मृत्यु के बाद और दाह के बीच मनुष्य के क्या कर्तव्य

मृत्यु के बाद और दाह के बीच मनुष्य के क्या कर्तव्य:

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मृत्यु के बाद और दाह के बीच मनुष्य के क्या कर्तव्य: प्रिय दर्शकों ये तो हम सभी जानते हैं कि जिसने भी इस मृत्युलोक में जन्म लिया है उसकी एक ना एक दिन मृत्यु होनी निश्चित है। इसलिए जीवित रहते तो मनुष्य अपने ज्ञान के अनुसार वो सभी कर्म करता है जिसे उसे मृत्यु के पश्चात् मोक्ष की प्रति हो सकें लेकिन फिर भी धर्मात्मा से धर्मात्मा मनुष्य से कोई ना कोई अपराध जरूर हो जाता है। और इसी अपराध से मुक्ति के लिए गरुड़ पुराण में कुछ ऐसी विधि के बारे में बताया गया है जिसे मृत्यु के पश्चात् यदि मृतक के परिजनों द्वारा पूर्ण किया जाता है तो उसे उस अपराध की सजा से मुक्ति मिल जाती है। हम आपको मृत्यु के पश्चात् परिजनों को क्या क्या करना चाहिए इसी के बारे में बताने जा रहे हैं।

मित्रों गरुड़पुराण के सिंहावलोकन अध्याय में इस बात का विस्तार से वर्णन किया गया है कि जब किसी भी मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो उसके बाद मृतक के परिवार वालों को क्या क्या करना चाहिए जिससे उसे मोक्ष की प्राप्ति हो। भगवान विष्णु गरुड़ से कहते हैं कि जब किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाए तो उसके पुत्र और अन्य परिजनों को चाहिए की वे सभी स्नान करके शव को भी शुद्ध जल से स्नान कराकर उसे नवीन वस्त्र पहना दे। तत्पश्चात उसके शरीर में चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों का लेप लगा दे। फिर सभी बंधु-बांधवों को मृतक के शव को दाह संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाना चाहिए और वहां शव को दक्षिण दिशा की ओर सिर कर के लिटा देना चाहिए। उसके बाद दाह की क्रिया के लिए पुत्रादि परिजनों को स्वंय तृण यानी तिनका ,काष्ठ यानी लकड़ी ,तिल और घृत आदि ले जाना चाहिए। क्योंकि भगवान विष्णु कहते हैं कि दूसरों के द्वारा श्मशान में पहुंचायी गयी वस्तुओं से वहां किया गया सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाता है। परन्तु दाह संस्कार से पहले मृतक के नाम से पिण्ड का दान करे।

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पहला पिंड दान मृत्यु के स्थान पर करना चाहिए अर्थात जहाँ मृतक ने अपनी अंतिम सांस ली हो ,उसके बाद दूसरा घर के द्वार पर फिर तीसरा पिण्डदान चौराहे पर करे। उसके बाद चौथा पिंडदान वहां करें जहाँ मृतक विश्राम करता था ,और पांचवां चिता पर। ऐसा माना जाता है कि शवदाह के पूर्व पांच पिण्डदान करने से शव में आहुति यानी अग्निदाह की योग्यता आ जाती है। क्योंकि उपयुक्त पिण्ड नहीं दिए जाने पर शव राक्षसों के भक्षण योग्य हो जाता है। इसके अलावा दाह कार्य में चांडाल के घर की अग्नि,चित्ता की अग्नि और पापी के घर की अग्नि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। फिर स्वच्छ भूमि पर अग्नि स्थापित कर क्रव्याद देव अर्थात अग्निदेव की विधिवत पूजा करके शव को चित्ता में जलाना चाहिए। जब शव के शरीर का आधा भाग चिता में जल जाय तो उस समय कर्ता अर्थात जिसने मृतक को मुखाग्नि दी है उसे तिलमिश्रित घृत की आहुति चिता में जल रहे शव के ऊपर छोड़ देना चाहिए। उसके बाद भावविह्वल होकर परिजनों को मृतक के लिए रोना चाहिए। ऐसा करने से उस मृतक को अत्यधिक सुख प्राप्त होता है और मोक्ष मिलने की संभावना बढ़ जाती है

फिर दाह क्रिया करने के पश्चात अस्थि-संचयन क्रिया करनी चाहिए और उस समय भी मृतक के नाम पिण्डदान करना चाहिए। तदनन्तर किसी जलाशय पर जाकर सभी परिजनों को वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके मृत प्राणी के लिये तिल और जल को अर्पित करना चाहिए। इसके बात मृतक के परिजन को इस बात का विशेष धयान रखना चाहिए कि उनके आँखों से आंसू नहीं निकले क्योंकि उस समय रोते हुए अपने बंधू बांधवों के द्वारा आँख और मुंह से गिराए हुए आंसू और कफ का मृतक को पान करना पड़ता है। इसके बाद घर की ओर प्रस्थान करना चाहिए जिसमे स्त्रियां आगे-आगे और पुरुष उनके पीछे पीछे चलें। और घर के द्वार पर पहुंचने पर नीम की पतियों को दांत से काटकर आचमन करें,उसके बाद ही घर में प्रवेश करना चाहिए।

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उसके बाद पुत्र-पौत्रादि तथा सम गोत्री परिजन को चाहिए कि वह दस रात्रियों का अशौच मनाएं अर्थात इन दस दिनों में मृतक के सगे सम्बन्धी को चाहिए की वे कोई भी शुभ कार्य या पूजा पाठ ना करें । इसके आलावा अशौच काल में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। अर्थात सभी लोग पृथ्वी पर ही सोये। दान,अध्ययन एवं भोग-विलास आदि कर्मो से दूर रहें। साथ ही अशौच की अवधि में मिट्टी के बने पात्र या पत्तल में भोजन करें। इसके बाद दशगात्र के अंतर्गत दस पिण्डदान आदि की प्रक्रिया बतायी गयी है। दाह-संस्कार के समय छः पिण्ड तथा दशगात्र के दस पिण्ड को मलिन षोडशी कहा गया है जो मृत्यु के दिन से दस दिन में पूर्ण हो जाती है। दशगात्र की प्रक्रिया में यह बताया गया है कि नौ दिन में मृत व्यक्ति का शरीर अपने अंगों से युक्त हो जाता है। पुराणों में लिखा है कि इसी पिंड के द्वारा क्रम क्रम से प्रेत का शरीर बनता है और दसवें दिन पूरा हो जाता है । हे अण्डज पहले दिन जो पिण्डदान दिया जाता है उससे जीव की मूर्द्धा का निर्माण होता है। दूसरे दिन के पिण्डदान से आँख,कान और नाक की रचना होती है। तीसरे दिन के पिण्डदान द्वारा दोनों गण्डस्थल यानी कान और आँख के बीच का स्थान,तथा मुख बनकर तैयार होता है। उसी प्रकार चौथे दिन उसके ह्रदय एवं उदरभाग,पांचवें दिन पीठ और गुदा का आविर्भाव होता है। तत्पश्चात छठे दिन उसके दोनों ऊरु,सातवें दिन एड़ी ,आठवें दिन जंघा,नौवें दिन पैर तथा दसवें दिन पिंडदान देने से प्रबल क्षुधा की उत्पति होती है।

दोस्तों इसके आलावा गरुड़ पुराण में बताया गया है कि अगर किसी की मृत्यु पञ्चक समय में हो जाये तो उसका दाह संस्कार नहीं करना चाहिए। दोस्तों मास के प्रारम्भ में धनिष्ठा नक्षत्र के अर्ध भाग से लेकर रेवती नक्षत्र तक का समय पञ्चक काल कहलाता है। इसको सदैव दोषपूर्ण माना गया है। इसमें मरे हुए व्यक्ति का दाह संस्कार करना उचित नहीं है। यह काल सभी प्राणियों में दुःख उत्पन्न करनेवाला बताया गया है। इसलिए पञ्चक काल के समाप्त होने पर ही मृतक के सभी कर्म करने चाहिए अन्यथा पुत्र एवं पारिवारिक जनो के लिये यह कष्टप्रद होता है। इस नक्षत्र में मृतक का दाह संस्कार करने पर घर में किसी न किसी प्रकार की हानी होती है। और यदि पञ्चक में दाह संस्कार करना हो तो कुश के मानवाकार चार पुतले बनाकर नक्षत्र मन्त्रों से उनको अभिमंत्रित करके शव पर रख दें। उसके बाद ही पुतलों के साथ मृतक का दाह संस्कार करें। अशौच के समाप्त हो जाने पर मृतक के पुत्रों द्वारा पञ्चक शान्ति भी करानी चाहिए। मृतक के पुत्रों को प्राणी के कल्याण हेतु तिल,गौ,स्वर्ण और घी का दान देना चाहिए। समस्त विघ्नो का विनाश करने के लिए ब्राह्मणो को भोजन,पादुका,छत्र यानि छाता,स्वर्णमुद्रा और वस्त्र देना चाहिए। यह दान मृतक के समस्त पापों का विनाश कर देता है।

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इसके आलावा गरुड़ पुराण में बताया गया है की मलिनषोडषी के बाद मध्यमषोडशी विधि का पालन करना चाहिए अर्थात विष्णु से आरम्भ कर के विष्णु पर्यन्त एकादश श्राद्ध तथा पांच देव श्राद्ध करना चाहिए। मध्यमषोडशी विधि से मृतक का श्राद्ध एकादशाह यानि मृत्यु के ग्यारहवें दिन करना चाहिए। इसी दिन वहीँ पर वृषोत्सर्ग यानी सांड का उत्सर्ग भी करना चाहिए।क्योंकि भगवान विष्णु गरुड़ से कहते हैं की जिस जीव का ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग नहीं होता है उसे सैकड़ों श्राद्ध करने पर भी प्रेतत्व से मुक्ति नहीं मिलती। अतः स्वजन की मृत्यु के पश्चात् निश्चित ही वृषोत्सर्ग करना चाहिए। यदि एकाद्शाह के दिन यथा विधान सांड उत्सर्ग करने के लिये उपलब्ध नहीं है तो विद्वान् ब्राह्मण को कुश या चावल के चूर्ण से ही सांड का निर्माण कर के उसका उत्सर्ग करना चाहिए। इसके आलावा जीवन काल में प्राणी को जो भी पदार्थ प्रिय रहा हो उसका भी दान इसी एकादशाह श्राद्ध के दिन करना उचित है। इसी दिन मरे हुए स्वजन को उद्देश्य बना कर शय्या,गौ आदि का दान भी करना चाहिए। इतना ही नहीं उस प्रेत की क्षुधा शान्ति के लिये बहुत से ब्राह्मणो को भोजन भी कराना चाहिए।

दोस्तों आपको ये भी बता दूँ कि जब मनुष्य मरने के बाद एक वर्ष की महापथ की यात्रा करता है तो वह पुत्र-पौत्रादि के द्वारा सपिण्डीकरण हो जाने पर प्रीतिलोक में चला जाता है। दोस्तों सपिण्डीकरण एक प्रकार का श्राद्ध की विधि है जिसमें मृतक को पिंडदान द्वारा पितरों के साथ मिलाते हैं। इसलिए पुत्र को पिता का सपिण्डीकरण अवश्य करना चाहिए । वर्ष के अंत में पितृ पिण्डों के साथ प्रेत-पिंड का सम्मिलन हो जाने के बाद वह प्रेत परम गति को प्राप्त करता है।

इसके बाद भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि हे पक्षी राज जिस परिवार में मनुष्य की मृत्यु होने पर यदि सपिण्डीकरण श्राद्ध नहीं किया जाता है तो उस परिवार में किसी का विवाह संस्कार नहीं हो सकता। जब तक सपिण्डीकरण नहीं हो जाता तब तक भिक्षुक उस घर की भिक्षा स्वीकार नहीं करता। इसलिए श्राद्ध क्रिया करने वाले पुत्र को द्वादशाह को ही सपिण्डीकरण कर देना चाहिए। सपिण्डीकरण करने के बाद भी बारह महीने तक षोडश श्राद्ध एकोदिष्ट विधि से नियमानुसार करना चाहिए।

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मृतक का दाह संस्कार हो जाने के पश्चात् दशगात्र के पिण्डदान से पुनः शरीर उत्पन्न होता है। दसवें पिण्ड से शरीर बन जाने पर प्राणी को अत्यधिक भूख लगती है। एकाद्शाह तथा द्वादशाह इन दो दिनों में प्रेत भोजन करता है। इन दोनों दिन जो कुछ प्राणी के निमित दिया जाता है उसे प्रेत शब्द के द्वारा दिया जाना चाहिए क्योंकि वह मृतक के लिये आनंददायक होता है। सपिण्डीकरण कर देने के बाद जो भी दान किया जाय वह नाम गोत्र का उच्चारण करके मृतक के नाम करना चाहिए। भोजन तथा घटादि का दान,पददान शय्यादान एवं अन्य जो भी दान है उन्हें मृत प्राणी के निमित एक को ही उद्देश्य करके देना चाहिए। पिण्डदान के पश्चात् यथाशक्ति उपयोगी समस्त सामग्री दान में देना चाहिए। ऐसा होने पर वह दिव्य देह धारण करके विमान द्वारा सुख पूर्वक यमलोक को चला जाता है।

मृतक के द्वादशाह यानि मृत्यु के बारहवें दिन संस्कार के अवसर पर जल पूरित कुम्भों का दान विशेष महत्त्व रखता है।इसलिए मृतक के परिवार वालों को चाहिए की उस दिन जल से भरे बारह घटों का संकल्प करके दान करें। उसी दिन वह पका हुआ अन्न और फल से परिपूर्ण एक वर्धनी याकि की विशेष प्रकार का जल पात्र भगवान विष्णु के लिए संकल्प करके सुयोग्य एवं सच्चरित्र ब्राह्मण को प्रदान करें। तदनन्तर वह एक वर्धनी,पका हुआ अन्न तथा फल धर्मराज को समर्पित करें। क्योंकि उससे संतुष्ट होकर धर्मराज उस प्रेत को मोक्ष प्रदान करते हैं। उसी समय एक विशेष जलपात्र चित्रगुप्त के लिए भी दान में देना चाहिए। उसके पुण्य से प्रेत वहां पहुंचकर सुखी रहता है।

साथ ही श्राद्ध कर्म के बाद दान देते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि दान में एक शय्या एक ही ब्राह्मण को दें । क्योंकि एक गौ,एक गृह,एक शय्या और एक स्त्री का दान बहुतों के लिए नहीं होता। विभाजित करके दिए गए ये दान दाता को पाप की कोटि में गिरा देते हैं। इसके आलावा पुत्र को पिता के लिए आजीवन श्राद्ध करना चाहिए तभी वह आतिवाहिक प्रेत रूप पिता द्वारा दिए गए उन भोगों का सुख प्राप्त करता है। क्योंकि भगवान विष्णु कहते हैं कि पुत्र ही यमलोक में पिता का रक्षक है और घोर नरक से वही पिता का उद्धार करता है।