ऋषि कण्डु

हमारा देश पौराणिक समय से ही ऋषियों-महर्षियों की तपस्थली रहा है। हिन्दू धर्मग्रंथों में  कई ऐसे ऋषियों-महर्षियों का वर्णन मिलता है जिन्होंने अपने तपोबल से मानवजाति के कल्याण के लिए कई तरह के काम किये। तो वही कई ऐसे भी ऋषि हुए जिनकी शक्ति से देवराज इंद्र को भी डर सताने लगता था की कहीं उनसे देवराज की पदवी उनसे कोई छीन ना ले। इसी कारण उन्हें जिस किसी भी ऋषि की तपस्या से भय लगने लगता,उनकी तपस्या भंग करने के उद्देश्य से वो स्वर्ग की अप्सरा को पृथ्वीलोक पर भेज देते।  ऋषि अप्सरा के रूप और यौवन को देखकर मोहित हो जाते थे। इस पोस्ट में एक ऐसे ऋषि  की कथा  बताने जा रहे हैं जिन्होंने करीब एक हजार वर्षों तक एक अप्सरा के साथ भोग-विलास किया। तो आइये जानते हैं ऋषि कण्डु के 907 साल संभोग करने का रहस्य।

ऋषि की तपस्या और इंद्र

कथा के अनुसार पौराणिक काल में महान ऋषि कण्डु हुआ करते थे। जिनका आश्रम गोमती नदी के तट पर था। एक बार की बात है ऋषि कण्डु ने घोर तपस्या करना शुरू किया। वो तपस्या में इतने लीन हो गए की उन्हें किसी भी चीज का आभास ही नहीं होता था। इस तरह ऋषि को तपस्या में लीन देखकर देवराज इंद्र हमेशा की तरह घबरा गए। उन्हें यह डर सताने लगा की कहीं ऋषि कण्डु उनका स्वर्ग का सिंहासन छीन ना ले। इसी डर  के परिणामस्वरूप इंद्रदेव ने ऋषि कुंडू की तपस्या भंग करने के लिए प्रम्लोचा नामक की अप्सरा को पृथ्वीलोक पर भेजने का निश्चय किया।एक संध्या नृत्य के बाद इंद्र ने प्रम्लोचा को अपने पास बुलाया। फिर उसे अपनी सारी योजना बताई। बिना कोई प्रश्न किये प्रम्लोचा इंद्र की योजना के मुताबिक पृथ्वीलोक के लिए प्रस्थान कर गयी।

प्रम्लोचा का आगमन

पृथ्वीलोक पर प्रम्लोचा सीधे वहां पहुंची जहाँ ऋषि कण्डु तपस्या में लीन थे। फिर प्रम्लोचा ने अपनी शरारतों से ऋषि कण्डु ध्यान तोड़ दिया। उसके बाद जैसे ही ऋषि की नजर प्रम्लोचा पर पड़ी तो वे उसके रूप और सौंदर्य को देखकर उस पर मोहित हो गये।  और उसे अपने साथ लेकर मंदरांचल पर्वत की गुफाओ में चले गये। उसके बाद ऋषि कण्डु प्रम्लोचा के सौंदर्य में इतना खो गए की वो सौ से अधिक वर्षों तक उसके साथ भोग-विलास करते रहे। सौ वर्ष बाद एक दिन अप्सरा प्रम्लोचा ने ऋषि कण्डु से कहा की-हे ऋषि अब मैं  स्वर्गलोक वापस जाना चाहती हूँ। इसलिए आप मुझे ख़ुशी-ख़ुशी विदा कीजिये। अप्सरा के मुख से जाने की बात सुनकर ऋषि उदास हो गए और उन्होंने कहा हे देवी अभी थोड़े दिन और रुक जाती तो अच्छा होता।ऋषि को उदास देखकर अप्सरा पृथ्वीलोक पर और रुकने को मान गयी। फिर ऋषि कण्डु ने अगले सौ वर्षों तक उसी गुफा में अप्सरा के साथ भोग विलास किया। फिर सौ वर्षों बाद एक दिन प्रम्लोचा ने ऋषि कण्डु से कहा हे मुनि मुझे पृथ्वीलोक पर आये बहुत समय हो गया। अब तो आप मुझे स्वर्गलोक जाने कि आज्ञा दें। ऋषि कण्डु उसकी बात सुनका फिर व्यथित हो गए। बोले हे देवी अभी कुछ समय और रोक जाओ फिर चले जाना।

ऋषि कण्डु और प्रम्लोचा

इसी तरह कई सौ वर्ष बीत गए और जब भी अप्सरा प्रम्लोचा स्वर्गलोक जाने की बात ऋषि से कहती तो वो किसी तरह उसे मना  लेते| वो अप्सरा ऋषि के  श्राप से भी डरती थी की कहीं क्रोध में आकर ऋषि कण्डु उसे श्राप न दे दें। उधर महर्षि के काम वासना में लिप्त होने से अप्सरा के प्रति उनका प्रेम नित्य बढ़ता ही जा रहा था।तपस्या,पूजा-पाठ का त्याग कर दिन-रात ऋषि कण्डु भोग-विलास में डूबे रहते। एक दिन की बात है  ऋषि कण्डु  बड़ी  तेजी से अपनी कुटिया से निकल  रहे थे। तभी प्रम्लोचा उनके पास आई और  पूछने लगी  हे मुनि आप कहा जा रहे हैं। तब ऋषि कण्डु ने कहा कि हे भद्रे दिन अस्त हो चूका हैं। अतः मैं सन्ध्योपासना करने जा रहा हूँ। अगर ऐसा नहीं किया तो मेरा धर्म नष्ट हो जायेगा।यह सुनकर प्रम्लोचा मुस्कुराये बिना ना रह सकी और बोली हे सब वेदों के ज्ञाता इतने वर्षों में क्या आज पहली बार सूर्यास्त हुआ है जो संध्या वंदन नहीं करेंगे तो आपका धर्म नष्ट हो जायेगा।मैं तो आपसे जब से मिली हूँ तब से तो आपने कभी संध्या वंदन नहीं किया है।

ऋषि कण्डु की व्यथा

इस प्रकार के वचन सुनकर ऋषि कण्डु बोले ” हे भद्रे नदी के इस सुन्दर तट पर आज सवेरे ही तो तुम आयी हो। मुझे भली भांति स्मरण हैं।मैंने आज ही तुमको अपने आश्रम में प्रवेश करते देखा था । अतः अब दिन के समाप्त होने पर सांध्यकाल हुआ हैं। मुझे तो लगता है की तुम मेरा उपहास कर रही हो।

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 तब प्रम्लोचा ने ऋषि से कहा की हे ब्राम्हण श्रेष्ठ आपका यह कथन सत्य है की आपके आश्रम में मैं सवेरे आयी हूँ परन्तु आज नहीं। जिस सुबह मैं यहाँ आई थी  उस समय को तो कई सौ वर्ष बीत चुके हैं। यह सुन महर्षि कण्डु  घबरा गए और  बोले कि हे सुंदरी मुझे सही सही बताओ तुझे मुझे तेरे साथ रमण करते कितना समय बीत चूका हैं।  तब प्रम्लोचा ने बताया कि आपको मेरे साथ रमण करते हुए 907 वर्ष 6 महीने और 3 दिन हो चुके है। यह सुनकर ऋषि कण्डु हैरान हो गए और बोले हे प्रिये क्या तुम सत्य कह रही हो या फिर मेरे साथ कोई मजाक कर रही हो। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता हैं कि मैं  तुम्हारे साथ एक दिन ही रहा हूँ”। तब प्रम्लोचा बोली कि हे ब्राम्हण मैं आपसे झूठ कैसे बोले सकती हूँ वो भी उस समय ज़ब आप अपने धर्म मार्ग का अनुसरण करने के लिए तत्पर होकर मुझसे पूछ रहे हो।

प्रम्लोचा का अपराधबोध

मैं यहाँ किसी के कहने से आयी थी। ऋषि आप क्रोधित ना हों मैं आपको सारी घटना का सत्य बताती हूँ। परन्तु हे ऋषि मेरा इसमें कोई दोष नहीं है इसलिए मुझे क्षमा कर दीजियेगा। तब ऋषि कण्डु ने कहा की जल्दी बताओ तुम्हे यहाँ किसने भेजा था। तब प्रम्लोचा ने कहा की आपकी तपस्या से देवराज इंद्र को डर लगने लगा था और उन्होंने ही आपकी तपस्या भांग करने के लिए मुझे यहाँ भेजा था। प्रम्लोचा के मुख से ऐसे वाक्य सुनकर ऋषि कण्डु व्याकुल हो गए और  बोले कि धिक्कार हैं मुझपर, मेरा धर्म नष्ट हो गया। एक स्त्री ने मेरी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया। इस स्त्री के संग से मेरा समस्त जीवन का तप नष्ट हो गया। इसलिए हे पापिन स्त्री अब तू जहाँ चाहे जा सकती हैं। क्योंकि तुझे इंद्र ने जिस कार्य के लिए भेजा था। वह कार्य संपन्न हो गया। तूने मेरा तप नष्ट कर दिया हैं।

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महर्षि को इस तरह क्रोधित देख प्रम्लोचा भय से काँपने लगी जिस वजह से उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था। उस समय ऋषि ने जो गर्भ प्रम्लोचा में स्थापित किया था वह भी अप्सरा के रोम छिद्रों से निकल कर पसीने के रूप में उसके शरीर से बाहर आ गया। प्रम्लोचा के पसीने से  वायु ने उस गर्भ को इकठ्ठा किया और वृक्षों ने उसे ग्रहण किया। सूर्य की किरणों से पोषित होकर वह धीरे धीरे बढ़ने लगा। फिर समय पूरा होने पर उस व्रिक्षागृ से मिरिषा नामक कन्या उत्पन्न हुई। जो ऋषि कण्डु, सूर्यदेव, तथा वायु कि पुत्री कहलाई।

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