अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ?

अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे | खांडव वन की लड़ाई:

अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? दोस्तों आखिर अग्निदेव ने खांडव वन को क्यों जलाकर भस्म कर दिया।

क्यों पाप करने के बाद भी दुर्योधन को मिला स्वर्ग ?

महाभारत की ये कथा आदिपर्व के खांडवदाहपर्व से ली गई है। कथा उस समय की जब हस्तिनापुर के विभाजन के बाद पाँचों पांडव द्रौपदी और अपनी माता कुंती के सहित खांडवप्रस्थ यानी इंद्रप्रस्थ में बड़े ही आनंदपूर्वक रह रहे थे। उसी समय एक दिन भगवान श्री कृष्ण पांचों पांडव से मिलने इंद्रप्रस्थ पधारे। वहां पहुंचकर उन्होंने पांचों पांडवों को कई तरह की ज्ञान की बाते बताई जैसे की एक राजा को कैसे अपनी प्रजा के साथ व्यवहार करना चाहिए जिससे उसकी प्रजा सुखी रह सके आदि। फिर एक दिन अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा की सखा आज बड़ी गरमी पड़ रही है। चलिये यमुना जी में स्नान के लिये चलें। मधुसूदन ! मित्रों के साथ वहां जलविहार करके हमलोग शामतक फिर लौट आयेंगे। यह सुन श्री कृष्ण बोले हे अर्जुन मेरी भी ऐसी ही इच्छा हो रही है कि हमलोग मित्रों के साथ वहां चलकर जलविहार का आनंद लें। फिर वे दोनों यमुना की ओर चल दिए। अभी श्री कृष्ण और अर्जुन को यमुना किनारे पहुंचे कुछ ही समय हुआ था की उन दोनों के पास एक ब्राह्मणदेवता आये। उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्ण के समान थी। वे सूर्य के समान तेजस्वी जान पड़ते। वे चीर वस्त्र पहने और मस्तक पर जटा धारण किये हुए थे। उनका मुख कमलदल के समान शोभा पा रहा था।

कुछ क्षण पश्चात वो ब्राह्मण भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के निकट आये। यह देख भगवान श्री कृष्ण ने उनसे पुछा हे ब्राह्मणदेव आप कौन हैं कृपया अपना परिचय दीजिये। तब उस ब्राह्मण ने कहा की मैं अधिक भोजन करनेवाला एक ब्राह्मण हूँ और सदा अपरिमित अन्न भोजन करता हूँ। हे श्री कृष्ण और अर्जुन आज मैं आप दोनों से भिक्षा मांगता हूँ। आपलोग एक बार पूर्ण भोजन कराकर मुझे तृप्ति प्रदानं कीजिये। उनके ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण और अर्जुन बोले-ब्रह्मण बताइये आप किस अन्न से तृप्त होंगे ? आपके लिए किस अन्न की व्यवस्था की जाय ? यह सुन उस ब्राह्मण ने कहा वीरों मुझे अन्न की भूख नहीं है आपलोग मुझे अग्नि समझें। जो अब मेरे अनुरूप हो वही आप दोनों मुझे दें। अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ?

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खांडव वन का दहन- अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? | इंद्र सदा इस खाण्डव वन की रक्षा करते हैं। उन महा मना से सुरक्षित होने के कारण मैं इसे जला नहीं पाता। इस वन में इंद्र का सखा तक्षक नाग अपने परिवार सहित सदा निवास करता है। उसी के लिए वज्रधारी इंद्र सदा इसकी रक्षा करते हैं। परन्तु मैं सदा ही इसे जलाने की इच्छा रखता हूँ। मुझे प्रज्वलित देखकर वे मेघों द्वारा जल की वर्षा करने लगते हैं यही कारण है कि जलाने की इच्छा रखते हुए भी मैं इस खाण्डव वन को जलाने में सफल नहीं हो पाता। आप दोनों अस्त्र विद्या के पूरे जानकार हैं अतः मैं इसी उद्देश्य से आपके पास आया हूँ कि आप दोनों की सहायता से इस खाण्डव वन को जला सकूँ। मैं इसी अन्न की भिक्षा मांगता हूँ। आप दोनों उत्तम अस्त्रों के ज्ञाता हैं अतः जब मैं इस वन को जलाने लागूं उस समय आपलोग ऊपर से बरसती हुई जल की धाराओं तथा इस वन से निकलकर चारों ओर भागनेवाले प्राणियों को रोकियेगा।

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यह सुन भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन दोनों एक साथ उस ब्राह्मण से पूछ बैठे हे ब्राह्मण आखिर अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ?। तब ब्राह्भण ने बताया की वे खांडव वन को क्यों जलाना चाहते हैं । बात प्राचीन काल की है जब इंद्र के समान बल और पराक्रम से संपन्न श्वेतकी नाम के एक राजा हुआ करते थे। उस समय उनके जैसा यज्ञ करनेवाला दाता दूसरा कोई नहीं था। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेक बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया था। प्रतिदिन उनके मन में यज्ञ और दान के सिवा दूसरा कोई विचार नहीं उठता था। वे यज्ञ कर्मो के आरम्भ और नाना प्रकार के दानो में ही लगे रहते थे।

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यज्ञ करते-करते उनके ऋत्विजों यानि की यज्ञ में आहुति देने वाले ब्राह्मणों की आखें धुएं से व्याकुल हो उठी। अधिक समय से आहुति देते-देते वे सभी खिन्न हो गए थे। इसलिए राजा को छोड़कर चले गए। तब राजा ने उन ऋत्विजों को पुनः यज्ञ के लिए प्रेरित किया। परन्तु जिनके नेत्र दुखने लगे थे वे ऋत्विज उनके यज्ञ में नहीं आये। तब राजा ने उनकी अनुमति लेकर दूसरे ब्राह्मणो को ऋत्विज बनाया और उन्ही के साथ रुके हुए यज्ञ को पूरा किया। इस प्रकार यञपरायण राजा के मन में किसी समय यह संकल्प उठा कि मैं सौ वर्षों तक एक यज्ञ करूँ परन्तु उन महामना को वह यज्ञ आरम्भ करने के लिए ऋत्विज ही नहीं मिले।

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अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? श्वेतकी ने इसके लिए बहुत प्रयत्न किया। वे ब्राह्मणो के पैर पड़कर,उनसे अनुनय-विनय की परन्तु उन्होंने नरेश के मनोरथ को सफल नहीं किया। तब वे कुपित होकर आश्रमवासी महर्षियों से बोले ब्राह्मणो यदि मैं पतित हूँ तो आप सभी ब्राह्मणो के द्वारा शीघ्र ही त्याग देने योग्य हूँ अन्यथा नहीं। अतः यज्ञ कराने क लिए मेरी सहायता कीजिये। विप्रवरों इस प्रकार बिना किसी अपराध के मेरा परित्याग करना आपलोगों के लिए कदापि उचित नहीं है। मैं आपकी शरण में हूँ। इतना कहकर राजा चुप हो गए। तब ब्राह्मणो ने कहा हे राजन आपके यञकर्म तो निरंतर चलते रहते हैं। जिसकी वजह से हमलोग थक गए हैं,पहले के परिश्रम से हमारा कष्ट बढ़ गया है। हे निष्पाप नरेश अब आप यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए भगवान रूद्र के समीप जाइये।वही आपके इस यज्ञ को पूरा करवा सकते हैं। यह सुन राजा श्वेतकी को बड़ा क्रोध हुआ। वे कैलास पर्वत पर जाकर उग्र तपस्या में लग गए। तीक्ष्ण व्रत का पालन करने वाले राजा श्वेतकी मन इन्द्रियों के संयमपूर्वक महादेव जी की आराधना करते हुए बहुत दिनों तक निराहार खड़े रहे।

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इस प्रकार भारी तपस्या करते देख भगवान शंकर ने अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया। और स्नेहपूर्वक उनसे कहा हे राजन मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ। श्वेतकि तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा चाहते हो वैसा वर मांग लो। अमित तेजस्वी रूद्र का यह वचन सुनकर श्वेतकी ने परमात्मा शिव के चरणों में प्रणाम किया और कहा देवदेवेश यदि मेरे ऊपर आप प्रसन्न हुए हैं तो स्वंय चलकर मेरा यज्ञ कराएं। राजा की कही हुई बात सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए बोले -राजन यज्ञ कराना हमारा काम नहीं है परन्तु तुमने यही वर माँगने के लिए मेरी तपस्या की है। अतः परंतप नरेश मैं एक शर्त पर तुम्हारा यज्ञ कराऊंगा।

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अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? तब राजा श्वेतकी ने हाथ जोड़ते हुए भगवान शंकर से कहा हे भगवन और वह शर्त क्या है। तब भगवान शंकर ने श्वेतकी से कहा राजेंद्र यदि तुम एकाग्रचित हो ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए बारह वर्षों तक घृत अर्थात घी की निरंतर धारा द्वारा अग्निदेव को तृप्त करो तो मुझसे जिस कामना के लिए प्रार्थना कर रहे हो उसे पाओगे। भगवान रूद्र के ऐसा कहने पर राजा श्वेतकी ने ऐसा ही किया। बारहवां वर्ष पूर्ण होने पर भगवान महेश्वर पुनः आये और बोले हे वत्स तुमने इस वेदविहित कर्म के द्वारा मुझे पूर्व संतुष्ट किया है परन्तु शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ कराने का अधिकार ब्राह्मणो को ही है। अतः परंतप मैं स्वंय तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊंगा। पृथ्वी पर मेरे ही अंशभूत एक महाभाग श्रेष्ठ द्विज हैं। वे दुर्वासा नाम से विख्याता हैं। महा तेजस्वी दुर्वासा मेरी आज्ञा से तुम्हारा यज्ञ कराएँगे। तुम सामग्री जुटाओ। भगवान रूद्र का कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा पुनः अपने नगर में आये और यज्ञ सामग्री जुटाने लगे।

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अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? फिर जब सारी सामग्री एकत्रित हो गयी तो राजन पुनः भगवान रूद्र के पास गये और बोले महादेव आपकी कृपा से मैंने यज्ञ सामग्री तथा अन्य सभी आवश्यक उपकरण एकत्र कर लिए हैं। अब कल मुझे यज्ञ की दीक्षा मिल जानी चाहिए। यह सुन भगवान रद्र ने दुर्वासा को बुलाया और कहा हे दुर्वासा ये महाभाग राजा श्वेतकि हैं। मेरी आज्ञा से तुम इन का यज्ञ कराओ। यह सुनकर महर्षि ने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। तदनन्तर यथा समय विधिपूर्वक नरेश का यज्ञ आरम्भ हुआ। उस यज्ञ में बहुत सी दक्षिणा दी गयी। उन महामना नरेश का यज्ञ पूरा होने पर सभी ब्राह्मण महर्षि दुर्वासा जी की आज्ञा ले अपने अपने स्थान को चले गए। और अंत में राजा श्वेतकी भी महर्षि दुर्वाशा से आज्ञा लेकर अपनी राजधानी आ गए।

अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? नृपश्रेष्ठ राजर्षि श्वेतकि का आचार व्यवहार ऐसा ही था। वे दीर्घकाल के पश्चात् स्वर्गलोक में गए। उनके यज्ञ में अग्नि ने लगातार बारह वर्षों तक घृतपान यानी की घी पिया था । उस अद्वितीय यज्ञ में निरंतर घी पीने से अग्निदेव को बड़ी तृप्ति हुई। परन्तु उनका रंग सफ़ेद हो गया,कान्ति फीकी पड़ गयी तथा वे पहले की भांति प्रकाशित नहीं थे। कुछ समय पश्चात् भगवान अग्निदेव के उदर में विकार हो गया। वे तेज से हिन् हो ग्लानि को प्राप्त होने लगे। अपने को तेज से हीन देख अग्निदेव ब्रह्माजी के के पास गये। और बोले- भगवन राजा श्वेतकि ने अपने यज्ञ में मुझे परम संतुष्ट कर दिया। परन्तु मुझे अत्यंत अरुचि हो गयी है,जिसे मैं किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता। उस अरुचि के कारण मैं तेज और बल से हिन् होता जा रहा हूँ। अतः मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपा से मैं स्वस्थ हो जाऊं। मेरी स्वाभाविक स्थिति सुदृढ़ बनी रहे।

अग्निदेव की यह बात सुनकर ब्रह्माजी ने कहा – हे अनल तुमने बारह वर्षों तक घी का उपभोग किया है। इसीलिए तुम्हे ग्लानि प्राप्त हुई है। हे एलन तेज से हीन होने के कारण तुम्हे सहसा अपने मन में ग्लानि नहीं आने देनी चाहिए। तुम पूर्ववत स्वस्थ हो जाओगे। मैं समय पाकर तुम्हारी अरुचि नष्ट कर दूंगा। पूर्वकाल में देवताओं के आदेश से तुमने दैत्यों के जिस अत्यंत घोर निवासस्थान खाण्डव वन को जलाया था वहां इस समय सब प्रकार के जीव-जन्तु आकर निवास करते हैं। उसी वन को एक बार पुनः जलाकर तुम स्वस्थ हो सकोगे। उस वन को जलाने के लिए तुम शीघ्र ही जाओ। तभी इस ग्लानि से छुटकारा पा सकोगे। ब्रह्मा जी के मुख से ऐसी बातें सुनकर अग्निदेव उसी समय वहां से खाण्डववन की ओर चल दिए। और पहुंचकर अग्निदेव सहसा प्रज्वलित हो उठे जिसके बाद देखते ही देखते खाण्डववन जल उठा।

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अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? खांडव वन को जलते देख वहां रहनेवाले प्राणियों ने उन आग को बुझाने के लिए बड़ा यत्न किया। सैकड़ों हजारों की संख्या में हाथी अपनी सूंढ़ में जल लेकर शीघ्रता पूर्वक दौड़े आते और आग पर उस जल को उड़ेल देते। अनेक सिरवाले नाग भी क्रोध से मूर्च्छित हो अपने मस्तकों द्वारा अग्नि के समीप शीघ्रतापूर्वक जल की धारा बरसाने लगे। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे जीवों ने भी अनेक प्रकार के प्रहारों तथा उद्यमों के द्वारा शीघ्रतापूर्वक उस आग को बुझा दिया। इस तरह खाण्डववन में अग्नि ने बार बार प्रज्वलित होकर सात बार उसे जलाने का प्रयास किया परन्तु यहाँ के निवासियों ने उन्हें बुझा दिया। यह देख अग्निदेव को बड़ी निराशा हुई। वे सदा ग्लानि में डूबे रहने लगे और कुपित हो पितामह ब्रह्माजी के पास आये। वहां उन्होंने ब्रह्माजी से सारी बातें बताई। तब ब्रह्माजी ने कुछ क्षण विचार करने के बाद अग्निदेव से बोले हे अनघ खांडव वन को तुम किस प्रकार जला सकोगे इसका उपाय मुझे मिल गया है परन्तु उसके लिए तुम्हे कुछ समय तक प्रतीक्षा करनी होगी। द्वापर युग में जब नर और नारायण अर्जुन और वासुदेव के रूप में अवतरित होंगे तब तुम खाण्डववन को जला सकोगे क्योंकि यही दोनों तुम्हारे इस काम में सहायक होंगे । ब्रह्मा जी के मुख से ये बातें सुनकर अग्निदेव ने कहा हे भगवान मैं उन दोनों के अवतरित होने की प्रतीक्षा करूँगा फिर मैं इस वन को जलाऊंगा।

अग्निदेव खांडव वन को क्यों जलाना चाहते थे ? इतना कहकर वह ब्राह्माण अपने वास्तविक रूप अर्थात अग्निदेव के रूप में आ गए और उन्होंने सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण को सदर प्रणाम किया और फिर बोले हे नारायण कृपया कर आप और अर्जुन इस काम में मेरी सहायता करें। तब श्री कृष्ण ने कहा हे अग्निदेव आप जैसा चाहते हैं वैसा ही होगा। इसके बाद अग्निदेव ने अर्जुन को एक दिव्य धनुष और रथ दिया। लेकिन दोस्तों ये कथा यही खत्म नहीं हुई और अगर आप इससे आगे जानना चाहते हैं तो निचे डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक पर क्लीक करें या फिर हमारे चैनल पर जाकर सर्च करें श्रीकृष्ण और अर्जुन को क्यों करना पड़ा बांकी सभी देवताओं के साथ युद्ध ?