भगवान गणेश

देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने वाले भगवान श्री गणेश की लीलाओं और उनसे जुड़ी कई पौराणिक कथाएं देखने एवं सुनने को मिलती है। उन्ही में से एक कथा है उनके टूटे हुए दन्त की जो हमेशा उनके हाथ में होता है। सबसे नटखट देव माने जाने वाले गणेशजी को आपने हमेशा एक हाथ में उनका टूटा हुआ दांत पकड़े हुए देखा होगा। लेकिन इसके पीछे की कहानी जानते हैं आप ? अगर नहीं तो चलिए  हम आपको बताते हैं कि इसके पीछे की कहानी क्या है।

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ये तो आप जानते ही होंगे की भगवान श्री गणेश को एकदन्त के नाम से भी जाना जाता है। गणेश जी की प्रतिमा और तस्वीरों में आपने देखा होगा की उनके एक दांत हैं और दूसरे तरफ का दांत टूटा हुआ है। टूटा हुआ दांत गणेश जी के हाथों में मौजूद होता है। इससे जुडी कई पौराणिक कथाएं हिन्दू धर्म में प्रचलित है। भविष्य पुराण की कथा के अनुसार गणेश जी ने अपने नटखटपन से अपने बड़े भाई कुमार कार्तिकेय को परेशान कर दिया। जिससे  क्रोधित होकर कार्तिक ने गणेश जी का एक दांत तोड़ दिया। जब गणेश जी ने इसकी शिकायत भगवान शिव से की तो कुमार कार्तिकेय ने दांत गणेश जी को वापस कर दिया। लेकिन एक श्राप भी दे दिया कि गणेश जी को अपने हाथ में हमेशा दांत पकड़े रहना होगा। अपने से दांत अलग करने पर गणेश जी भष्म हो जाएंगे।

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एक अन्य कथा में बताया गया है कि एक बार परशुराम जी कैलाश अपने आराध्य देव शिव से मिलने कैलाश पहुंचे। उस समय भगवान शिव ध्यान में लीन थे। गणेश जी ने परशुराम जी को शिव जी से मिलने से रोक दिया। इसके बाद परशुराम जी और गणेश जी में युद्ध होने लगा। युद्ध के दौरान परशुराम जी के फरसे से गणेश जी का एक दांत टूट गया।

वहीँ एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास जी ने गणेश जी से महाभारत लिखने के लिए अनुरोध किया तो गणेश जी इसके लिए मान गए लेकिन एक शर्त रख दी कि महाभारत लिखते समय मेरी लेखनी रुकनी नहीं चाहिए। अगर मेरी लेखनी रुकी तो मैं आगे लिखना बंद कर दूंगा। व्यास जी ने शर्त मान ली लेकिन एक शर्त उन्होंने भी रख दी कि आप मुझसे पूछे बिना एक शब्द भी नहीं लिखेंगे। गणेश जी ने वेद व्यास जी की महाभारत जल्दी लिखने के लिए अपनी एक दांत को लेखनी बना लिया। लेकिन व्यास जी की चतुराई के कारण गणेश जी को पूरी महाभारत लिखनी पड़ी।

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कहा तो यह भी जाता है की एक असुर का वध करने के लिए गणेश जी ने अपने  एक दन्त तोड़ लिए थे। गजमुखासुर नाम के एक असुर को यह वरदान मिला था कि वह किसी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मरेगा। ऐसे में वह खुद को अजेय और अमर समझकर देवताओं और ऋषियों को परेशान करने लगा। तब गणेशजी ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए अपनी एक दन्त से  गजमुखासुर का वध कर दिया।

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