के राज्य में चढ़ाई कर दी. तब बाणासुर ने शिव जी का आवाहन करके उसकी रक्षा का निवेदन किया. और तब शिव की सेना और कृष्ण की सेना में भयंकर युद्ध हुआ. दोनों पक्षों ने विध्वंसक शस्त्रों का प्रयोग किया जैसे शिव जी ने पाशुपतास्त्र और भगवान कृष्ण ने नारायणास्त्र का प्रयोग किया. दोनों ही शस्त्रों से भयंकर अग्नि उत्पन्न हुई परन्तु किसी भी पक्ष को कोई हानि नहीं हुई. तब अंततः शिव जी ने अपना सबसे प्रवभावशाली अस्त्र ‘शिवज्वर अग्नि’ अर्थात  माहेश्वर ज्वर छोड़ा जिसके कारण चारों और अग्नि फ़ैल गयी और भयानक जीवाणुओं के कारण बीमारियां फ़ैलने लगीं. ऐसी स्थिति देख भगवान कृष्ण को न चाहते हुए भी अपना भयंकर विध्वंसक अस्त्र ‘नारायण ज्वर शीत’ अर्थात वैष्णव ज्वर चलाना पड़ा. इससे ज्वर का तो विनाश हुआ परन्तु अग्नि और शीत ने मिलकर प्राकृतिक वातावरण का नाश हो गया. और अंत में दुर्गा देवी ने दोनों पक्षों को शांत किया और अंततः बाणासुर अनिरुद्ध सुर उषा का विधिविधान पूर्वक विवाह करता है. इस युद्ध का उल्लेख बहुत कम मिलता है. इसके विरुद्ध अनेक कथाएं भी मिलती हैं. जीवाणु युद्ध की यह कथा सत्य है या नहीं यह अभी भी शोध का विषय है.

इनके अतिरिक्त बाल्यावस्था में ही उन्होंने अधासुर, बकासुर, त्रिणवर्ता और वत्सासुर जैसे असुरों को मार गिराया था. बचपन में ही यमुना नदी के तल पर जाकर कालिया नामक भयानक नाग से युद्ध करके उसे पराजित किया था. गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने इंद्र के अहम् को चकनाचूर किया था. जामवंत नामक प्रसिद्द राजा को भी उन्होंने युद्ध में पराजित किया था. इनके अतिरिक्त नरकासुर, जम्भासुर आदि शक्तिशाली असुरों का भी वध किया. बाहुबली श्री कृष्ण ने कुवलयापीड़ नामक विशाल हाथी का केवल भुजाओं से ही वध कर डाला था.

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केशी नाम के प्रख्यात दानव का उन्होंने अपनी भुजाओं से वध किया था जिसके बाद वो केशव कहलाये. स्वयं को कृष्ण बताने वाले करूपदेश के राजा पौंड्रक का वध भी भगवान कृष्ण के हाथों हुआ. रणभूमि में कलिंग, मगध, अंग, वंग, काशी, वत्स्य, पौंड्र, गर्ग, करूष जैसे अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी. पाताललोक में निवास करने वाले यम को पराजित कर संदीपनी के पुत्र को मुक्त किया था. 

भगवान कृष्ण ने वरुण देव को युद्ध में पराजित किया था. उन्होंने पांचजन्य नामक दैत्य को परास्त कर उसका वध करके दिव्य पांचजन्य शंख प्राप्त किया था. खांडव वन में अग्निदेव को संतुष्ट करके भगवान कृष्ण ने आग्नेयास्त्र प्राप्त किया था.

अब बात करते हैं भगवान कृष्ण के अस्त्रों-शस्त्रों की:

श्री कृष्ण के पास गदा का नाम कौमोदीकी था, उनके शंख का नाम पांचजन्य जो गुलाबी रंग का था. उनके पास गरुड़ध्वज और जैत्र नाम के दो रथ थे. उनके अश्वों के नाम मेघपुष्प, बलाहक, शैव्य, और सुग्रीव थे. भगवान कृष्ण के पास दिव्य सुदर्शन चक्र था जो उन्हें विष्णु के अंशावतार भगवान परशुराम से प्राप्त हुआ था. शिव जी के पश्चात पाशुपतास्त्र भगवान कृष्ण और अर्जुन के पास था. इनके अतिरिक्त उनके पास शक्तिशाली प्रस्वपास्त्र भी था जो भगवान कृष्ण के अलावा केवल भीष्म, शिव और वसुगण के पास ही था. भगवान कृष्ण द्वापर युग के सबसे महान धनुर्धर थे. उनके धनुष का नाम सारंग था. साथ ही विध्वंसक अस्त्र जैसे वैष्णवास्त्र, आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गरुड़ास्त्र, नारायणास्त्र आदि का पूर्ण ज्ञान था.

चाहे कूटनीति से युद्ध करना हो या अस्त्रों या शस्त्रों का ज्ञान हो, भगवान कृष्ण के समक्ष बड़े से बड़े योद्धाओं ने घुटने टेक दिए थे. श्री कृष्ण परमपिता परमेश्वर हैं उनकी शक्ति हमारी कल्पना से परे है. उनकी लीलाओं, नीतियों और शक्तियों का विश्लेषण करना हमारे लिए संभव ही नहीं.