हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार यमराज को मृत्यु का देवता माना जाता है, इनके पिता का नाम सूर्य और माता का नाम संज्ञा है, बहन का नाम यमुना और बाहन भैंसा है | जब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा को यमराज सीधा यमलोक अपने साथ ही लेकर जाते है | उसके बाद यमलोक में उस आत्मा के पूरे जीवन में किये गए पुन्य और पापो का हिसाब किया किया जाता है उसके बाद ही उस आत्मा का न्यायपूर्वक निर्णय किया जाता है की उसे नरक जाना है या स्वर्ग | आपके मन में भी यमलोक से जुड़े कई सवाल उत्पन्न हो जाते है की यमलोक कंहा है, कैसा दिखता है, आत्मा का यमलोक में पहुंचकर क्या होता है, यमराज कौन है तो आइये यमराज और यमलोक के बारे में विस्तार से जानते है –

यमलोक कहां है और कैसा दिखता है

गरुण पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है, कंहा जाती है, सब बातो का विस्तार से वर्णन किया गया है | यमलोक की पृथ्वी से दूरी लगभग “86000 योजन लगभग 12 लाख किलोमीटर” है इसका उल्लेख पद्म पुराण में भी मिलता है | यमलोक में बने यमराज के महल को “कालित्री” और यमराज जिस सिंहासन पर बैठते है उसे “विचार–भू” कहा जाता है | यमराज के महल के पास ही यमराज के सहायक चित्रगुप्त का महल भी बना हुआ है | यमलोक में बड़े बड़े राजमार्ग बने हुए है यमलोक करीब 48 हजार किलोमीटर की लम्बाई और 24 हजार किलोमीटर की चौड़ाई में फैला हुआ है | यमलोक में एक विशाल नदी भी है जिसका नाम पुष्पोदका है, इस नदी का जल बहुत ही शीतल, स्वादिष्ट और सुगन्धित है, इस नदी में अत्यंत सुंदर अप्सरायें स्नान करती है |

यमलोक में मृत्यु के बाद पहुचने बाली आत्मा सबसे पहले यमराज और वरुण देव को देखता है | ऋग्वेद में बताया गया है की यमराज के दूत के रूप में कबूतर और उल्लू को नियुक्त किया गया है मगर गरुण पुराण में यमराज के दूत के रूप में कबूतर और उल्लू के साथ कौवा को भी नियुक्त किया गया है | हिन्दू धर्म ग्रंथो में बताया गया है की यमलोक में 4 द्वार है जिनमे से प्रत्येक द्वार पर दो विशाल कुत्ते हर समय पहरा देते रहते है, इस बात का उल्लेख हिन्दू धर्म ग्रंथो के साथ साथ पारसी और यूनानी ग्रंथो में भी मिलता है | ग्रंथो में बताया गया है की यमलोक बहुत ही डरावना और भयाभय दिखता है |

यमलोक में कितने दरवाजे है

गरुण पुराण के अनुसार यमराज की नगरी यमलोक में कुल 4 द्वार है जो पूर्वी, पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी दिशाओं में स्थित है | जिसमे में से पूर्वी द्वार से सिर्फ उन जोगो को प्रवेश मिलता है जिन्होंने अपने जीवन में बहुत से पुन्य और धर्म के काम किये हों | यमलोक के दक्षिण द्वार से उन लोगो का प्रवेश करवाया जाता है जिन्होंने अपने जीवन में बहुत से पाप और गलत काम किये होते है जिन्हें यमलोक में आगे जाकर बहुत सी यातनाओं का सामना करना पड़ता है | यमलोक के उत्तरी दरवाजे से उन लोगो को प्रवेश दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन साधु संतो वाला जीवन व्यतीत किया होता है, और आखिरी पश्चिमी द्वार से उन लोगो को प्रवेश दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन में दान पुन्य किया होता है |

यमलोक के सेवक कौन है

गरुण पूरण के अनुसार यमराज के दूत ही यमराज की नगरी यमलोक की सेवा करते है | यमलोक के द्वारपाल को धर्मध्वज कहा जाता है | ऋग्वेद में बताया गया है की यमराज के दूत के रूप में कबूतर और उल्लू को नियुक्त किया गया है मगर गरुण पुराण में यमराज के दूत के रूप में कबूतर और उल्लू के साथ कौवा को भी नियुक्त किया गया है | जिसकी वजह से यमलोक के सेवकों के रूप में भी कबूतर, उल्लू और कौआ को ही नियुक्त किया गया है इनके साथ साथ दो विशाल कुत्ते भी यमलोक के प्रत्येक दरवाजो की पहरेदारी करते है |

किस देवता ने बनाया था यमलोक

यमलोक के भवनों और पूरी नगरी का निर्माण देवशिल्पी भगवान् विश्वकर्मा देव ने किया था | इस नगरी में यम किसी आत्मा का निर्णय करने से पहले अपने कई सलाहकारों से सलाह करते है | यमराज की सभा में जब सलाहकारों से सलाह ली जाती है तो इसमें कई चंद्रवंशी राजा और सूर्यवंशी राजा यमराज के सलाहकारों का काम पूरी कर्तव्यनिष्ठा के साथ निभाते है |

कौन है यमराज का सहायक

गरुण पुराण में बताया गया है की यमराज के सहायक के रूप में चित्रगुप्त को नियुक्त किया गया है | यमलोक में बड़े बड़े राजमार्ग है, जिनपर यम का कालित्री राजमहल और उनके सहायक चित्रगुप्त का राजमहल स्थित है | आत्माओ का न्याय करने के लिए एक अलग महल है जिसमे यमराज अपने राज सिंहहासन विचार भू पर बैठकर न्याय करते है और उनके सहायक चित्रगुप्त आत्माओं के जीवन से जुड़े सारे कर्मो का लेखा जोखा रखते है |

कंहा है यमराज का मंदिर

धरती पर खासतौर पर मृत्यु के देवता यमराज के 4 मंदिर ही स्थित है जिनमे से प्रथम मथुरा नगर में विश्राम घाट पर दूसरा ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला के पास स्थित है तीसरा मन्दिर तमिलनाडू जिले के तंजावुर जिले के ऐमा नामक जगह पर स्थित है और आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण चौथा मंदिर हिमाचल प्रदेश के भरमौर जिले में स्थित है |

कहा जाता है की हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भरमौर नामक स्थान पर यह मंदिर बना हुआ है | यह मंदिर देखने में एक साधारण घर जैसा है जिसमे एक कमरा खाली है जिसे चंद्र्गुत कक्ष कहा जाता है | और इस कक्ष के सामने एक कक्ष है जंहा यम का निवास माना जाता है | ऐसी मान्यता है की आत्मा को यमलोक से पहले धरती पर इसी मंदिर में लाया जाता है |

जंहा उसे सबसे पहले चित्रगुप्त के सामने पेश किया जाता है | चित्रगुप्त उस आत्मा के जीवनकाल के पूरे कर्मो का ब्यौरा तैयार करते है और उसके बाद उस आत्मा को यम के कक्ष में ले जाया जाता है | यहाँ 4 अद्रश्य स्तम्भ सोना, रजत, तांबा और लोहे के बने हुए होते है जहाँ से यमराज के दूत उस आत्मा के कर्मो के हिसाब से और यम के निर्णय के आधार पर उचित जगह स्वर्ग या नरक में ले जाते है |

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