रामायण हिन्दू धर्म के पवित्र धार्मिक ग्रंथों में से एक है। जो राम जन्म और राम-रावण युद्ध के आलावा खुद में कई और रोचक कथा समेटे हुए है। आज की इस वीडियो में मैं आपको एक ऐसे ही कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ। ये तो सभी जानते हैं की सीता हरण के बाद प्रभु श्री राम ने लंका पर चढ़ाई कर रावण के साथ युद्ध किया था। लेकिन बहुत कम लोग ही ये जानते हैं की रावण ने श्री राम के पिता और अयोध्या के राजा दशरथ से भी युद्ध किया था। तो दर्शको आइये जानते है कि रावण और राजा दशरथ के बिच क्यों हुआ था युद्ध और उसका परिणाम क्या हुआ था ?

रामायण में वर्णित कथा के अनुसार

अयोध्या के राजा दशरथ और लंकापति रावण के बिच यह युद्ध प्रभु श्री राम के जन्म से पहले हुआ था। एक बार राक्षसराज रावण तीनो लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिया निकला। इस क्रम में उसने अयोध्या को छोड़कर लगभग दसों दिशाओं के सभी राज्य को अपने बाहुबल से जीत लिया। अंत में वह सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्या को अपने अधीन करने पहुंचा। उस समय अयोध्या के नरेश दशरथ थे।

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सरयू नदी के तट पर पहुंचकर रावण ने अपने सेना को वही विश्राम करने का आदेश दिया। और मामा माल्यवान से कहा -मामा श्री हमने दसों दिशाओं के सभी राज्य को जीत लिया है अब केवल सरयू तट बसा ये अयोध्या नगर ही शेष रह गया है। जिसके रहा दशरथ को हमारे शरण में आना शेष है। इसलिए मैं आक्रमण करने से पहले अयोध्या के राज सभा में अपना दूत भेजना चाहता हूँ।

यह सुनकर माल्यवान जी ने कहा -हे लंकेश दूत भेजने की क्या जरूरत है।,राजा दशरथ को तो दसानन रावण की जयकार अभी से सुनाई दे रही होगी और भला वो आपसे बलवान भी नहीं है। यह सुनलर रावण ने कहा मामा श्री यह मत भूलिये की किसी राज्य पर आक्रमण करने से पहले दूत भेजना हमारी राज पद्धति है और इसका हमने हर युद्ध में पालन किया है।

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रावण की बात सुनकर उसके मामा ने कहा -जो आज्ञा दसानन ,मेरे विचार से इस काम के लिए आपको मेरे भ्राता मारीच को दशरथ की राजसभा में भेजना चाहिए।यह सुनकर रावण ने मामा माल्यवान की बात पर सहमति जताई।

इसके बाद लंकापति रावण ने मारीच को अयोध्या की राज्यसभा में अपना सन्देश लेकर भेजा ,जहाँ पहुंचकर मारीच ने राजा दशरथ को लंकापति रावण के सन्देश सुनाये। मारीच ने कहा की हे राजन लंका के राजा रावण सरयू तट पर सेना सहित आ पहुंचे हैं और मुझे ये कहने को भेजा है की या तो कल प्रातः आप उनसे युद्ध करें अथवा उनकी अधीनता स्वीकार कर ले। इसी में आपकी और अयोध्या की भलाई है।

रावण का यह सन्देश सुनकर राजा दशरथ क्रोधित हो उठे और उन्होंने दूत मारीच से कहा -अयोध्या की किसमे भलाई है ये अच्छे से जनता हूँ। तुम्हारे राजा रावण के अत्याचार से आज तक किसी का भी भला नहीं हुआ है। इसलिए तुम अपने राजा से जाकर कहो की हम रघुवंशी शांतिप्रिय हैं,हम राक्षसराज रावण की तरह किसी पे अत्याचार नहीं करते। किन्तु इसका अर्थ ये नहीं की हम किसी का अत्याचार सहन कर ले। जिस प्रकार तुम्हारे राजा रावण को अपनी संस्कृति प्रिय है उसी प्रकार हमें भी अपनी संस्कृति प्रिय है। इसलिए अपने राजा से जाकर कहो की हम उनकी अधीनता स्वीकार नहीं कर सकते। 

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उसके बाद मारीच ने कहा की इसका अर्थ ये हुआ राजन की आप युद्ध चाहते हैं। तब राजा दशरथ ने मारीच से कहा मैंने तो ऐसा नहीं कहा बल्कि मैंने यह कहा है की हम शांतिप्रिय हैं ,किन्तु यदि हम पर कोई आक्रमण करता है तो हम उसका स्वागत युद्ध क्षेत्र में करते हैं। तुम्हारे राजा रावण को यदि अशांति प्रिय है तो जाकर अपने राजन से कह दो यदि वो युद्ध क्षेत्र में हमसे भेंट करना चाहते हैं तो दशरथ उनका स्वागत तीक्ष्ण बाणो से करेगा।

राजा दशरथ के मुख से ऐसी बातें सुनकर मारीच वहां से पांव पटकता हुआ चला गया और उसने रावण रावण को सारी बातें बताई। अपने लिए राजा दशरथ की मुख से ऐसी बातें सुनकर रावण क्रोधित हो गया और बोला सैनिको तैयार हो जाओ कल सुबह हमें अयोध्या पर आक्रमण करना है। राजा का सुनते ही सभी सैनिक युद्ध की तैयारी में लग गए।

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अगली सुबह दोनों सेनाएं युद्ध मैदान में इक्कठे हुए। युद्ध शुरू होने से पहले राजा दशरथ और लंकापति दोनों ने एक-दूसरे की सेनाओं को देखा। फिर राजा दशरथ ने रावण से कहा -लंकेश रावण तुम इतनी विशाल सेना लेकर अयोध्या पर क्यों आक्रमण करने आये हो ?उसके बाद रावण ने राजा दशरथ के प्रश्नो का जवाब देते हुए कहा -दशरथ तुमने देवताओं की सहायता से पृथवी पर जो अपना अधिपत्य जमाये हुए हो ,मैं पृथ्वी को उससे मुक्त कराने आया हूँ।इस धरती पर अगर किसी का स्वामित्व रहेगा तो केवल लंकेश रावण का। मुझसे युद्ध करने आये हो तो बातें मत करो युद्ध करो युद्ध।

इसके बाद राजा दशरथ ने रावण को फिर से समझाया लेकिन रावण फिर भी नहीं माना और ये कहते हुए दशरथ पर बाण चला दिया की तुम एक योद्धा हो कोई उपदेशक नहीं। अपनी तरफ बाण को आता देखा अयोध्या नरेश दशरथ ने भी बाण चलाये और दोनों के बाण रस्ते में ही आपस में टकरा कर ध्वस्त हो गए। इसके बाद दोनों सेनाओं के बिच भी युद्ध छिड़ गया। राजा दशरथ और लंकापति रावण काफी समय तक एक दूसरे पर बाणो की वर्षा करते रहे लेकिन दोनों के बाण रस्ते में ही टकरा कर ध्वस्त हो जाते। यह देख राजा दशरथ ने अपने तरकस से एक दिव्य बाण निकाला और उसे मंत्रो से सिद्ध कर धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाया। उसी समय ब्रह्मदेव प्रकट हुए और उन्होंने दशरथ को वह बाण चलने से रोक दिया।

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अपने सामने ब्रह्मदेव को देख पहले राजा दशरथ ने उन्हें प्रणामम किये फिर बोले-पितामह आप नुझे इस बाण का प्रयोग करने से क्यों रोक रहे हैं ?तब ब्रह्मदेव ने उनसे कहा-हे राजन ! रावण को साक्षात् शिवशंकर का वरदान प्राप्त है की उसे युद्ध में कोई पराजित नहीं कर सकता।  उसकी पराजय उसी दिन होगी जिस दिन उसकी मृत्यु होगी।  

यह सुनकर राजा दशरथ खुस हो गए और बोले -तो क्या ब्रह्मदेव आज रावण की मृत्यु मेरे हाथों होगी ?तब ब्रह्मा जी ने कहा नहीं दशरथ ,उसकी मृत्यु का एक समय निश्चित है ,परन्तु वो अभी नहीं है। तुम अपना बाण वापस ले लो दशरथ। यह सुन राजा दशरथ ने ब्रह्मदेव से कहा नहीं पितामह प्रत्यंचा पर चढ़ा ये बाण मैं वापस नहीं ले सकता। तो ब्रह्मदेव ने कहा इसे अंतरिक्ष में छोड़ दो। यह सुन दशरथ ने कहा जो आज्ञा लेकिन ब्रह्मदेव यह तो बताइये की अयोध्या के द्वार पर खड़ा यह रावण रुपी संकट कैसे दूर होगा। ब्रह्मदेव ने कहा उसकी चिंता ना करो राजन मैं रावण को समझा दूंगा। जो आज्ञा -राजा दशरथ नेकहा। फिर ब्रहदेव वहां से अंतर्ध्यान हो गए।

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कुछ देर बाद ब्रह्मदेव रावण के समक्ष प्रकट हुए। रावण ने ब्रह्मदेव को देख उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर ब्रह्मदेव बोले दसानन तुम तथा दशरथ दोनों अवध्य हो। यदि तुम्हारे पार महादेव का वरदान है तो दशरथ का तूणीर भी दिव्य शक्तियों से भरा हुआ है। ये अलग बात है की वह निःसंतान है और वृद्धावस्था की बढ़ रहा है। तुम ये क्यों नहीं सोचते की उसकी मृत्यु के बाद इस समस्त भू लोक पर बिना युद्ध किये ही तुम्हारा अधिकार हो जायेगा। इसलिए यह युद्ध बंद कर दो।

यह सुन रावण बोला – प्रभु मैंने दसों दिशाओं को युद्ध करके अपने बाहुबल से जीता है। कोई दान के रूप में नहीं प्राप्त किया। रावण युद्धप्रिय है प्रभु।

उसके बाद ब्रहदेव ने रावण को समझाया की तुम जो कह रहे हो वव सत्य है दसानन लेकिन जब तुमने दैत्य-दानव शक्तियों को अपने बाहुबल से जीतकर अपने अधीन किया है तो फिर मानव को जीतकर अपने यश को कमजोर क्यों कर रहे हो। इसलिए मैं कहता हूँ की तुम यह युद्ध छोड़कर एक विजेता के रूप में अपने राज्य वापस जाओ वहां एक सुभ समाचार तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। इतना कहकर ब्रह्मदेव अंतर्ध्यान हो गए।    

यह सुन रावण अपने सैनिकों को युद्ध रोकने का आदेश दिया और फिर लंका की ओर चल पड़ा। उधर राजा दशरथ ने बाण को अंतरिक्ष की ओर छोड़ दिया।

तो दर्शको इस तरह ब्रह्मदेव के हस्तक्षेप के कारण राजा दशरथ और रावण के बिच शुरू हुआ ये युद्ध बिना किसी परिणाम के ही समाप्त हो गया।

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