मित्रों महाभारत में कई ऐसी कथाएं हैं जो मुष्यों को जीवन मूल्यों के बारे में सिखाती है। इस लेख में हम आपको एक ऐसी ही कथा के बारे में बताने जा रहे हैं  जिसे जानने के बाद हर मनुष्य स्त्रियों का सम्मान करने लगेगा और परस्त्रीयों के बारे में कभी बुरा नहीं सोच सकेगा।

महाभारत की ये कथा पांडवों के अज्ञातवास से जुडी हुई है जिसके अनुसार जब पांडव द्रौपदी सहित अपने अज्ञात वास के दस महीने का समय मत्स्य नरेश विराट की राजधानी में निवास करते हुए व्यतीत कर चुके थे।दोस्तों आपको पहले बता दूँ की वनवास समाप्त होने के बाद पांडव द्रौपदी सहित अज्ञातवास के दौरान अपना रूप और नाम बदलकर मत्स्य देश में रहने लगे। जहाँ ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर कंक के नाम से,भीम सेन बल्लभ के नाम से ,अर्जुन वृहन्नला के रूप में और नकुल तथा सहदेव तांतिपाल और ग्रन्थिक के नाम से रहनाराहे थे। जबकि द्रौपदी सैरंध्री के नाम से रानी की दासी बन कर रह रही थी।  

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उसी दौरान एक दिन राजा विराट का साला कीचक अपनी बहन सुदेष्णा से भेंट करने महल में आया।उसी समय जब उसकी दृष्टि सैरंध्री पर पड़ी तो वह काम-पीड़ित हो उठा तथा सैरंध्री से एकांत में मिलने  के अवसर की ताक में रहने लगा। द्रौपदी भी कीचक की कामुक दृष्टि  भांप गई। उसने महाराज विराट एवं महारानी सुदेष्णा से कहा की कीचक मुझ पर कुदृष्टि रखता है। मेरे पांच गन्धर्व पति हैं। एक न एक दिन वे कीचक का वध कर देंगे,किन्तु उन दोनों ने द्रौपदी की बात की कोई ध्यान नहीं दिया। 

तब अंत में लाचार होकर एक दिन सैरंध्री अर्थात द्रौपदी ने भीमसेन को कीचक की कुदृष्टि तथा कुविचार के विषय में बता दिया। द्रौपदी के वचन सुनकर भीमसेन बोले हे द्रौपदी तुम उस दुष्ट कीचक को अर्धरात्रि में नृत्यशाला में मिलने का सन्देश दे दो। नृत्यशाला में तुम्हारे स्थान पर मैं जाकर उसका वध कर दूंगा।

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द्रौपदी ने भीमसेन की योजना के अनुसार कीचक को रात्रि में नृत्यशाला में मिलने का संकेत दे दिया। द्रौपदी के इस संकेत से प्रसन्न कीचक जब रात्रि को नृत्यशाला में पहुंचा तो वहां भीमसेन द्रौपदी की एक साडी से अपना शरीर और मुंह ढँक कर वहां लेटे हुए थे।

कीचक उसे सैरंध्री समझकर कमोतेजित होकर बोला हे प्रिये मैं तुम पर पूरी तरह मोहित हो चूका हूँ। मेरा सर्वस्व तुम पर न्यौछावर है। इसलिए अब बिना किसी  देरी के तुम उठो और मेरे साथ रमण करो। कीचक के मुख से ऐसी बातें सुनकर साड़ी में छुपे भीमसेन क्रोधित हो उठे और वह उछलकर उठ खड़े हुए और किचक से बोले रे पापी तू सैरंध्री नहीं अपनी मृत्यु के समक्ष खड़ा है। ले अब परस्त्री पर कुदृष्टि डालने का फल चख। इतना कहकर भीमसेन ने कीचक को लात और घूंसों से मारना आरम्भ कर दिया। जिस प्रकार प्रचंड आंधी वृक्षों को झकझोर डालती है,उसी प्रकार भीमसेन कीचक को धक्के मार-मार कर सारी नृत्यशाला में घूमाने लगे।

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उधर जैसे ही भीमसेन ने कीचक को मारना शुरू किया वैसे ही वृहनलला जोर जोर से मृदंग बजाने लगी ताकि कीचक की चीख नृत्यशाला से बाहर ना  जा सके। फिर मृदंग की शोर में भीमसेन ने कीचक को पटक पटक कर मार डाला। इस प्रकार कीचक का वध करने  के बाद भीमसेन ने उसके सभी अंगों को तोड़ मरोड़कर उसे मांस का एक लोथरा बना दिया और फिर  द्रौपदी से बोले पांचाली आकर देखो मैंने इस दुष्ट को मार डाला।यह सुन द्रोपदी कमरे में आई और कीचक की दुर्गति को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गई। उसके बाद फिर भीमसेन और सैरंध्री अर्जुन के पास गए और उन्हें बता दिया की कीचक  मारा जा चूका है। फिर उसने भी मृदंग बजाना बंद कर दिया। तत्पश्चात तीनो अपने-अपने स्थानों में जाकर सो गए।

उधर प्रातः काल जब कीचक के वध का समाचार सबको मिला तो महारानी सुदेष्णा राजा विराट तथा कीचक के अन्य भाई सभी विलाप करने लगे। जब कीचक के शव को अंत्येष्टि के लिए ले जाया जाने लगा तो द्रौपदी ने राजा राजा विराट से कहा इस दुष्ट को मुझ पर कुदृष्टि रखने का फल मिला है। अवश्य ही मेरे गन्धर्व पतियों ने इसकी यह दुर्दशा की होगी। द्रौपदी के वचन सुनकर कीचक के भाइयों ने क्रोधित होकर कहा हमारे अत्यंत बलवान भाई की मृत्यु इसी सैरंध्री के कारण हुई है। अतः इसे भी कीचक की चिता के साथ जला देना चाहिए। इतना कहकर उन्होंने सैरंध्री को जबरदस्ती कीचक की अर्थी के साथ बाँध दिया और श्मशान की ओर ले जाने लगा।

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कंक,बल्लभ,वृहन्नला,तांतिपाल तथा ग्रन्थिक के रूप में वहां उपस्थित पांडवों से द्रौपदी की यह दशा देखि नहीं जा रही थी किन्तु अज्ञातवास के कारण वे स्वंय को प्रकट नहीं कर सकते थे। इसलिए भीमसेन चुपके से श्मशान की ओर दौड़ पड़े और रास्ते में अपने अंगो पर कीचड़ और मिट्टी का लेप लगा लिया। फिर एक विशाल वृक्ष को उखाड़कर कीचक के भाइयों पर टूट पड़े और उनमे से कितनो को ही भीमसेन ने मार डाला। जो शेष बचे थे वे अपना प्राण बचाकर भाग निकले। इसके बाद भीमसेन ने द्रौपदी को सांत्वना देकर महल भेज दिया और स्वंय नहा-धोकर दूसरे रास्ते से अपने स्थान में लौट आये। कीचक तथा उसके भाइयों का वध होते देखकर राजा विराट सहित सभी लोग द्रौपदी से भयभीत रहने लगे।

तो दर्शकों अब तो आप समझ ही गए होंगे की परस्त्री पर कुदृष्टि डालने वालों की गति अंततः कीचक की तरह ही होती है। इसलिए मनुष्य को चाहिए की वह सभी स्त्रियों का सामान करे ताकि एक अच्छे समाज के साथ साथ उसके खुद के व्यक्तित्व का भी निर्माण हो।

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