रावण

लंकापति के नाम से जाना जाने वाला रावण प्रकांड पंडित और महाज्ञानी था। वह ज्ञानी होने के साथ-साथ बहुत बड़ा तपस्वी भी था। तपस्या से  रावण ने अनेक सिद्धियां प्राप्त कर ली थीं। इतना शक्तिशाली और सिद्ध होने के कारण ही स्वयं भगवान ने उसका वध किया। रावण रामायण के सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक था। रावण के विषय में एक बात बहुत प्रचलित है कि उसके प्राण उसकी नाभि में थे। और विभीषण द्वारा यह रहस्य खुलने के कारण ही वो मृत्यु को प्राप्त हुआ था।  तो रावण की नाभि में प्राण छुपे होने का क्या रहस्य था यह हम इस पोस्ट में बताएँगे। 

रावण की तपस्या

ठीक ही कहागया है कि कोई कितना भी शक्तिशाली हो उसकी कोई न कोई कमज़ोरी तो होती ही है। रावण की सबसे बड़ी निर्बलता छुपी थी उसकी नाभि में और इसके विषय में केवल उसका परिवार जानता था। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वो ब्रह्मा जी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करेगा। उसने निरंतर 10 हज़ार वर्षों तक ब्रह्मा जी की तपस्या की। रावण ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके ज्ञान एवं अमृत प्राप्ति का वरदान माँगा था। ब्रह्मा जी ने उसे दोनों ही वरदान दिए। उसके बाद उसने अमृत को अपनी नाभि में छुपा कर रखा था। जिससे कोई उसका वध न कर सके। वह जानता था कि नाभि जैसे विशेष अंग पर भला कौन प्रहार कर सकता है। और इस प्रकार उसका यह रहस्य रहस्य ही रहेगा और उसका कोई वध भी नहीं कर सकेगा।परन्तु भगवान के सामने किसकी योजना अप्रभावित रहती है?

रावण-राम युद्ध

जब राम और रावण का युद्ध हो रहा था तब भगवान राम ने कई बार उसके मस्तिष्क और भुजाओं को धड़ से अलग कर दिया था। परन्तु वे पुनः जुड़ जाते थे तब रावण के भाई विभीषण ने रावण की नाभि में उसके प्राण होने का रहस्य श्री राम को बताया। भगवान राम ने तीर उसकी नाभि में ही मारा जिस कारण वह धराशायी होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।परन्तु दोस्तों जिस तीर से भगवान राम ने रावण पर प्रहार किया इसका भी एक रहस्य है। इस कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने रावण को अमृत्व का वरदान देने में संकोच व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह संभव नहीं है। रावण के हठ करने पर ब्रह्मा जी ने उसे एक विशेष तीर प्रदान किया। फिर कहा कि जब इस तीर से तुम पर प्रहार होगा तभी तुम मृत्यु को प्राप्त होगे अन्यथा तुम्हारा वध असंभव है।

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रावण की मृत्यु

तब लंकापति ने उस तीर को गुप्त रूप से अपने महल में अपने सिंहासन के पीछेएक खम्भे में छुपा दिया।  विभीषण को इसतीर के विषय में ज्ञात था। परन्तु वो तीर कहाँ रखा है यह उन्हें नहीं पता था। तब हनुमानजी एक ज्योतिषी का रूप धारण कर लंका में गए और भविष्यका व्याख्यान करने लगे। मंदोदरी भी उनसे भविष्य जानने कि इच्छा से उनके समक्ष पहुंची। उन्होंने मंदोदरी से कहाकि जो तीर तुम्हारे पति को ब्रह्मा से प्राप्त हुआ है उससे उसके प्राणो को संकट है। मंदोदरी यह सुनकर दुखी और भयभीत हो गयी और हनुमान जी को उस तीरका स्थान बता दिया। हनुमान जी ने वहां से वो तीर लेजाकर भगवान राम को दे दिया। और उसी तीर से रामजी ने रावण पर प्रहार कर उसका वध किया। इसलिए यह भी कहा जाता हैकी रावण का भाई ही नहीं बल्कि उसकी पत्नी मंदोदरी भी उसकी मृत्यु का कारण थी।

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