पाठकों ये तो आप सभी जानते हैं कि महर्षि विश्वामित्र ऋषि बनने से पहले एक क्षत्रिय राजा हुआ करते थे। हमारे धर्मग्रंथों में महर्षि विश्वामित्र से जुड़े कई कथाओं का वर्णन किया गया है। जिनमे से अधिकतर कथाओं के बारे में आज भी लोग नहीं जानते हैं। इस पोस्ट में मैं आपको महर्षि विश्वामित्र से जुडी एक ऐसी ही कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसके अनुसार विश्वामित्र ने अपने तपोबल से एक चांडाल को सशरीर स्वर्ग लोक पहुंचा दिया था। 

कथा के अनुसार इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुए थे। जिनकी सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा थी। जिसके लिए उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से यज्ञ करने को कहा। लेकिन महर्षि वशिष्ठ ने यह कहते हुए यज्ञ करने से मना कर दिया की मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं किसी व्यक्ति को सशरीर स्वर्ग भेज सकूँ। महर्षि वशिष्ट के मना करने पर त्रिशंकु वशिष्ठ जी के पुत्रों के पास गए और उनसे भी यज्ञ करने का अनुरोध किया। लेकिन जब महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों को ये पता चला की उनके पिता ने इस काम के लिए राजा त्रिशंकु को मना कर दिया है तो उन्होंने त्रिशंकु से कहा हे राजन क्या तुम मुर्ख हो जो इतना भी नहीं जानते की जब मेरे पिता तुम्हे सशरीर स्वर्ग नहीं भेज सकते तो हम लोग कैसे भेज पाएंगे।

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महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों के मुख से ऐसे शब्द सुनकर त्रिशंकु को क्रोध आ गया और वो उन सभी को अपशब्द कहने लगा। महर्षि वशिष्ठ के पुत्रो को राजा त्रिशंकु के अपशब्दों पर क्रोध आ गया और उन सभी ने उसे चण्डाल हो जाने का श्राप दे दिया। श्राप के कारण त्रिशंकु का शरीर काला पड़ गया। सर के बाल चाण्डालों के जैसे छोटे छोटे हो गए। गले की मोती माला हड्डियों की माला में बदल गया। हाथों और पैरों में लोहे की कड़े आ गए। त्रिशंकु के इस बदले रूप को देखकर उनके मंत्री और दरबारी उन्हें अकेला छोड़ भाग गए। लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी त्रिशंकु ने सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा का परित्याग नहीं किया। राजा त्रिशंकु जो की अब चाण्डाल बन चूका था अपनी इच्छा लेकर महर्षि विश्वामित्र के पास पहुंचा। विश्वामित्र के आश्रम में पहुंचते ही सबसे पहले त्रिशंकु ने ऋषि को प्रणाम किया और बोला-हे ऋषि आप तो महान तपस्वी हैं कृपया मेरी इच्छा को पूर्ण करने में मेरी सहायता कीजिये। त्रिशंकु के बार बार विनती करने पर महर्षि विश्वमित्र राजी हो गए और बोले हे राजन क्यूंकि तुम मेरी शरण में आये हो इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूँगा। इसके बाद विश्वामित्र यज्ञ की तैयारी  में लग गए। सबसे पहले उन्होंने ने अपने पुत्रों को बुलाया और यज्ञ की सामग्री एकत्रित करने को कहा।

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इसके बाद उन्होंने अपने शिष्यों के द्वारा वन में रहने वाले सब ऋषि-मुनियों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रण भिजवाया। शिष्यों ने लौटकर बताया कि सब ऋषि-मुनियों ने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया है। किन्तु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने यह कहकर निमन्त्रण अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ में हमलोग सम्मिलित नहीं हो सकते। यह सुनकर विश्वामित्र को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा अकारण ही वशिष्ठ पुत्रों ने मेरा अपमान किया है। इसलिए मैं उन्हें शाप देता हूँ कि उनका सर्वनाश हो जाये। इसी समय वे सब कालपाश में बँध कर यमलोक को जायें और सात सौ वर्षों तक चाण्डाल योनि में विचरण करें। उन्हें खाने के लिये केवल कुत्ते का माँस मिले और सदैव कुरूप बने रहें। विश्वामित्र के शाप से वशिष्ठ जी के पुत्र यमलोक सिधार गये।

इधर वशिष्ठ जी के पुत्रों की गति से डरकर सभी ऋषि मुनियों ने यज्ञ में विश्वामित्र का साथ दिया। यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने सब देवताओं को अपने यज्ञ का भोग ग्रहण करने के लिये आह्वान किया किन्तु कोई भी देवता नहीं आये। देवताओं के इस व्यवहार से क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अर्ध्य हाथ में लेकर कहा कि हे त्रिशंकु! मैं तुझे अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूँ।इतना कह कर विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़ते हुये आकाश में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ते हुये स्वर्ग जा पहुँचे।

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उधर चाण्डाल के रूप में त्रिशंकु को स्वर्ग में आया देख देवराज jइन्द्र क्रोधित हो उठे। उन्होंने त्रिशंकु से कहा की मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिये तू स्वर्ग में नहीं रह सकता। इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगा और विश्वामित्र से अपनी रक्षा की प्रार्थना करने लगा। विश्वामित्र ने त्रिशंकु को वही ठहरने का आदेश दिया। विश्वामित्र ने उसी स्थान पर अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग की रचना कर दी। और नये तारे तथा दक्षिण दिशा में सप्तर्षि मण्डल बना दिया। इसके बाद उन्होंने नये इन्द्र की सृष्टि करने का विचार किया जिससे इन्द्र सहित सभी देवता भयभीत हो गए।

देवता विश्वामित्र के पास आये और बोले हमने त्रिशंकु को केवल इसलिये लौटा दिया था कि वे गुरु शाप के कारण स्वर्ग में नहीं रह सकता है। इन्द्र की बात सुन कर विश्वामित्र जी बोले कि मैंने इसे स्वर्ग भेजने का वचन दिया है इसलिये मेरे द्वारा बनाया गया यह स्वर्ग मण्डल हमेशा रहेगा और त्रिशंकु सदा इस नक्षत्र मण्डल में अमर होकर राज्य करेगा।  इससे सन्तुष्ट होकर इन्द्रादि देवता अपने अपने लोक वापस चले गये।

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