दोस्तों इंसान जन्म लेने से पहले नौ महीने अपनी माँ की गर्भ में समय व्यतीत करता है। बच्चे जब माँ के गर्भ में पहली बार आता है तो माँ उस बच्चे के इस मृत्यु लोक में आने से पहले ही कई सपने बुनने लगती है लेकिन क्या आप जानते है की बच्चा अपने माँ के गर्भ में क्या सोचता है और उसे गर्भ में क्या सजा भोगनी पड़ती है ? जैसा कि गरुड़ पुराण में जीवन-मृत्यु, स्वर्ग, नरक, पाप-पुण्य, मोक्ष पाने के उपाय आदि के  साथ ही यह भी बताया गया है कि शिशु को माता के गर्भ में क्या-क्या कष्ट भोगने पड़ते हैं और वह किस प्रकार भगवान का स्मरण करता है। शिशु मां के गर्भ में क्या महसूस करता है, उस समय उसके मन एवं मस्तिष्क में क्या-क्या बातें चलती हैं।

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गरुड़ पुराण के धर्मकांड के प्रेतकल्प अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जब भगवान विष्णु से पूछते हैं की हे प्रभो जब कोई आत्मा दूसरा शरीर धारण करने से पहले अपनी माँ के गर्भ में होता है तो वह कैसा महसूस करता है कृपया मुझे विस्तार से बताइये। तब भगवान विष्णु गरुड़ से कहते हैं की हे गरुड़ गर्भस्थ जीव को अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान रहता है,वह वहां स्मरण करता है कि आयु के समाप्त होने पर शरीर का परित्याग करके अब मैं मलादि में रहनेवाले छोटे-छोटे कृमि या कीटाणुओं की एक विशेष योनि में स्थित हूँ,पहले मैं सरककर चलने वाले सर्पादि की योनि में पहुंचा,फिर मच्छर हो गया था,उसके बाद चार पैरोंवाला अभ्र या वृषभ नामक पशु बन गया था अथवा जंगली सुकर की योनि में प्रविष्ट था। इस प्रकार गर्भ में रहते हुए उस जीवात्मा को पूर्ण ज्ञान रहता है,किन्तु उत्पन्न होते ही वह तत्काल उसे भूल जाता है। उसे याद आता है कि मैं दूसरे को चलने का विचार करता रहा। मैंने शरीर की रक्षा के लिये धर्म का परित्याग करके द्यूत,छल-कपट और चोरवृति का आश्रय लिया।

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फिर गर्भस्थ जीवको याद आता है की उसने अपने पिछले जन्म में अत्यंत कष्ट से स्वंय लक्ष्मी को एकत्र किया था,किन्तु अभिलषित धन का उपभोग वह नहीं कर सका। और अग्निदेव,अतिथि और बंधू-बांधवों को स्वादिष्ट अन्न,फल,गोरस तथा ताम्बूल दे करके मैं उन्हें संतुष्ट करने में असफल रहा। फिर गर्भस्थ जीव  को याद आता है की इस पृथ्वी पर स्थित त्रिविक्रम भगवान विष्णु की प्रतिमा का दर्शन मैंने नहीं किया,उन्हें प्रमाण नहीं किया और न तो उनकी पूजा की है। प्रभासक्षेत्र में विराजमान भगवान सोमनाथ की भक्तिपूर्वक पूजा एवं वंदना भी मेरे द्वारा नहीं हुई है। जब ऐसी चिंता गर्भस्थ जीव करता है,तब यमदूत उससे कहते हैं की हे देहधारिन ! जैसा तुमने किया है,उसके अनुसार अपना निस्तार करो।

फिर माँ के गर्भ में पल रहा जीव स्मरण करता हुआ अपने को कोसते हुए कहता है की तुमने अपनी कमायी से जो धन अर्जित किया था,उसमे से किसी को दान नहीं दिया। पृथ्वी पर रहते हुए तुमने भूमिदान,गोदान, जलदान,फलदान,ताम्बूलदान अथवा गंधदान भी नहीं किया तो अब भला क्या सोच रहे हो ? तुम्हारे पिता और पितामह मर गए,जिसने तुमको अपने गर्भ में धारण किया वह तुम्हारी माता भी मर गयी,तुम्हारे सभी बंधू भी नहीं रहे,ऐसा तुमने देखा है। तुम्हारा पांचभौतिक शरीर अग्नि में जलाकर भस्म हो गया। तुम्हारे द्वारा एकत्र किया गया  सम्पूर्ण धन-धान्य पुत्रों ने हस्तगत कर लिया। जो कुछ तुम्हारा सुभाषित है और जो कुछ तुमने धर्मसंचय किया है,वह तुम्हारे साथ है। इस पृथ्वी पर जन्म लेनेवाला राजा हो अथवा सन्यासी या कोई श्रेष्ठतम ब्राह्मण हो,वह मरने के बाद पुनः आया हुआ नहीं दिखायी देता है। जो भी इस धरातल पर उत्पन्न हुआ है,उसकी मृत्यु निश्चित है।और इसके बाद वह विलाप करने लगता है। और वह भगवान से प्रार्थना करता है की हे प्रभु जब जन्म के बाद मुझे पुनः मृत्यु को ही प्राप्त होना है तो फिर मेरा जन्म क्यों हो रहा है,अगर संभव हो तो मुझे इस जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त करिये।

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के 47 दिन बाद तक आत्मा के साथ क्या होता है?

गरुड़ पुराण के अनुसार, फिर माता के गर्भ में पल रहा शिशु भगवान से कहता है कि मैं इस गर्भ से अलग होने की इच्छा नहीं करता क्योंकि बाहर जाने से पाप कर्म करने पड़ते हैं, जिससे नरक आदि प्राप्त होते हैं। इस कारण बड़े दु:ख से व्याप्त हूं फिर भी दु:ख रहित हो आपके चरण का आश्रय लेकर मैं आत्मा का संसार से उद्धार करूंगा। माता के गर्भ में पूरे नौ महीने शिशु भगवान से प्रार्थना ही करता है, लेकिन यह समय पूरा होते ही जब प्रसूति के समय वायु से तत्काल बाहर निकलता है, तो उसे कुछ याद नहीं रहता। साइंस के अनुसार मां के गर्भ से बाहर आने वाले शिशु को काफी पीड़ा का सामना करना पड़ता है जिस कारण उसके मस्तिष्क पर काफी ज़ोर पड़ता है। शायद यही कारण है कि उसे कुछ भी याद नहीं रहता। लेकिन गरुण पुराण के अनुसार प्रसूति की हवा से जैसे ही श्वास लेता हुआ शिशु माता के गर्भ से बाहर निकलता है तो उसे किसी बात का ज्ञान भी नहीं रहता। गर्भ से अलग होकर वह ज्ञान रहित हो जाता है, इसी कारण जन्म के समय वह रोता है।  

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इन सबके आलावा गरुण पुराण में भगवान विष्णु ने ये भी बताया है की जब शिशु गर्भ में छह मास का हो जाता है तो वह भूख-प्यास को महसूस करने लगता है और माता के गर्भ में अपना स्थान बदलने के भी लायक हो जाता है, तब वह कुछ कष्ट भी भोगता है। माता जो भी खाने के रूप में ग्रहण करती है वह उसकी कोमल त्वचा से होकर गुजरता है। और इन कष्टों के कारण कई बार शिशु माता के गर्भ में ही बेहोश भी हो जाता है। छह मास के बाद शिशु का मस्तक नीचे की ओर तथा पैर ऊपर की ओर हो जाते हैं। ऐस स्थिति में वह चाहकर भी इधर-उधर हिल नहीं सकता, वह खुद को एक पिंजरे में बंद कर दिए पक्षी की तरह महसूस करता है। ऐसे में शिशु हाथ जोड़ कर ईश्वर की स्तुति करने लगता है। और कहता है हे लक्ष्मीपति, जगदाधार, संसार को पालने वाले भगवान विष्णु का मैं शरणागत होता हूं। हे भगवन! इस योनि से अलग हो तुम्हारे चरणों का स्मरण कर फिर ऐसे उपाय करूंगा, जिससे मैं मुक्ति को प्राप्त कर सकूं। इसके बाद अपने आसपास गंदगी देख वह फिर से भगवान से प्रार्थना करता है और कहता है – हे भगवन, मुझे कब बाहर निकालोगे? सभी पर दया करने वाले ईश्वर ने मुझे ये ज्ञान दिया है, उस ईश्वर की मैं शरण में जाता हूं, इसलिए मेरा पुन: जन्म-मरण होना उचित नहीं है

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और अंत में भगवान विष्णु पक्षीराज गरुड़ से कहते हैं की यही कारण है की गर्भ में पहुंचकर जो जीवात्मा जैसा चिंतन करता है,शरीरधारी वैसा ही जन्म लेकर बालक,युवा और वृद्ध होता है। यदि गर्भ में सोची गयी बात सांसारिक व्याहमोह के कारण विस्मृत हो जाती है तो पुनः मृत्युकाल में उसकी याद आ जाती है। यदि शरीर के नष्ट होने पर वह ह्रदय में ही रह गयी है तो पुनः गर्भ में जाने पर उसका स्मरण होना निश्चित है।