शिवपुराण- देवी सती की तपस्या देखने क्यों आये थे ब्रह्मा और विष्णु

शिवपुराण- देवी सती की तपस्या देखने क्यों आये थे ब्रह्मा और विष्णु?

शिवपुराण- देवी सती की तपस्या देखने क्यों आये थे ब्रह्मा और विष्णु? प्रिये दर्शकों शिवपुराण के पिछले एपिसोड में आप ने देखा था की देवी जगदम्बिका ने कैसे प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में अवतरित हुई थी और किशोरावस्था में आने पर उन्होंने निश्चय किया था की वे भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करेगी। आज के एपिसोड में हम आपको इससे आगे की कथा बताने जा रहे हैं। तो चलिए अब बिना किसी देरी के शिवपुराण की ये दिव्य कथा शुरू करते हैं।

कथा के अनुसार जब सती बड़ी हुई तो एक दिन परमपिता ब्रह्मा और देवर्षि नारद प्रजापति दक्ष से मिलने उनके घर पहुंचे। वहां पहुंचकर उन दोनों ने देखा की सती अपने पिता से बातें कर रही है और मुस्कुरा रही है। फिर जब सती की नजर ब्रह्माजी और देवर्षि नारद पर गई तो उन्होंने उन दोनों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। तत्पश्चात ब्रह्माजी सती से बोले हे पुत्री जो केवल तुम्हे ही चाहते हैं और तुम्हारे मन में भी एकमात्र जिनकी ही कामना है उन्ही सर्वज्ञ जगदीश्वर महादेव जी को तुम पति रूप में प्राप्त करो। भगवान शिव ही तुम्हारे योग्य हैं दूसरा कोई नहीं। फिर कुछ दिन रहने के बाद ब्रह्मा जी और नारद अपने अपने निवास स्थान लौट आये।

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रह्माजी के जाने बाद प्रजापति दक्ष बड़े प्रसन्न हुए उनकी सारी मानसिक चिंता दूर हो गयी और उन्होंने अपनी पुत्री को परमेश्वरी समझकर गोद में उठा लिया। युवावस्था को प्राप्त हुई सती अत्यंत तेज एवं मनोहर दिखायी देने लगी। कुछ दिन पश्चात् दक्ष ने देखा की सती के शरीर में युवावस्था के लक्षण प्रकट होने लगे हैं। तब उनके मन में चिंता हुई कि परमपिता ब्रह्मा जी के कहे अनुसार मैं महादेव जी के साथ अपने पुत्री का विवाह कैसे करूँ ? उधर सती स्वंय भी महादेव जी को पाने की अभिलाषा रखती थी। अतः पिता के मनोभाव को समझकर वे माता के निकट गयी और भगवान शंकर को प्रसन्न करने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए आज्ञा मांगी। माता ने बिना किसी बाधा के उसे तपस्या करने की आज्ञा दे दी। उसके बाद दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन करने वाली सती ने महेश्वर को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये अपने घर पर ही उनकी आराधना आरम्भ की।

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तपस्या के दौरान सती किसी दिन भक्तिपूर्वक गुड़,भात और नमक चढ़ाकर भगवान शिव का पूजन किया करती तो किसी दिन माल पूओं और खीर से परमेश्वर शिव की आराधना करती। इसी तरह किसी दिन तिल,जौ और चावल से भगवान शिव की पूजा किया करती। इतना ही नहीं किसी किसी दिन सती रात भर जागरण करके प्रातः काल खिचड़ी का नैवेद्य चढ़ाकर वे शिव जी की पूजा करती थी। इसी तरह भांति-भांति के फलों,फूलों और उस समय उत्पन्न होनेवाले अन्नों द्वारा वे शिव की पूजा करती और महीने भर अत्यंत नियमित आहार करके केवल जप में लगी रहती थी।

इसी तरह जब सती के तपस्या करते हुए कई वर्ष बीत गए तब एक दिन सभी ऋषि भगवान विष्णु और ब्रह्मा सती की तपस्या देखने लिये गये। वहां आकर देवताओं ने देखा सती मूर्तिपति दूसरी सिद्धि के समान जान पड़ती है। वे भगवान शिव के ध्यान में निमग्न हो उस समय सिद्धावस्था को पहुँच गयी थी। समस्त देवताओं ने बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां दोनों हाथ जोड़कर सती को नमस्कार किया.मुनियों ने भी मस्तक झुकाये फिर सब देवता और मुनि आश्चर्यचकित हो सती देवी की तपस्या की प्रशंसा करने लगे। फिर देवी को प्रणाम करके वे वे सभी तुरंत ही गिरिश्रेष्ठ कैलास को गये। उस समय सभी देवताओं के साथ उनकी पत्निया भी मौजूद थी।कैलास पहुंचकर सभी देवताओं एवं ऋषियों ने भगवान शिव को प्रणाम किया और फिर उनकी स्तुति करने लगे।

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कुछ समय बाद स्तुति समाप्त हुई तो भगवान शिव ने आँखें खोली और जोर-जोर से हंसने लगे। फिर उन्होंने सारे देवताओं और मुनियों से कहा मैं आप सभी के स्तुति से बहुत प्रसन्न हूँ कृपया क्र आप सभी यहाँ आने का कारण बतलाइये। भगवान शिव के इस प्रकार प्रकार पूछने पर भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी बोले हे देवो के देव महादेव हम सभी का यहाँ आगमन आपके लिये ही हुआ है। क्योंकि हम आप और विष्णु जी तीनो सहार्थी हैं अर्थात सृष्टि चक्र के संचालन की सिद्धि के लिए हम एक दूसरे के सहायक हैं। अगर हम तीनो आपस में सहयोग नहीं करेंगे तो यह जगत टिक नहीं सकता। हे देवाधिदेव भविष्य में कुछ ऐसे असुर उत्पन्न होंगे जो मेरे हाथ से मारे जायेंगे,कुछ भगवान विष्णु के और कुछ आपके हाथों नष्ट होंगे। जबकि कुछ असुर ऐसे होंगे जो आपके वीर्य से उत्पन्न हुए पुत्र के हाथ से ही मारे जा सकेंगे। अथवा यह भी संभव है कि आपके हाथ से कोई भी असुर न मारे जाये क्योंकि आप सदा योगयुक्त रहते हुए राग द्वेष से रहित हैं तथा एकमात्र दया करने में ही लगे रहते हैं। यदि वे असुर भी आराधित हो आपकी दया से अनुगृहीत होते रहे तो सृष्टि और पालन का कार्य कैसे चल सकता है।

अतः हे प्रभो वास्तव में हम तीनो एक ही कार्य के भेद से भिन्न-भिन्न देह धारण करके स्थित हैं। यदि कार्यभेद न सिद्ध हो,तब तो हमारे रूप भेद का कोई प्रयोजन ही नहीं है। सनातनदेव हम तीनों उन्ही भगवान सदाशिव और शिवा के पुत्र हैं,इस यथार्थ तत्व का आप ह्रदय से अनुभव कीजिये। प्रभो मैं और श्री विष्णु आपके आदेश से प्रसन्नता पूर्वक लोक की सृष्टि और पालन के कार्य कर रहे हैं तथा कार्य कारणवश सपत्नी भी हो गए हैं,अतः आप भी विश्वहित के लिए तथा देवताओं को सुख पहुंचाने के लिये एक परम सुंदरी स्त्री को अपनी पत्नी बना लीजिये।

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हे देवाधिदेव पूर्वकाल में आपने ही कहा था ब्रह्मन मेरा ऐसा ही उत्तम रूप तुम्हारे अंगविशेष ललाट से प्रकट होगा जिसकी लोक में रूद्र नाम से प्रसिद्धि होगी। तुम ब्रह्मा सृष्टिकर्ता होंगे, श्रीहरि अर्थात भगवान विष्णु जगत का पालन करेंगे और आप स्वंय सगुण रुद्ररूप होकर संहार करेंगे। जिसके लिए आप एक स्त्री के साथ विवाह करके लोक के उत्तम कार्य की सिद्धि करेंगे। अब समय आ गया है की आप अपनी ही पूर्व प्रतिज्ञा को पूर्ण कीजिये। स्वामिन आपका यह आदेश है की मैं सृष्टि करूँ,श्री हरि पालन करें और आप स्वंय संहार के हेतु बनकर प्रकट हों.सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ता के रूप में प्रकट हुए हैं। हे शम्भो जैसे लक्ष्मी भगवान विष्णु की और सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं उसी प्रकार आप इस समय अपनी जीवन सहचरी प्राण वल्लभा को ग्रहण करें।

ब्रह्मा जी के मुख से ऐसी बातें सुनकर भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले ब्रह्मण और हरे तुम दोनों मुझे सदा ही अत्यंत प्रिये हो, तुमलोग समस्त देवताओं में श्रेष्ठ तथा त्रिलोकी के स्वामी हो। किन्तु मेरे लिए विवाह करना उचित नहीं होगा क्योंकि मैं तपस्या में संलग्न रहकर सदा संसार से विरक्त ही रहता हूँ और योगी के रूप में मेरी प्रसिद्धि है मैं भोगों से दूर रहता हूँ तथा जो सदा अपवित्र और अमंगल वेषधारी है,उसे संसार में कामिनी से क्या प्रयोजन है मुझे बताओ तो सही। मुझे तो सदा केवल योग में लगे रहने पर ही आनंद आता है। ज्ञानहीन पुरुष ही योग को छोड़कर भोग को अधिक महत्त्व देता है।

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इसलिए मैं सत्य कहता हूँ विवाह के लिये मेरे मन में थोड़ी सी भी अभिरुचि नहीं है। तथापि जगत के हित के लिए आप सभी ने जो कुछ कहा है उसे मैं करूँगा। तुम्हारे वचन को मानकर अपनी कही हुई बात को पूर्ण करने के लिए मैं अवश्य विवाह करूँगा क्योंकि मैं सदा भक्तों के वश में रहता हूँ। परन्तु मैं जैसी नारी को प्रिये पत्नी के रूप में ग्रहण करूँगा उसे कासी होनी चाहिए पहले वो सुन लो। फिर भगवान शिव बोले हे देवतागण जो नारी मेरे तेज को ग्रहण कर सके,जो योगिनी तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाली हो,उसी को मैं पत्नी के रूप में स्वीकार करूँगा। क्योंकि जब मैं योग में तत्पर रहूं तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा और जब मैं कामासक्त होऊं तब उसे भी कामिनि के रूप में ही मेरे पास रहना होगा। जो मेरे शिव चिंतन में विघ्न डालनेवाली होगी वह जीवित नहीं रह सकती उसे अपने जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। तुम विष्णु,और मैं तीनो ही ब्रह्मस्वरूप शिव के अंशभूत हैं। अतः तुम मुझे ऐसी पत्नी प्रदान करो,जो सदा मेरे कर्म के अनुकूल चल सके। ब्रह्मन मेरी एक और शर्त है,उसे सुनो,यदि उस स्त्री का मुझ पर और मेरे वचन पर अविश्वास होगा तो मैं उसे त्याग दूंगा।

भगवान शिव की बातें सुनकरब्रह्माजी ने कहा नाथ आपने जैसी नारी की खोज आरम्भ की है वैसी ही स्त्री के विषय में मैं आपको बतलाने आया हूँ। साक्षात् सदाशिव की धर्मपत्नी जो उमा हैं,वे ही जगत का कार्य सिद्ध करने के लिये भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट हुई है। प्रभो सरस्वती और लक्ष्मी ये दो रूप धारण करके वे पहले ही यहाँ आ चुकी है। इनमे देवी लक्ष्मी तो श्री विष्णु की प्राण वल्लभा हो गयी और सरस्वती मेरी। अब हमारे लिये वे तीसरा रूप धारण करके प्रकट हुई है। प्रभो लोकहित का कार्य करने की इच्छा वाली देवी शिवा दक्षपुत्री के रूप में अवतीर्ण हुई है। उनका नाम सती है। सती ही ऐसी भार्या हो सकती है जो सदा आपके लिये आपको पतिरूप में प्राप्त करने के लिए दृढ़तापूर्वक कठोर व्रत का पालन करती हुई तपस्या कर रही है। महेश्वर आप उन्हें वर देने के लिये जाइये,कृपा कीजिये और बड़ी प्रसन्नता के साथ उन्हें उनकी तपस्या के अनुरूप वर देकर उनके साथ विवाह कीजिये। शंकर भगवान विष्णु की,मेरी तथा इन सम्पूर्ण देवताओं की यही इच्छा है।

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दर्शकों इससे आगे क्या हुआ ये हम आपको अगले एपिसोड में में बताएँगे फिलहाल शिव पुराण की ये कथा यहीं समाप्त होती। लेकिन आपलोग कही जाइएगा नहीं हम जल्द लेकर हाजिर होंगे इससे आगे की कथा। अगर आपको हमारी ये कथा अच्छी लगी हो तो इसे जयदा से ज्यादा लाइक और शेयर करें। अब हमें इजाजत दें आपका बहुत बहुत शुक्रिया।