भगवान कृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है और भगवान विष्णु ही तीनो लोक के पालक भी हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ही देव, दैत्य और मनुष्य की समस्याओं का निदान भी हैं। जब -जब तीनो लोकों में  दैत्यों का आतंक बढ़ने लगता है तब -तब नारायण दैत्यों का संहार कर तीनो लोकों में धर्म की स्थापना करते करते है। नारायण ने पृथ्वीलोक पर  भी मनुष्य रूप में बारह बार अवतरित होकर अधर्म  का नाश किया है। ऐसे में भगवान विष्णु का किसी से भी पराजित होना असंभव ही लगता है लेकिन ऐसा नहीं है। कृष्णावतार में नारायण को भी पराजय का मुंह देखना पड़ा था। तो आइये जानते हैं कौन था वह योद्धा जिसने भगवान कृष्ण को भी पराजित कर दिया।

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हम जिस योद्धा के बारे में आपको बताने जा रहे हैं वह जन्म से ब्राह्मण था लेकिन कर्म से असुर था और अरब के पास यवन देश में रहता था।

पुराणों में इसे म्लेच्छों का प्रमुख भी  कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापरयुग में  शेशिरायण नाम के एक ऋषि हुआ करते थे जो त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे। ऋषि शेशिरायण एक समय सिद्धियां प्राप्त करने के लिए विशेष अनुष्ठान कर रहे थे जिसमें 12 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी था। इसलिए ऋषि स्त्री प्रसंग और गृहस्थ जीवन से दूर रहते थे। लेकिन भाग्य को कुछ और मंजूर था। एक बार ऋषि शेशिरायण को एक सभा में आमंत्रित किया गया। इस सभा में ऋषि शेशिरायण का अपमान करते हुए एक व्यक्ति ने इन्हें ‘नपुंसक’ कह दिया। इस बात से ऋषि शेशिरयण बहुत आहत हुए और उन्होंने अपना पुरूषत्व सिद्ध करने की प्रतिज्ञा ले ली।

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उन्होंने यह संकल्प लिया कि वह एक ऐसे पुत्र के पिता बनेंगे जो अजेय होगा, युद्ध में उसे कोई जीत ना सकेगा। इसके लिए वह भगवान शिव की तपस्या करने लगे। ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और ऋषि को वरदान दिया की तुम्हे अजेय पुत्र की प्राप्ति होगी  जो युद्ध में किसी से पराजित नहीं होगा और सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने प्रभावहीन हो जाएंगे। साथ ही महादेव ने ऋषि से कहा की तुम्हारे मन में अभी भौतिक चाहत दिख रही है और तुम्हारी यह इच्छा भी पूरी होगी।

समय गुजरने के साथ-साथ भगवान शिव के वरदान के प्रभाव से ऋषि रूपवान होते  गए। एक दिन ऋषि मार्ग से गुजर रहे थे तो उन्होंने एक स्त्री को जल में  नहाते हुए देखा। दोनों एक दूसरे के प्रति मोहित हो गए। उन के संयोग से दोनों को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र प्राप्ति के बाद वह स्त्री स्वर्गलोक चली गई। दरअसल वह स्त्री स्वर्ग की अप्सरा रम्भा थी। रम्भा ने अपनa पुत्र ऋषि को सौंप दिया। ऋषि और रम्भा के इस पुत्र का नाम कालयवन था।

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श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान श्रीकृष्ण के परम शत्रु कालयवन की कथा का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार कालयवन में भगवान शिव की तरह क्रोध था और वह त्रिलोक विजयी भी था। कालयवन को भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु किसी भी अस्त्र या शस्त्र से नहीं हो सकती है। उसे कोई सूर्यवंशी या चन्द्रवंशी भी नहीं मार सकता है। रंभा के  स्वर्ग वापस चले जाने के बाद  ऋषि का भी सांसारिक सुख से मोह भांग हो गया। ऋषि कालयवन को  राजा कालजंग को सौंप कर तपस्या करने चले गए। राजा कालजंग ने उसका अपने पुत्र की तरह ललन-पालन किया। कालजंग मलीच देश पर राज करता था।

कालजंग की मृत्यु के पश्चात कालयवन यवन देश का राजा बना। शिव के वरदान के कारण कालयवन को अपनी शक्ति का बहुत अहंकार था। एक बार उसने नारद जी से पूछा की तीनोलोक में मेरे सामान कोई वीर नहीं है फिर में किस से युद्ध करूँ जो मेरे सामान वीर हो। नारदजी ने उसे श्रीकृष्ण का नाम बताया।

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नारद की सलाह के बाद कालयवन कृष्ण से युद्ध कैसे  की जाये इसकी युक्ति सोचने लगा। क्योंकि उसके पास कृष्ण से युद्ध करने का कोई कारन नहीं था और वह बिना कारण कृष्ण को युद्ध के लिए ललकार नहीं सकता था। लेकिन कृष्ण से युद्ध करने की उसकी लालसा जल्दी ही पूर्ण हुई। उसी समय जरासंध और कृष्ण में युद्ध चल रहा था और जरासंध की सेना हारती हुई नजर आ रही थी। जरासंध ने  राजा शल्य की सलाह पर  कृष्ण को हराने के लिए कालयवन से अपने पक्ष में युद्ध करने के लिए कहा और कालयवन तैयार हो गया। वास्तविक में वह खुद कृष्ण से युद्ध करने का इंतजार कर रहा था। इसके बाद कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण के लिए सब तैयारियां कर लीं। दूसरी ओर जरासंध भी अपनी सेना लेकर निकल गया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश कृष्ण के नाम संदेश भेजा और युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में संदेश भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं। कालयवन ने ये प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। बलरामजी ने कृष्ण को इसके लिए मना किया, और कहा शिव द्वारा दिए वरदान के कारण भी इससे पराजित नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण ने  बताया कि कालयवन को केवल राजा मुचुकुंद ही पराजित कर सकता है। मुचुकुंद को देवराज इंद्र से यह वरदान प्राप्त है। श्रीकृष्ण ने बलराम को बताय की एक बार इक्ष्वाकुवंशी मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद देवताओं की सहायता के लिए दानवों से युद्ध करने देवलोक पहुंच गए ।

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उन्होंने देवताओं का साथ देकर और दानवों का संहार किया जिसके कारण देवता युद्ध जीत गए, तब इन्द्र ने उन्हें वर मांगने को कहा। मुचुकुंद ने वापस पृथ्वीलोक जाने की इच्छा व्यक्त की, तब इन्द्र ने उन्हें बताया कि पृथ्वी और देवलोक में समय का बहुत अंतर है जिस कारण अब वह समय नहीं रहा। अब तक तो तुम्हारे सभी बंधु-बांधव मर चुके हैं। उनके वंश का कोई नहीं बचा। यह जानकर मुचुकुंद बहुत दु:खी हुए और वर मांगा कि उन्हें कलियुग के अंत तक सोना है। तब इन्द्र ने मुचुकुंद को वरदान दिया कि किसी धरती के निर्जन स्थान पर जाकर सो जाएं और यदि कोई तुम्हें उठाएगा तो तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो जाएगा। और यही वरदान कालयवन के मृत्यु का कारण भी बनेगा। कालयवन और कृष्ण में भयंकर युद्ध शुरू हो गया। कालयवन श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा। श्रीकृष्ण तुरंत ही दूसरी ओर मुंह करके रणभूमि से भाग चले और कालयवन उन्हें पकडऩे के लिए उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा। इस प्रकार भगवान कृष्ण  बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में घुस गए। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहां उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा।

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उसे देखकर कालयवन ने सोचा, मुझसे बचने के लिए शायद श्रीकृष्ण इस तरह भेष बदलकर छुप गए हैं। उसने उस सोए हुए व्यक्ति को कसकर एक लात मारी। वह पुरुष पैर की ठोकर लगने से वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखाई दिया।

इन्द्र के वरदान के कारण उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन के शरीर में आग पैदा हो गई और वह क्षणभर में जलकर राख का ढेर हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकुवंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद थे। इस तरह कालयवन का अंत हो गया। और इसी युद्ध के बाद श्रीकृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा।

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