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मित्रों आपने भगवान श्री कृष्ण के लीलाओं से जुडी कई कथाओं के बारे में पढ़ा या सुना होगा। जैसे की आपने देखा होगा की मथुरा में कैसे एक कुबड़ी स्त्री उनके स्पर्श मात्र से ही एक सुन्दर युवती के रूप में परिवर्तित हो गई थी या फिर  आपने पढ़ा होगा की जब ही कोई असुर उन पर रूप बदल कर हमला करता तो वो उसे स्पर्श करते ही पहचान जाते और उसे मोक्ष दे देते। लेकिन इस पोस्ट में हम आपको जिस कथा के बारे में बताने जा रहे हैं उसे आज भी अधिकतर हिन्दू जनमानस नहीं जानते। ये कथा है एक ऐसे गिरगिट की जो पूर्वजन्म में एक दानवीर और महान राजा हुआ करता था परन्तु एक छोटी सी भूल के कारण उसे गिरगिट योनि में जाना पड़ा।

श्रीमद्भागवत पुराण के चौसठवें अध्याय में वर्णित कथा के अनुसार एक दिन की बात है द्वारका के  राजकुमार साम्ब,प्रद्युम्न,चारभानु और गद आदि घूमने के लिए उपवन गए और वहां पहुंचकर सभी राजकुमार खेलने में मग्न हो गए। फिर कुछ देर बाद उन राजकुमारों को जब प्यास लगी तब वे सभी इधर-उधर जल की खोज करने लगे। कुछ समय खोजने के पश्चात उनलोगों को दिखाई दिया फिर वे सभी उस कुएं के पास गए,परन्तु नजदीक जाने के बाद उन सभी राजकुमारों ने देखा की कुएं में जल की जगह एक विचित्र जीव पड़ा हुआ है। वह जीव देखने में बड़ा ही भयंकर था उसका आकार पर्वत की तरह विशाल था। फिर जब उन सभी ने उस जीव को थोड़ी देर गौर से तो वे लोग एक दूसरे से कहने लगे अरे यह विशालकाय जीव तो गिरगिट है। उन सभी को यह देखकर आश्चर्य की सीमा न रही। उनका ह्रदय करुणा से भर आया और वे उसे बाहर निकालने का प्रयत्न करने लगे। परन्तु जब वे राजकुमार उस गिरे हुए गिरगिट को चमड़े और जूट की रस्सियों से बांधकर बाहर न निकालने लगे परन्तु काफी कोशिश करने के बाद भी वे सभी मिलकर उसे कुएं से बाहर न निकाल सके। फिर सभी राजकुमार दौड़ते हुए भगवान श्री कृष्ण के पास पहुंचे और उन्हें उस विशालकाय गिरगिट के बारे में बताया। राजकुमारों के बातें सुनकर भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराने लगे और फिर उन्होंने राजकुमारों से कहा की चलिए भी जाकर देकहता हूँ आखिर वह गिरगिट कितना विशाल है। यह कहते हुए श्री कृष्ण राजकुमारों के साथ उपवन की तरफ चल पड़े।

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वहां पहुंचकर श्री कृष्ण ने देखा कि कुएँ का गिरगिट वाकई बहुत विशाल था परन्तु उन्होंने उसे खेल-खेल में ही एक अंगुली से बाहर निकाल दिया। तभी राजकुमारों ने देखा कि  कुएं से बाहर निकलने बाद वह गिरगिट एक दिव्य राजा के रूप में परवर्तित हो गया। उसके शरीर का रंग तपाये हुए सोने के समान चमक रहा था। और उसके शरीर पर अद्भुत वस्त्र,आभूषण और पुष्पों के हार शोभा पा रहे थे। यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि इस दिव्य पुरुष को गिरगिट योनि क्यों मिली थी,फिर भी वह कारण सर्वसाधारण को मालूम हो ,इसलिए उन्होंने उस दिव्य पुरुष से पुछा-महाभाग ! तुम्हारा रूप तो बहुत ही सूंदर है। तुम कौन हो ? मैं ऐसा समझता हूँ कि तुम अवश्य ही कोई श्रेष्ठ देवता हो। कृपा कर यह तो बताओ कि किस कर्म के फल से तुम्हे इस योनि में आना पड़ा था ? वास्तव में तुम इसके योग्य नहीं हो। हमलोग तुम्हारा वृतांत जानना चाहते हैं। यदि तुम हमलोगों को वह बतलाना उचित समझो तो अपना परिचय अवश्य दो।  

भगवान कृष्ण के मुख से ऐसी बातें सुनकर राजा के समान दिख रहा वह दिव्य पुरुष हाथ जोड़कर मुकुट झुकाते हुए बोला  प्रभो मैं महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ। जब कभी किसी ने आपके सामने दानियों की गिनती की होगी तब उसमे मेरा नाम भी अवश्य ही आपके कानो में पड़ा होगा। प्रभो ! आप समस्त प्राणियों की एक-एक वृति के साक्षी हैं। भूत और भविष्य का व्यवधान भी आपके अखंड ज्ञान में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता। आप तो सबकुछ जानते हैं,आप से छिपा ही क्या है ? फिर भी मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए अपनी पूरी कथा कहता हूँ।

भगवन ! पृथ्वी में जितने धूलिकण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जीतनी जल की धाराएं गिरती हैं,मैंने उतनी ही गौएँ दान की थी। वे सभी गौएँ दुधार,नौजवान,सुन्दरऔर कपिला थीं। उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था। सबके साथ बछड़े थे। उनके सींगों में सोना मढ़ दिया गया था और खुरों में चांदी। उन्हें वस्त्र,हार और गहनों से सजा दिया जाता था। फिर ऐसी गौएँ मैं दान करता था। भगवन ! मैं युवावस्था में संपन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण कुमारों को जो सद्गुणी,शीलसम्पन्न, दम्भरहित तपस्वी,वेदपाठी और शिष्यों को विद्यादान करनेवाले होते उन्हें वस्त्राभूषण से अलंकृत करता और उन गौओं का दान करता। इस प्रकार मैंने बहुत-सी गौएँ, पृथ्वी,सोना,घर,घोड़े,हाथी,चांदी, रत्न,गृह-सामग्री और रथ आदि दान किये। अनेकों यज्ञ किये और बहुत-से कुएं,बावली आदि बनवाये।

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परन्तु एक दिन किसी दान न लेनेवाले तपस्वी ब्राह्मण की एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओं में आ मिली। मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला। इसलिए मैंने अनजान में उसे किसी दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया। जब उस गाय को वे ब्राह्मण ले जा रहे थे ,तब उस गाय के असली स्वामी ने कहा-यह गौ मेरी है।यह सुन दान ले जानेवाले ब्राह्मण ने कहा-यह तो मेरी है,क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसका दान किया है। और वे दोनों ब्राह्मण आपसे में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिए मेरे पास आये। एक ने कहा-यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है और दूसरे ने कहा कि यदि ऐसी बात हैं तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है। भगवन ! उन दोनों ब्राह्मणो की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया। मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि मैं बदले में एक लाख उत्तम गौएँ दूंगा। आप लोग मुझे यह गाय दे दीजिए। मैं आप लोगों का सेवक हूँ। मुझसे अनजान में यह अपराध हो गया है। मुझपर आप लोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्ट से बचा लीजिए। यह सुन उस गाय का स्वामी बोला राजन ! मैं इसके बदले में कुछ नहीं लूँगा।इतना कहकर गाय का स्वामी चला गया। उसके बाद दूसरे ब्राह्मण ने कहा की राजन तुम इसके बदले में एक लाख ही नहीं दस हजार गौएँ और दो तो भी मैं नहीं लूँगा। इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया।

फिर कई वर्ष बाद आयु समाप्त होने पर यमराज के दूत आये और मुझे यमपुरी ले गए। वहां यमराज ने मुझसे पूछा-राजन ! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का ? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हे ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होनेवाला है,जिसकी कोई सीमा ही नहीं है। भगवन ! तब मैंने यमराज से कहा-देव ! पहले मैं अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ। और उसी क्षण यमराज ने कहा-तुम गिर जाओ। उनके ऐसा कहते ही मैं वहां से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट हो गया हूँ। प्रभो ! मैं ब्राह्मणो का सेवक, उदार,दानी और आपका भक्त था मुझे इस बात की उत्कट अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जाएँ। इस प्रकार आपकी कृपा से मेरे पूर्वजन्मों की स्मृति नष्ट न हुई। भगवन ! आप परमात्मा है। बड़े-बड़े शुद्ध ह्रदय योगीश्वर उपनिषदों की दृष्टि से अपने ह्रदय में आपका ध्यान करते रहते हैं। आपका दर्शन तो तब होता है,जब संसार के चक्कर से छुटकारा मिलने का समय आता है। प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मैं अब देवताओं के लोक में जा रहा हूँ। आप मुझे आज्ञा दीजिए। आप ऐसी कृपा कीजिये कि मैं चाहे कहीं भी क्यों न रहूं,मेरा चित्त सदा आपके चरणकमलों में ही लगा रहे। राजा नृग ने इस प्रकार कहकर भगवान की परिक्रमा की और अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श करके प्रणाम किया। फिर उनसे आज्ञा लेकर सब के देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमान पर सवार हो गये।

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उधर राजा नृग के चले जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने वहां उपस्थित अपने कुटुंब के लोगों से कहा-जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी हैं,वे भी ब्राह्मणो का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते। मैं हलाहल विष को विष नहीं मानता,क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राह्मणो का धन ही परम विष है,उसको पचा लेने के लिए पृथ्वी में कोई औषध, कोई उपाय नहीं है। हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है और आग भी जल के द्वारा बुझाई जा सकती है,परन्तु ब्राह्मण के धन रूप अरणि से जो आग पैदा होती है,वह सारे कुल को समूल जला डालती है। ब्राह्मण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिए बिना भोगा जाय तब तो वह भोगनेवाले,उसके लडके और पौत्र इन तीन पीढ़ियों को ही चौपट करता है। परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय,तब तो पूर्व पुरुषों की दस पीढ़ियां और आगे की भी दस पीढ़ियां नष्ट हो जाती है। जो मुर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मी के घमंड से अंधे होकर ब्राह्मणो का धन हड़पना चाहते हैं,समझना चाहिए कि वे जान-बूझकर नरक में जाने का रास्ता साफ़ कर रहे हैं। जैसे ब्राह्मण की गाय ने अनजान में उसे लेनेवाले राजा नृग को नरक में दाल दिया था। भगवान श्री कृष्ण द्वारका वासियों को इस प्रकार उपदेश देकर अपने महल में चले गए।